डिजिटल समाज और मानवीय रिश्तों का पुनर्जागरण
आज का युग डिजिटल क्रांति का युग है। स्मार्टफोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने हमारे जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। संचार के साधनों में आई इस तेज़ प्रगति ने समाज की संरचना और मानवीय रिश्तों की प्रकृति को पूरी तरह बदल दिया है। भारत इस डिजिटल परिवर्तन का सबसे बड़ा उदाहरण है, देश में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 2016 में 34 करोड़ से बढ़कर 2024 तक लगभग 85 करोड़ से अधिक हो चुकी है। देश में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन औसतन 4.5 घंटे स्मार्टफोन उपयोग किया जाता है।
एक ओर जहां डिजिटल माध्यमों ने संवाद को आसान, तेज़ और वैश्विक बनाया है, वहीं दूसरी ओर रिश्तों में दूरी, कृत्रिमता और भावनात्मक शिथिलता की चुनौतियां भी उभरी हैं। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि डिजिटल समाज में मानवीय रिश्तों का स्वरूप कैसा बन रहा है? क्या वे कमजोर हो रहे हैं, या फिर किसी नए रूप में पुनर्जीवित हो रहे हैं?
किसी भी समाज की संरचना और उसमें बने रिश्तों की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि लोग एक-दूसरे से किस प्रकार संवाद करते हैं। डिजिटल तकनीक ने हमारे जीवन में जिस गति और गहराई से प्रवेश किया है, उसने समाज की संरचना और मानवीय संबंधों को अभूतपूर्व रूप से प्रभावित किया है। आज हम एक ऐसे दौर में हैं जहां समाज का लगभग हर क्षेत्र;-शिक्षा, व्यवसाय, मनोरंजन, सूचना और सामाजिक संपर्क-डिजिटल माध्यमों पर निर्भर होता जा रहा है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं है, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक स्तर पर भी बड़ा बदलाव लेकर आया है।
डिजिटल समाज में रिश्तों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले रिश्तों का निर्माण प्रत्यक्ष मुलाकातों, साथ बिताए समय, साझा अनुभवों और भावनात्मक संवाद पर आधारित होता था। लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख में शारीरिक रूप से शामिल रहते थे, जिससे रिश्तों में गहराई, विश्वास और आत्मीयता विकसित होती थी। परिवार और समुदाय का आधार प्रत्यक्ष संपर्क ही था। लेकिन डिजिटल माध्यमों के विस्तार के बाद संचार का तरीका बदल गया है। अब बातचीत चौट बॉक्स के कुछ संदेशों तक सीमित हो जाती है, भावनाएं इमोजी और स्टिकर्स के माध्यम से व्यक्त की जाती हैं, और परिवार के सदस्य एक ही घर में रहकर भी अलग-अलग स्क्रीन की दुनिया में खो जाते हैं। यह परिवर्तन सामाजिक संरचना में एक नए तरह की दूरी और निकटता दोनों को जन्म दे रहा है।
डिजिटल समाज का सबसे बड़ा सकारात्मक प्रभाव यह है कि इसने भौगोलिक दूरियों को लगभग समाप्त कर दिया है। पहले किसी सदस्य के विदेश या दूर शहर में जाने पर परिवार के साथ संवाद सीमित हो जाता था। महीनों तक पत्रों की प्रतीक्षा, महंगे फोन कॉल और सीमित संपर्क रिश्तों में दूरी पैदा कर देते थे। आज वीडियो कॉल, व्हाट्सऐप, सोशल मीडिया और ईमेल ने इस दूरी को कम कर दिया है। परिवार के लोग रोज-रोज एक-दूसरे से बात कर सकते हैं, त्योहारों और खुशियों में वर्चुअल रूप से शामिल हो सकते हैं, यहाँ तक कि बच्चों की गतिविधियां भी लाइव देखी जा सकती हैं। यह सुविधा परिवारों को मानसिक रूप से पहले से अधिक जोड़े रखती है।
डिजिटल माध्यमों ने कई पुराने रिश्तों को पुनर्जीवित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्कूल और कॉलेज के मित्र, दूर के रिश्तेदार, पुराने सहकर्मी-जो समय और दूरी के कारण संपर्क से बाहर हो चुके थे, वे सोशल मीडिया के कारण फिर से एक-दूसरे के जीवन में शामिल हो पाए हैं। कई लोगों के लिए यह तकनीक भावनात्मक रूप से बड़ी राहत साबित हुई है, क्योंकि इससे उन्हें पुराने संबंधों का सहारा और परिचय का भाव मिला है।
नए संबंधों के निर्माण में भी डिजिटल प्लेटफॉर्म अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। समान रुचियों वाले लोग अब आसानी से एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। चाहे वह संगीत हो, फोटोग्राफी, किताबें, फिटनेस, व्यवसाय या करियर-हर क्षेत्र में ऑनलाइन मंच लोगों को अवसर प्रदान करते हैं। कई लोग डिजिटल समुदायों के माध्यम से प्रेरणा, सहयोग और समर्थन प्राप्त कर रहे हैं, जो पहले संभव नहीं था। कोविड-19 महामारी के दौरान इसकी सबसे बड़ी मिसाल देखने को मिली। भारत में लॉकडाउन के दौरान औसत वीडियो कॉलिंग में लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। ऑनलाइन स्कूल, वर्चुअल रिश्ते और वीडियो मीटिंग्स ने भावनात्मक जुड़ाव की डोर टूटने नहीं दी। कोरोना काल में स्कूल और कॉलेज भी बंद थे। लेकिन ऑनलाइन कक्षाएं चलाकर इस कमी को बहुत हद तक दूर किया गया।
लेकिन इस डिजिटल चमक के पीछे कई गंभीर चुनौतियां भी छिपी हुई हैं। डिजिटल संवाद ने प्रत्यक्ष मानवीय संपर्क को काफी कम कर दिया है। आमने-सामने संवाद में चेहरे के हाव-भाव, आवाज की गर्माहट, शरीर की भाषा और स्पर्श का अनुभव शामिल होता है, जो भावनात्मक गहराई को बढ़ाता है। डिजिटल संचार में यह सब अनुपस्थित होता है, जिसके कारण रिश्ते सतही होने लगे हैं। लोग भावनाओं को गहराई से महसूस करने के बजाय उन्हें प्रतीकों और संदेशों के माध्यम से व्यक्त करने में सहज हो गए हैं।
सोशल मीडिया पर दिखावे की संस्कृति ने भी रिश्तों की गुणवत्ता को प्रभावित किया है। वहां संबंध अक्सर लाइक, कमेंट और पोस्ट पर निर्भर होते हैं। लोग अपने वास्तविक जीवन से अधिक अपनी ऑनलाइन छवि को सुंदर और आकर्षक दिखाने में व्यस्त रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप रिश्तों में तुलना की भावना, असुरक्षा और प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। रिश्तों का मूल्य उनकी गहराई से नहीं, बल्कि उनकी दृश्यता और लोकप्रियता से आंका जाने लगा है। इससे आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
डिजिटल रिश्तों की एक और बड़ी समस्या उनकी नाजुकता है। डिजिटल माध्यमों से रिश्ते बहुत जल्द बन जाते हैं, लेकिन उतनी ही तेजी से टूट भी जाते हैं। एक संदेश का देर से जवाब देना, किसी पोस्ट पर प्रतिक्रिया न करना या किसी गलतफहमी के कारण लोग रिश्ते समाप्त तक कर देते हैं। इसमें धैर्य और सहनशीलता कम होती है, जिससे संबंध लंबे समय तक टिक नहीं पाते। पहले रिश्ते समय, अनुभव और विश्वास से मजबूत होते थे, लेकिन अब वे तात्कालिकता और सुविधा पर आधारित होते जा रहे हैं।
डिजिटल जुड़ाव के बावजूद अकेलापन भी बढ़ रहा है। यह विडंबना है कि लोग ऑनलाइन हजारों लोगों से जुड़े होने के बावजूद मानसिक रूप से पहले से अधिक अकेला महसूस करते हैं। डिजिटल दुनिया में भावनाओं की वास्तविक साझा प्रक्रिया कम होती है। लोग मुश्किल समय में भले ही ऑनलाइन सांत्वना प्राप्त कर लें, लेकिन वह उसी गर्माहट और समर्थन का अनुभव नहीं देती जो प्रत्यक्ष उपस्थिति से मिलता है।
आमने-सामने बनते रिश्तों और डिजिटल रिश्तों के अपनापन में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। प्रत्यक्ष संबंध धीरे-धीरे अनुभवों, विश्वास और साथ बिताए समय के माध्यम से ढलते हैं। उनमें एक स्थिरता और मजबूती होती है, जो जीवन के उतार-चढ़ाव में सहारा बनती है। वहीं डिजिटल रिश्तों में यह प्रक्रिया बहुत तेज होती है। लोग तुरंत जुड़ जाते हैं, लेकिन उस जुड़ाव में वह आत्मीयता और भावनात्मक गहराई नहीं होती जो वास्तविक जीवन में विकसित होती है। यही कारण है कि नए रिश्ते जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही तेजी से टूट भी जाते हैं।
यह कहा जा सकता है कि डिजिटल समाज ने मानवीय रिश्तों को समाप्त नहीं किया है, बल्कि उनके स्वरूप को बदल दिया है। तकनीक ने भौतिक दूरियों को कम कर दिया है। परिवार में किसी के दूर जाने से जो दूरी पहले रिश्तों में दीवार बन जाती थी, वह अब पहले से कम महसूस होती है। लोग भले ही अलग स्थानों पर रहते हों, लेकिन संपर्क में रहते हैं। दूरियां नजदीकियों में बदल गई हैं। यह डिजिटल समाज का सबसे बड़ा योगदान है।
लेकिन इसके साथ यह भी स्वीकार करना होगा कि रिश्तों में गर्माहट और अपनापन कम हुआ है। आमने-सामने बैठकर समय बिताने से जो आत्मीयता विकसित होती है, वह डिजिटल माध्यमों से संभव नहीं हो पाती। डिजिटल रिश्ते शुरुआत करने के लिए अच्छे साधन हैं, लोगों को जोड़ने में सक्षम हैं, लेकिन वास्तविक अपनापन तभी बनता है जब रिश्तों को साथ, समय और भावनात्मक साथ मिलता है। अगर संबंध केवल ऑनलाइन संवाद तक सीमित रह जाएं, तो वे लंबे समय तक टिकने में कठिनाई अनुभव करते हैं।
इसलिए आवश्यक है कि डिजिटल समाज में रहते हुए भी लोग प्रत्यक्ष संबंधों के महत्व को समझें। तकनीक को माध्यम बनने दें, आधार नहीं। बातचीत स्क्रीन पर शुरू हो सकती है, लेकिन उसे वास्तविक जीवन में आगे बढ़ाने से ही रिश्तों में गहराई आएगी। मानव हृदय को भावनात्मक समर्थन, स्पर्श और साथ की आवश्यकता होती है, जिसे कोई भी तकनीक पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। डिजिटल नजदीकियां बढ़ी हैं, पर भावनात्मक दूरी भी बढ़ी है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इस संतुलन को कैसे बनाए रखें और रिश्तों की आत्मा, इसके अपनेपन को कैसे जीवित रखें।
रिश्ते केवल संदेशों और कॉल्स से नहीं बनते, वे विश्वास, धैर्य, उपस्थिति और साथ से मजबूत होते हैं। इसलिए तकनीक को हमें जोड़ने दें, पर रिश्तों की नींव उसी पुराने, मानवीय ढंग से रखी जाए, जहां आँखों का संपर्क और दिलों का जुड़ाव केंद्रीय हो। डिजिटल दुनिया ने दूरियों को घटाकर नजदीकियों का नया अर्थ दिया है, पर इन नजदीकियों को रिश्तों की सच्ची आत्मा में बदलना अब हमारी जिम्मेदारी है।
लेखक पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग टेक्निया इंस्टीट्यट ऑफ स्टडीज, आईपी यूनिवर्सिटी, दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर है।




