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कर्त्तव्य बोध की जीवंत प्रतिमा: स्वामी विवेकानंद

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कर्त्तव्य बोध की जीवंत प्रतिमा: स्वामी विवेकानंद 

भारतीय चिंतन परंपरा में कर्त्तव्यबोध वह दीपशिखा है, जो व्यक्ति के जीवन को अर्थ, दिशा और गरिमा प्रदान करती है। जब यह कर्त्तव्य चेतना किसी महापुरुष के जीवन में साकार हो उठती है, तब वह युगों तक मानवता का पथप्रदर्शन करती रहती है। स्वामी विवेकानंद ऐसे ही युगद्रष्टा संन्यासी थे, जिनके लिए कर्त्तव्य कोई सैद्धांतिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का प्राणतत्व था। उनका व्यक्तित्व आत्मबल, सेवा, साहस और करुणा का ऐसा समन्वय है, जिसमें भारतीय आत्मा की संपूर्ण गरिमा झलकती है।

स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व भारतीय चेतना का वह प्रखर शिखर है, जहां से कर्त्तव्यबोध केवल एक नैतिक उपदेश नही, बल्कि जीवन की सहज साधना में युगों युगों तक प्रवाहित होता है।

स्वामी जी मात्र एक संयासी या दार्शनिक नही थे, बल्कि राष्ट्र निर्माण के शिल्पकार, युवाओ के पथप्रदर्शक व मानवता के सजग प्रहरी थे। युगद्रष्टा, युगसृष्टा स्वामी जी ऐसे प्रेरक व्यक्तित्व थे, जिनके विचार मनुष्य को अपने अधिकारों की अपेक्षा अपने दायित्वों का बोध करते है। उनके लिए कर्त्तव्य कोई बोझ नहीं, बल्कि आत्मविकास और राष्ट्रोत्थान का माध्यम था। उन्होंने कहा था- ”मनुष्य का जीवन केवल अपने लिए नहीं है; वह समाज, राष्ट्र और समस्त मानवता के लिए है।“ यही भाव उनके संपूर्ण चिंतन और कर्म में प्रतिबिंबित होता है।

स्वामी विवेकानंद का जीवन स्वयं कर्त्तव्यबोध की जीवंत मिसाल है। युवा नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में उन्होंने जिस सामाजिक, धार्मिक और बौद्धिक वातावरण में आँखें खोलीं, वह एक ओर पराधीनता की पीड़ा से ग्रस्त था, तो दूसरी ओर आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहा था। ऐसे समय में रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य ने उन्हें यह बोध कराया कि आत्मज्ञान ही समस्त कर्त्तव्यों की आधारशिला है। वे मानते थे कि जो व्यक्ति स्वयं को पहचान लेता है, वही अपने कर्त्तव्यों को सही अर्थों में निभा सकता है। उनके शब्दों में, ”जब तक तुम स्वयं पर विश्वास नहीं करते, तब तक ईश्वर पर विश्वास नहीं कर सकते।“ यह कथन केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक कर्त्तव्य का भी उद्घोष है।

स्वामी विवेकानंद ने कर्त्तव्य को संकीर्ण धार्मिक कर्मकांडों से मुक्त कर व्यापक मानवधर्म से जोड़ा। उनके लिए भूखे को भोजन देना, अशिक्षित को शिक्षा देना और दुर्बल को सशक्त बनाना, पूजा से बढ़कर था। उन्होंने स्पष्ट कहा- ”दरिद्र नारायण की सेवा ही सच्ची सेवा है।“ यह कथन भारतीय समाज को एक नई दृष्टि देता है, जहां ईश्वर मंदिरों में नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता में विराजमान है। इस विचार ने कर्त्तव्यबोध को भावुक करुणा से ऊपर उठाकर सक्रिय सेवा में रूपांतरित किया।

उनका कर्त्तव्यबोध केवल उपदेश तक सीमित नहीं था। शिकागो धर्म संसद में दिया गया उनका ऐतिहासिक भाषण भारतीय आत्मगौरव का घोष था। ”मेरे अमेरिकी भाइयो और बहनो“ कहकर उन्होंने जिस आत्मविश्वास से विश्व को संबोधित किया, वह उस राष्ट्र के कर्त्तव्यबोध का प्रतीक था, जो अपनी आध्यात्मिक जिम्मेदारी को पहचान चुका था। उन्होंने पश्चिम को यह संदेश दिया कि भारत केवल आध्यात्मिक ज्ञान का भंडार नहीं, बल्कि विश्व को मार्गदर्शन देने का नैतिक उत्तरदायित्व भी रखता है। यह राष्ट्रीय कर्त्तव्यबोध आज भी भारत की वैश्विक भूमिका को दिशा देता है।

स्वामी विवेकानंद युवाओं को विशेष रूप से कर्त्तव्य के लिए प्रेरित करते थे। वे कहते थे-”उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत।“ यह वाक्य आलस्य, पलायन और निराशा के विरुद्ध एक शंखनाद है। उनके अनुसार युवा शक्ति यदि अपने कर्त्तव्य को पहचान ले, तो राष्ट्र का पुनर्निर्माण संभव है। वे शारीरिक, मानसिक और नैतिक बल को कर्त्तव्य की त्रिवेणी मानते थे। उनका विश्वास था कि निर्बल मनुष्य न तो अपना, न समाज का और न ही राष्ट्र का कर्त्तव्य निभा सकता है।

स्वामी विवेकानंद का कर्त्तव्यबोध व्यक्ति और समाज के संतुलन पर आधारित था। वे न तो व्यक्तिवाद के अंध समर्थक थे और न ही भीड़ में व्यक्ति को खो देने के पक्षधर। उनका मानना था कि व्यक्ति का सर्वाेत्तम विकास तभी संभव है, जब वह समाज के प्रति अपने दायित्वों को समझे। उन्होंने कहा-”हम जो हैं, वह समाज की देन है; इसलिए समाज के प्रति हमारा ऋण कभी समाप्त नहीं हो सकता।“ यह विचार आज के स्वार्थप्रधान युग में विशेष रूप से प्रासंगिक है।

उन्होंने शिक्षा को कर्त्तव्यबोध का सशक्त माध्यम माना। उनके अनुसार शिक्षा वह नहीं, जो केवल सूचनाएं दे, बल्कि वह है, जो चरित्र निर्माण करे। ”शिक्षा वह है, जो मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता को प्रकट करे“ यह कथन शिक्षा के नैतिक उद्देश्य को रेखांकित करता है। ऐसे शिक्षित नागरिक ही अपने सामाजिक और राष्ट्रीय कर्त्तव्यों को समझ सकते हैं। स्वामी विवेकानंद की यह शिक्षा-दृष्टि आज भी शिक्षा-नीति के लिए प्रेरणा स्रोत है।

स्वामी विवेकानंद का कर्त्तव्यबोध साहस से जुड़ा हुआ था। वे भय को सबसे बड़ा पाप मानते थे। उनके अनुसार भयभीत व्यक्ति कभी अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं कर सकता। उन्होंने कहा-”डरो मत, यह मेरा तुम्हें संदेश है।“ यह संदेश केवल आध्यात्मिक निर्भयता नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक साहस का भी आह्वान है। अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना, सत्य के पक्ष में बोलना और कमजोर की रक्षा करना ये सभी कर्त्तव्य साहस के बिना अधूरे हैं।

उनकी दृष्टि में कर्त्तव्य और कर्मफल का संबंध भी अत्यंत स्पष्ट था। वे निष्काम कर्म के समर्थक थे। गीता की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि कर्त्तव्य का पालन फल की चिंता के बिना होना चाहिए। जब कर्म स्वार्थ से मुक्त होता है, तब वह साधना बन जाता है। यही कारण है कि उनका कर्त्तव्यबोध आत्मशुद्धि का मार्ग भी है और समाजसेवा का भी।

स्वामी विवेकानंद ने स्त्री सम्मान को भी कर्त्तव्य का अनिवार्य अंग माना। वे कहते थे कि जिस समाज में नारी का अपमान होता है, वह कभी उन्नति नहीं कर सकता। नारी शिक्षा और सशक्तिकरण को उन्होंने राष्ट्रीय कर्त्तव्य के रूप में देखा। यह विचार आज भी सामाजिक न्याय और समानता की आधारशिला है।

उनका संपूर्ण जीवन एक संदेश है कि कर्त्तव्य केवल शब्द नहीं, बल्कि सतत क्रिया है। अल्पायु में ही उन्होंने जिस व्यापक दृष्टि और अथक परिश्रम से भारत और विश्व को दिशा दी, वह इस बात का प्रमाण है कि कर्त्तव्यबोध यदि जाग्रत हो जाए, तो सीमाएं स्वतः टूट जाती हैं। उन्होंने स्वयं के लिए नहीं, बल्कि मानवता के लिए जिया।

आज के अधिकार-केंद्रित और स्वार्थ प्रधान युग में स्वामी विवेकानंद का कर्त्तव्यबोध एक सशक्त नैतिक मार्गदर्शन है। उनका जीवन हमें प्रेरित करता है कि हम अपने कर्त्तव्यों को पहचानें, निर्भय होकर उनका निर्वहन करें और सेवा को ही साधना मानें। यही कारण है कि स्वामी विवेकानंद आज भी कर्त्तव्यबोध की जीवंत प्रतिमा के रूप में हमारे सामने उपस्थित हैं।

आज के युग में, जब अधिकारों की चर्चा अधिक और कर्त्तव्यों की स्मृति कम होती जा रही है, स्वामी विवेकानंद का चिंतन हमें संतुलन सिखाता है। वे हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची स्वतंत्रता कर्त्तव्यपालन से आती है, और सच्चा सुख सेवा में निहित है। उनका प्रेरक व्यक्तित्व आज भी यह संदेश देता है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से का कर्त्तव्य ईमानदारी से निभाए, तो समाज स्वतः श्रेष्ठ बन जाएगा।

 स्वामी विवेकानंद केवल एक संन्यासी या विचारक नहीं, बल्कि सर्वाेत्तम कर्त्तव्यबोध की प्रेरणा देने वाले युगद्रष्टा थे। उनके विचार समय की सीमाओं से परे हैं और उनका जीवन एक ऐसा दीपक है, जो आज भी मानवता के लिए कर्त्तव्य, करुणा और साहस के पथ पर राह दिखाते हुए आलोकित करता हैं। ऐसे प्रेरक व्यक्त्तिव के  लिए शब्द सुमन अर्पित करते हुए बहुत गर्व की अनुभूति हो रही है।

दीप्त  हो उठी दिशाएं। 

पाकर पुण्य प्रकाश तुम्हारा।।

लिखा जा चुका।

सुनहरे अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।।