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इतिहास

संघ कुछ करता नहीं, स्वयंसेवक कुछ छोड़ते नहीं - डॉ. मोहन भागवत जी

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संघ कुछ करता नहीं, स्वयंसेवक कुछ छोड़ते नहीं - डॉ. मोहन भागवत जी

डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा है- संघ कुछ भी नहीं करेगा, स्वयंसेवक निर्माण होने पर वे ही सब करेंगे, ऐसा जो हम पहले से कहते आए हैं, उसका यह प्रमाण है। सम्पूर्ण समाज का संगठन करना है तो ऐसे संगठन करने वाले किसी विशिष्ट पक्ष या उसके कार्यक्रम से जुड़ने से यह सम्भव नहीं होगा। उसे सब अपने लगने चाहिए और सभी को वह अपना प्रतीत होना चाहिए। हम अपने संघ कार्य द्वारा समाज परिवर्तन तथा व्यवस्था परिवर्तन का संस्कार देते हैं।

अपने देश के परम वैभव तथा सर्वांगीण उन्नति का चित्र निर्माण करते हैं। समाज का दुःख, दैन्य, दारिद्र्य स्वयंसेवक को दिखाई देता है। उसका कारण उसके ध्यान में आता है, एक विशेष प्रकार का उपचार वहाँ आवश्यक है, ऐसा लगने पर वह उसे कार्यान्वित करता है। यह सब स्वाभाविक रूप से वहाँ होता है। यह सब कुछ संघ की योजना से नहीं होता, यह सब अत्यन्त स्वाभाविक रूप से अपने उन स्वयंसेवकों द्वारा होता है जो उन पर हुए संस्कारों के कारण विविध क्षेत्रों में गए और उन्होंने वहाँ बड़े-बड़े कार्य सम्पन्न किए।

सामान्यतः समाज के लोग ऐसा समझते हैं कि संघ यह एक 'मेन ब्रांच' है और शेष अन्य विविध कार्य संघ की ब्रांचेज हैं। संघ में तो शाखा यह शब्द प्रयोग में है ही। हम ऐसे लोगों को समझाकर बताते हैं कि ये जो संस्थाएँ या संगठन आपको दिखाई देते हैं, ये सब अलग-अलग हैं। संघ इनकी मातृ-संस्था है, यह समझना भी भूल है।

इन संस्थाओं को संघ ने नहीं अपितु स्वयंसेवकों ने जन्म दिया है। इन्हें कुछ लोग अनुषांगिक क्षेत्र समझते हैं; परन्तु अनुषांगिक माने क्या? संघ के अनुषंग से आनेवाले ये नहीं हैं। ये सब संस्थाएँ स्वयंसेवकों के चिंतन से आई हैं। कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि संघ की संख्या बढ़ाने के लिए भिन्न-भिन्न निमित्त से स्वयंसेवक काम खड़े करते हैं और उनमें जुड़े लोगों को संघ से जोड़ते हैं। बस, यही विभिन्न क्षेत्रों का काम है। संघ के स्वयंसेवक यदि बाहर समाज उपयोगी काम करेंगे तो सम्पर्क में आए कुछ लोग संघ में आयेंगे ही; परन्तु वे ऐसे आवें इसके लिए ये काम शुरू नहीं किए गए हैं। संघ को अपना काम अपने ही बल पर करना है।

 || समन्वय संकल्पना, मोहनराव भागवत, अनुवादक - ओंकार भावे, सुरुचि प्रकाशन-2009, पृष्ठ-4 ||