कुम्भ: संस्कारों के सागर मंथन से पुनर्जागरण
सम्पूर्ण विश्व में भारत एकमात्र ऐसा देश है जो नैसर्गिक रूप से निर्मित है। जिसकी सीमाएं पृथ्वी के मुकुट सदृश्य अविचल पर्वतों और पुण्य सलिला नदियों ने अपने आंचल से रेखांकित की हैं। इस पावन धरा पर ईश्वर की अहेतुकी कृपा से कई लीलाएं हुईं। मानव सभ्यता का अंकुर यहां सर्वप्रथम प्रस्फुटित हुआ। वेद के रूप में सृष्टि के ज्ञान का अवदान भी इसी भूमि को मिला। सप्त ऋषियों के रूप में जीवन का मार्गदर्शन करने वाले ज्योतिपुंजों ने इस भूमि को अपने तप से सिक्त किया। हरिश्चंद्र, जनक, श्री राम और श्री कृष्ण, चंद्रगुप्त मौर्य, विक्रमादित्य और हर्षवर्धन जैसे पराक्रमी, धर्म और नीति के ज्ञाता सहस्त्रों प्रतापी राजाओं ने भारतीय इतिहास के पृष्ठों को स्वर्णांकित किया है।
दैवयोग से यह भारत भूमि समुद्र मंथन एवं देवासुर संग्राम की कथाओं से अभिमंत्रित है। समुद्र मंथन भारत की सनातन सभ्यता का अद्भुत आख्यान है। इसमें धर्म, नीति, कूटनीति, नियम, प्रबंधन और संगठन रचना सन्निहित है। मंथन से आविर्भूत 14 रत्नों में हमारी संस्कृति का ऐश्वर्य समाया है। मंथन कथा में अमृत का महत्व है, तो ‘कुम्भ’ के रूप में यह मानव सभ्यता के सम्मिलित प्रयास का सबसे विशाल प्रारूप भी है।
जीवन आदि से अंत तक निरंतर सृजन है, वैसे ही संस्कृति भी निरंतर संस्कार क्रम है। विचार, ज्ञान, अनुभव, कर्म आदि सभी क्षेत्रों में, जब तक हमारा सृजन क्रम चलता रहता है, तब तक हम जीवित हैं। संस्कृति के संबंध में भी, यही बात सत्य है परन्तु विकास की किसी स्थिति में भी जैसे शरीर और अन्तर्जगत के मूल तत्व नहीं बदलते, उसी प्रकार संस्कृति के मूल तत्वों का बदलना भी संभव नहीं। प्रख्यात साहित्यकार महादेवी वर्मा ने अपने विचारों में जीवन, सृजन और संस्कृति के सहज अंतर्संबंध और उसकी निरंतरता को सरलता से समझाने की कोशिश की है। उनकी कसौटी पर भारतीय संस्कृति दो सर्वथा विपरीत आक्षेपों से संघर्ष करती नजर आती है। पहला यह कि यह अपने विकास क्रम में आनंददायक स्थिति को प्राप्त करने के बाद यह संस्कृति कहीं न कहीं जड़ हो गयी। निरंतर सृजन और विकास का उसमें सर्वथा अभाव रहा। दूसरा आक्षेप यह कि बाहरी आक्रमणों के थपेड़ों को झेलते और अपनी विकृतियों से लड़ते हुए उसने विकास तो किया लेकिन इस क्रम में उसके मूल तत्व बदल गये।
गौर करें तो दोनों ही आक्षेप कई अवसर पर स्पष्ट रूप से सत्य प्रतीत होते हैं। भारतीय संस्कृति में आए इस विचलन के लिए निरंतर आक्रमणों और परतंत्रता के लंबे कालखंड को कारण मानना गलत न होगा। इन आक्रमणों में कई तो नितांत हिंसक स्वरूप के थे। परतंत्रता के अपेक्षाकृत बाद के कालखंड में भारतीय संस्कृति को छिन्न-भिन्न करने और नीचा दिखाने की सुनियोजित साजिश भी की गयी। हिंसा और बल द्वारा हमें जीतने की कोशिशों ने, जहां हमें शारीरिक और भौतिक रूप से कमजोर किया, वहीं हमारी सांस्कृतिक चेतना पर भी चोट की। वेद-पुराण को गडरियों के गीत बताए जाने से लेकर देवभाषा संस्कृत को विकास में बाधक बताने वालों ने लंबे समय में अपने कुत्सित प्रयासों में सफलता पायी। एक समय ऐसा आया कि स्वयं को देखने की हमारी दृष्टि भी हमारी अपनी नहीं रही। परिणाम यह हुआ कि पहले हमारा आत्मविश्वास डिगा फिर आत्मसम्मान और फिर तो हम आत्मालोचना के आदि हो गये। आज बड़ी संख्या में अपनी संस्कृति की आलोचना में आनंद लेने वाले लोग आपको मिल जाएंगे। आज भारत की युवा पीढ़ी में पाश्चात्य प्रभाव से कुपोषित ऐसे अनेक युवा मिल जायेंगे, जिन्हें अपनी माँ, मातृभूमि और मातृभाषा अच्छी नहीं लगती। ऐसी स्थिति में कुम्भ जैसे महापर्व हमें पुनः अपनी समृद्ध संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों से स्पंदित करते हैं। हमारे जींस में, अवचेतन मन में सुप्त अवस्था में निहित सनातन संस्कारों को सक्रिय करते हैं, यह बाहर का कुम्भ हमारे भीतर भी समुद्र मंथन की स्थितियां उत्पन्न करता है जिससे हमारे भीतर भी रत्नों की प्राप्ति होती है जो हमारी चेतना को परिष्कृत करती है जिससे यह ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के साथ एकाकार होती है। यही भौतिक कुम्भ का आध्यात्मिक महत्व है। बाहर गंगा, यमुना और गुप्त सरस्वती का संगम होता है तो इस सायकोसोमेटिक बॉडी में सूक्ष्म शरीर में ऊर्जा के चैनल्स खुलते हैं, ईडा, पिंगला और सुषुम्ना का संगम हो जाता है, इसीलिए करोड़ों योगी आदि योगी शिव का रूप धारण कर इस अद्भुत समागम का हिस्सा बनते हैं।
यह हमारा दुर्भाग्य रहा कि परतंत्रता के लंबे कालखंड ने हमें अपने प्राचीन इतिहास के प्रति हीन भावना से भर दिया। हमारी अज्ञानता और निर्मलता के चलते हमें हमारी जड़ों से काटने का विदेशी विधर्मियों का षड्यंत्र काफी हद तक सफल रहा। किसी समय भौतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक शिखर पर रहने वाला हमारा भारत, कालक्रम में भुखमरी, निर्धनता और निकृष्टता का पर्याय बन गया। स्वतंत्रता के बाद ‘स्व’ के भाव जागरण का जो उपक्रम होना चाहिए था दुर्भाग्य से वह भी नहीं हो पाया। परंतु कालचक्र की अपनी गति होती है। इसके प्रभाव में पिछले लगभग एक दशक से हर भारतीय के मन में स्वयं की संस्कृति और इतिहास के प्रति एक ललक जगी है। गौरवशाली अतीत के सुनहरे अध्यायों को अपनी व्याख्या देने का मानस और साहस दोनों बना है। समुद्र मंथन की कथा की पुनर्व्याख्या इस कड़ी में एक प्रयास है। महाकुम्भ पर्व के अवसर पर हमारे पूर्वजों द्वारा प्रदत्त विराट सांस्कृतिक मंथन और उस मंथन से ऊर्जा लेकर जीवन के विविध आयामों में अपने पुरातन जीवन मूल्यों को हमारी नई पीढ़ी स्वयं में अभिसिंचित करे, जीवन पथ पर आगे बढ़ते हुए भारत के पुनर्जागरण में सहयोगी हो उस उद्देश्य से ‘समुद्र मंथन’ के मूल, आदि कुम्भ का मंथन करना अनिवार्य हो जाता है।
बिहार की ऐतिहासिक धरती पर गंगा के पावन तट के समीप सिमरियाधाम में पिछले कोई चार दशक से धूनी रमाए संत करपात्री अग्निहोत्री परमहंस स्वामी चिदात्मन जी महाराज के मन में कुम्भ की जननी स्थली और सुप्त कुम्भ स्थलों के पावन पुनर्जागरण का विचार बिन्दु कोई दो ढ़ाई दशक से आकार ले रहा था। जिस समुद्र मंथन का आख्यान हमें सभी पावन शास्त्रों में मिलता है, उस स्थली का अन्वेषण अभी तक नहीं हुआ था। स्वामी जी के प्रयासों से 2008 में इस सन्दर्भ में विद्वानों के मध्य मंथन प्रारंभ हुआ।
क्षीरसागर कहां रहा होगा? क्या आज मंदार पर्वत ही वह मंदार है, जिसे मथनी बनाकर समुद्र मंथन हुआ? या बाबा वासुकीनाथ धाम ही इस महान उपक्रम में रस्सी बने थे? आखिर और क्या-क्या प्रमाण हैं? जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि मिथिलांचल के क्षेत्र में ही उस समय समुद्र मंथन हुआ होगा? इसके साथ ही स्वामी जी ने पौराणिक काल में द्वादश स्थानों पर कुम्भ लगने की कल्पना भी दी। हरिद्वार, नासिक, प्रयाग और उज्जैन तो स्थापित कुम्भ हैं। इनके साथ-साथ आठ और ऐसे स्थान रहे जहां कुम्भ की परंपरा रही। शोध-चर्चा से मिलने वाले प्रमाणों ने किसी समय भारत के अन्य आठ स्थानों पर कुम्भ लगने की बात की भी पुष्टि कर दी। ग्रहों की विशिष्ट स्थिति में कुम्भ का योग बनता है। इस आधार पर प्रति बारह वर्षों में ऐसा योग बनता है और शास्त्रों में प्राचीन काल में ऐसे 12 स्थानों पर कुम्भ की परंपरा का उल्लेख मिलता है। दक्षिण में तमिलनाडु के एक स्थान कुम्भकोणम में आज भी प्रति 12 वर्ष में कुम्भ लगने की परंपरा है। लेकिन उक्त 12 स्थानों की सही व्याख्या और परतंत्रता कालखंड ने हमें सत्य के अन्वेषण को प्रेरित नहीं किया। पूज्य स्वामी जी के नेतृत्व में अष्ट कुम्भों का अभियान लुप्त और सुप्त कुम्भों का नवांकुर खिलाता आगे बढ़ता चला।
स्वामीजी की प्रेरणा से समुद्र मंथन स्थली के रूप में सिमरियाधाम की पुर्नस्थापना के पश्चात अष्ट कुम्भस्थली बद्रीनाथधाम, जगन्नाथपुरी, द्वारिकापुरी, रामेश्वरम, कुरुक्षेत्र, गंगासागर, कुम्भकोणम होता हुआ माँ कामाख्या धाम भी पहुंचा। भारत के सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं की जड़ें इतनी गहरी है कि थोड़े कालखंड के लिए वो भले ही सतह पर न दिखें लेकिन हमारी भाव-भूमि के तल पर उनके बीज अवश्य ही संरक्षित रहते हैं। उन पावन विचारों को किसी दिव्य दृष्टि युक्त ऋषि-संत की प्रेरणा-संरक्षण और धर्मप्राण जनता का सहयोग मिले तो ये बीज फिर से अंकुरित होने लगते हैं। अष्ट पावन स्थानों और आदि कुम्भस्थली सिमरियाधाम का पुनर्जागरण इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।




