स्वामी दयानंद का घर वापसी अभियान
आर्य समाज के संस्थापक, आद्य आचार्य स्वामी दयानंद सरस्वती स्वराज, स्वसंस्कृति, स्वदेशी, स्वधर्म, स्वभाषा के उपासक व प्रचारक थे। उनके प्रखर राष्ट्रवादी विचारों से भारतीय स्वाधीनता संग्राम को नई ऊर्जा व प्रेरणा मिली। सामाजिक धार्मिक सुधारक होने के नाते उन्होंने सुधार के व्यापक विविध कार्यों को हाथ में लिया चाहे दलित उद्धार हो या स्त्री शिक्षा हो, गौ रक्षा हो, हिंदी भाषा हो या गुरुकुल शिक्षा पद्धति दयानंद के चिंतन दर्शन कार्यक्षेत्र में यह सभी महत्वपूर्ण रहे लेकिन एक और महत्वपूर्ण कार्य उन्होंने अपने हाथ में लिया वह था मुगलकाल व पश्चात में अंग्रेजी शासन जो ईसाई मत का पोषक था। तलवार के बल, छद्म सेवा अन्य प्रलोभन से हिन्दू से मुसलमान व ईसाई बने व्यक्तियों की एकल व सामुहिक स्तर पर हिन्दू धर्म में घर वापसी अर्थात शुद्धि।
महर्षि दयानंद ने अपने सार्वजनिक व्याख्यानों में यह घोषणा की आर्य धर्म अर्थात् हिंदू धर्म प्रचारक धर्म है। हमारे पूर्वजों ने देश- देशांतर, दीप-दीपांतर में जाकर वैदिक सभ्यता संस्कृति का प्रचार किया। उपदेश के माध्यम से लोगों को वैदिक धर्म में दीक्षित किया लेकिन अहो! दुर्गभाग्य आज हमारा आज आचार्य भूमि भारत में ऋषियों, राम-कृष्ण की संतानों को धर्म भ्रष्ट किया जा रहा है। महर्षि दयानंद की मान्यता थी कि हिंदू धर्म की पाचन शक्ति विभिन्न मतों को अपने में मिलाने आत्मसात करने में सभ्यता के आदिकाल से बड़ी प्रबल रही है। शक, हूण, आभीर जैसी विदेशी जातियों को इसने अपने अंदर आत्मसात कर उन्हें हिंदू धर्म में दीक्षित कर दिया लेकिन मध्यकाल में जो वैचारिक जड़ता हिंदू धर्म में आई उसके कारण विशाल भारत रूपी विशाल हिंदू परिवार में नए सदस्यों का आगमन तो दूर हिंदुओं की संतति ही ईसाई मुसलमान तेजी से बन रही है।
दूरदर्शी महर्षि दयानंद ने इस सब का कारण मुस्लिम शासन से आयी विकृति अस्पृश्यता, अशिक्षा व लंबे पराधीनता के काल के कारण हिंदुओं में आई आत्महीनता आत्म गौरव व अपनी संस्कृति के प्रति उपेक्षा का भाव व समुद्री यात्रा करने से धर्म भ्रष्ट होने जैसी अतार्किक रुढ़ी को माना।
महर्षि दयानंद ने 19 वीं शताब्दी में अपने आप में अनोखे सर्वाधिक व्यापक घर वापसी अभियान का सूत्रपात कर दिया। इस अभियान में उन्होंने देहरादून के जन्म से मुसलमान मोहम्मद उमर को स्वयं अपने हाथों से शुद्ध किया और उसे नया नाम ‘अलखधारी’ दिया जिन्होंने कालांतर में वैदिक हिंदू धर्म की बहुत सेवा की अलखधारी जी ने सैकड़ों अपने जैसे जन्म से मुसलमानों की हिंदू धर्म में घर वापसी कराई।
काशी की विद्वत पौराणिक मंडली ने भी महर्षि दयानंद के इस कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की। बिहार भागलपुर में एक दिन 30-40 यूरोपियन व हिंदुस्तानी पादरी स्वामी दयानंद से मिलने आये। स्वामी जी धारा प्रवाह संस्कृत में उनसे बोलते रहे और उन्हें यथासंभव समझाते भी रहे स्वामी जी के उपदेश को सुनकर एक ईसाई पादरी जो पहले बंगाली ब्राह्मण था बहुत रोने लगा और उसने स्वामी जी से कहा यदि आप जैसे तार्किक धर्म धुरंधर तेजस्वी देशभक्त पंडित मुझको पहले मिल जाते तो मैं ईसाई न होता स्वामी जी ने कहा आप चिंतित क्यों होते हैं मैं आज तो आपको मिल गया। वह इसाई बना बंगाली ब्राह्मण उसी दिन हिंदू बन गया। स्वामी जी ने उसे अपने हाथों से यज्ञोपवीत पहनाया व गायत्री की दीक्षा दी।
अमृतसर के मिशन स्कूल के पंडित खड़क सिंह जो 12 वर्ष पहले ईसाई हो गए थे। अमृतसर में स्वामी जी का वेदों पर व्याख्यान सुनकर व उनके बुद्धिवाद पूर्व तर्कों से प्रभावित होकर तत्काल घर वापसी करते हुए हिंदू बन गए और अपनी दो बेटियों का विवाह उन्होंने हिंदुओं में किया और आजीवन आर्य समाज के उपदेश के रूप में पंजाब में दलित उद्धार के क्षेत्र में बहुत उत्तम कार्य किया।
एक बार प्रयागराज में स्वामी दयानंद ठहरे हुए थे। वहां अनेकों व्यक्तियों हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई मत अपनाने को उद्यत हो गए जब स्वामी दयानंद को यह पता चला तो स्वामी जी उनको उपदेश दिया। उपदेश को सुनकर ईसाई बनने को तैयार उन युवकों का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया और हिंदू धर्म में उनकी आस्था निष्ठा बलवती हो गई।
स्वामी दयानंद के घर वापसी अभियान को लेकर ऐसी एक नहीं असंख्य घटनाएं हैं। यहां इस लेख के विस्तार भय से उन सभी को उद्धृत नहीं किया जा रहा।
देव दुर्भाग्य से 59 वर्ष की आयु में ही तत्कालीन राजनीतिक षडयंत्रों के कारण जिसमें महर्षि दयानंद के घर वापसी अभियान की विरोधी व उससे घबराई हुई शक्तियां भी शामिल थी। उनके द्वारा जोधपुर प्रवास के दौरान दुग्ध में जहर दिए जाने के कारण महर्षि दयानंद का अक्टूबर 1883 में अजमेर में बलिदान हो गया।
लेकिन अपने देहांत के समय महर्षि दयानंद अपनी वसीयत लिख कर छोड़ गये थे यूं तो वह वसीयत तीन बिंदुओं पर लिखी गई जिसमें दीप दीपांतर देश देशांतर में वैदिक हिंदू धर्म का प्रचार व भारतवर्ष के अनाथ दीन हीनों का पालन पोषण उनकी सुशिक्षा का प्रबंध उनकी उत्तराधिकरणी परोपकारिणी सभा अजमेर करेगी। वसीयत के इन्हीं बिंदुओं में स्वामी दयानंद के घर वापसी अभियान का भी मूल एजेंडा भी निहित था ।अपने आचार्य की आज्ञा को शिरोधार्य मानकर महर्षि दयानंद के शिष्य जिनमें पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, पंडित लेखराम, स्वामी श्रद्धानंद आदि ने घर वापसी अभियान अर्थात् शुद्धि के कार्य को अपने हाथों में ले लिया। आर्यवीर पंडित लेखराम ने मुल्तान पेशावर लाहौर सहित समूचे पंजाब में महर्षि दयानंद के शुद्धि कार्य को आगे बढ़ाया। पंडित लेखराम के शुद्धि के कार्य से घबराकर एक मत में अंधे मुसलमान ने छुरा मारकर उनकी हत्या कर दी लेकिन महर्षि दयानंद के शिष्य कहां पीछे हटने वाले थे। पंडित लेखराम के पश्चात इस कार्य को स्वामी श्रद्धानंद ने अपने हाथों में लिया और इस घर वापसी अभियान को संगठित कर उत्तर, पश्चिम व मध्य भारत के घर-घर तक पहुंचा दिया। स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में 13 फरवरी 1923 को भारत के विभिन्न प्रांतों के 85 आर्य समाज के सुधारक प्रतिनिधि आगरा में एकत्रित हुए। वहां शुद्धि कार्य के लिए एक केंद्रीय सभा स्थापित की जाए। इस आशय से ‘भारतीय हिंदू शुद्धि सभा’ की स्थापना की गई और फिर तो इस सभा ने जो कार्य किया वह एक इतिहास बन गया। इस सभा ने तत्काल आगरा के पास राजपूत से मुसलमान बने जिन्हें मलकाना राजपूत कहा जाता था। ऐसे 20000 हजार से अधिक मलकाना राजपूत की शुद्धि की।
अपनी स्थापना 1923 से लेकर 1931 के मध्य 8 वर्षों में सभा द्वारा 2 लाख से अधिक मुसलमानों जिसमें राजपूत गुर्जर जाट त्यागी आदि शामिल थे उनकी घर वापसी कराई। मुस्लिम मौलवी इन सभी जातियों को नौ- मुसलमान कहते थे जो मुसलमान हो गई थी। इसी दौरान इस सभा ने 7000 से अधिक दलितों को ईसाई व मुसलमान होने से बचाया 127 शुद्धि सम्मेलन इस सभा ने इस दौरान किये जिसकी 156 पंचायत व 81 बड़े-बड़े सामाजिक समरसता सहभोज आयोजित किए गए। सभा ने अपना ‘शुद्धि समाचार’ मासिक पत्र निकाला जिसके उसे समय में 14000 ग्राहक थे। यह पत्र आज भी निकलता है। उल्लेखनीय होगा लेखक के परनाना स्वर्गीय महाशय दीवान चंदीला भी शुद्धि सभा के कार्यकर्ता नेता थे। जिन्होंने हरियाणा में शुद्धि आंदोलन में भाग लिया फरीदाबाद जनपद के हिंदू गुर्जर से मुसलमान बने जिन्हें मूला गुर्जर कहा जाता था, उनकी हजारों की संख्या में घर वापसी कराई समूचे पांच गांवों को शुद्ध किया। अखिल भारतीय शुद्धि सभा आज भी घर वापसी के कार्य को कर रही है।
आर्य समाज का वर्तमान में 150 वां स्थापना वर्ष चल रहा है ।आर्य समाज के डेढ़ सौ वे जयंती वर्ष पर हम सभी ऋषि संस्कृति सनातन हिंदू धर्म के उपासकों को यह दिव्य संकल्प लेना चाहिए कि घर वापसी के इस अभियान में कभी भी शिथिलता व्यक्तिगत व संगठन स्तर पर नहीं आनी चाहिए अपने पूर्वजों से प्रेरणा लेकर यदि हम तन मन धन से इस अभियान को पुनः नवीन ऊर्जा व दिशा देते हैं तो हम महर्षि दयानंद व इस क्षेत्र में कार्य करने वाले अन्य धर्म व संस्कृति के सेवकों को यह हमारी ओर से सच्चे अर्थों में श्रद्धांजलि होगी।




