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पर्यावरण संरक्षण के लिए धन से ज्यादा धुन की जरूरत

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पर्यावरण संरक्षण के लिए धन से ज्यादा धुन की जरूरत

बारहमासी हो चुकी जल की समस्या गर्मियों में चरम पर होती है। शहरों के गरीब और मध्यमवर्गीय तबके में बूंद-बूंद के लिए हाहाकार मचा रहता है। बिडंबना तो यह है कि इस विकराल समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जाता हैं। सरकारों के  साथ आम जन में भी जल संरक्षण के प्रति संजीदगी दिखाई नहीं देती है। शायद लोगों को लगता है कि उनके प्रयास से कुछ नहीं होने वाला है। जमीन पर लगातार कंक्रीट की चादर बिछाई जा रही है, जिसके कारण भूमि में पानी के रिसाव पर पहरा लग गया है। प्रकृति के अत्यधिक दोहन से धरती का गर्भ सूखता ही जा रहा है।

बारिश से पहले पाल बांधने वाला समाज आज बांधों के भंवर में फंस गया है। यहीं कारण हैं कि सूखे को झेलने वाला राजस्थान का बाड़मेर बाढ़ के थपेड़ों को सहने को मजबूर है। बिहार को तारने वाले यह बांध अब उसको भी डुबाने लगे हैं। अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में आने वाली इन प्राकृतिक समस्याओं का इलाज है। पहले सामुदायिक जल प्रबंधन के तहत लोग बारिश की बूदों को सहजने के लिए अपने घर की छत के जल को नीचे एक कुंड में साफ-सुथरे तरीके से एकत्र करते थे। बरसात का पानी खेत की फसल की जरुरत को पूरा करने के साथ अन्य क्षेत्रों के जल के साथ, पास के तालाब में इकट्ठा होता था। बाद में इस जल से खेती और घरेलू जल की जरुरतें पूरी की जाती थी।

रेगिस्तानी भूमि में करीब पांच छह फूट नीचे चूने की परत बरसाती पानी को रोके रहती थी। बाद में इसका उपयोग पीने व अन्य कामों के लिए किया जाता था। इस तरह सूखे की मार में यह पाल-ताल समाज को बचाकर रखते थे। अब हम इस तरह सामुदायिक जल प्रबंधन को भूलकर राज्य या भारत सरकार के बनाए बांधों की ओर देखने लगे हैं। ये बांध जहां नदियों को बांधकर उनकी हत्या करते हैं। वहीं, दूसरी ओर बाढ़ लाकर कहर बरसाते हैं। 

बांध बनने से सामान्य वर्षों में जनता को लाभ मिलता है। लेकिन, बाढ़ आने पर पानी बांध को तोड़कर एकाएक फैलता है। कभी-कभी इसका प्रकोप इतना भयंकर होता है कि चंद घंटों में दस-बारह फुट तक पानी भी बढ़ जाता है और जनजीवन को तबाह करके रख देता है। बांध बनने से सिल्ट फैलने की बजाए बांधों के बीच जमा हो जाती है। इससे बांध का क्षेत्र ऊपर उठ जाता है। जब बांध टूटता है तो यह पानी वैसे ही तेजी से फैलता है जैसे मिट्टी का घड़ा फूटने पर बांधों से पानी के निकास के रास्ते अवरूद्ध हो जाते हैं। दो नदियों पर बनाए बांधों के बीच पचास से सौ किलोमीटर का एरिया कटोरानुमा हो जाता है। बांध टूटने पर पानी इस कटोरेनुमा क्षेत्र में एकट्ठा हो जाता है और इसका निकलना मुश्किल हो जाता है। इससे बाढ़ का प्रकोप शांत होने में काफी समय लगता है। 

इन समस्याओं के चलते बांध बनने से परेशानियां बढ़ी हैं। जाहिर है कि बांध बनाने की वर्तमान पद्धति कारगर नहीं है। सामुदायिक जल प्रबंधन होने से पाल-ताल बनने बंद हो गए हैं, जिससे हमें हर साल बाढ़ विभीषिका से दो-चार होना पड़ रहा है। 

अंधाधुंध बांध बनाने की वर्तमान नीति पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। पहले विकल्प में नदियों के पर्यावरणीय प्रवाह को बरकरार रखा जाना चाहिए। दूसरा विकल्प उंचे और स्थायी बांध बनाने की वर्तमान नीति का है। तीसरा विकल्प प्रकृतिप्रस्त बाढ़ के साथ जीने के लिए लोगों को सुविधा मुहैया कराने का है। इसमें फ्लड रूफिंग के लिए ऊंचे सुरक्षित स्थानों का निर्माण, सुरक्षित संचार एवं पीने के पानी इत्यादि की व्यवस्था शामिल है, जिससे बाढ़ के साथ जीवित रह सकंे। धरती के ऊपर बड़े बांधों से अति गतिशील बाढ़ का प्रकोप बढ़ने लगा है। इसे रोकने के लिए जल के अविरल प्रवाह को बनाए रखना होगा। इस काम से ही जल के सभी भंडारों को भरा रखा जा सकता है। चूंकि, बाढ़ और सूखा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए इन दोनों के समाधान हेतु जल का सामुदायिक जल प्रबंधन ताल-पाल और झाल से ही संभव है।