खेतों की पगडंडियों से राष्ट्रमंडल के मंच तक
”जहाँ पसीने की हर बूँद में संकल्प पलता है,
वहीं विजय का तिरंगा सबसे पहले खिलता है।“
उत्तर प्रदेश केवल भारत की राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना की भूमि नहीं है; यह खेल-प्रतिभाओं की भी उर्वर धरती है। गंगा-यमुना के दोआब से लेकर पूर्वांचल के गाँवों तक, बुंदेलखंड की कठोर मिट्टी से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अखाड़ों और खेतों तक यहाँ की पगडंडियों पर दौड़ते, मिट्टी में कुश्ती लड़ते, निशाना साधते और सीमित साधनों में सपनों को सींचते युवाओं ने राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय खेल-मंच पर भी भारत का गौरव बढ़ाया है।
उत्तर प्रदेश के खेल-इतिहास को यदि गाँवों के नामों के साथ पढ़ा जाए तो यह किसी प्रेरक महाकाव्य से कम नहीं लगता। सिसौली की अलका तोमर, पुरबालियान की दिव्या काकरान, कालिना के सौरभ चौधरी, भैंसा के रवि कुमार, ददूपुर की पूनम यादव, इकलौता की पारुल चौधरी और सिरसा के गुलवीर सिंह,ये केवल खिलाड़ी नहीं, बल्कि उस युवा उत्तर प्रदेश की जीवंत तस्वीर हैं, जहाँ अभाव प्रतिभा को रोक नहीं पाता।
किसी भी महान खिलाड़ी की यात्रा पदक से नहीं, बल्कि उस छोटे से मैदान से शुरू होती है जहाँ वह पहली बार अपने सपने को पहचानता है। उत्तर प्रदेश के युवाओं की यही विशेषता है। गाँव का अखाड़ा हो या विद्यालय का मैदान, गन्ने के खेत की मेड़ हो या कच्ची सड़क,यहीं से अनेक राष्ट्रीय सितारों की यात्रा प्रारंभ हुई।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुश्ती परंपरा ने देश को अनेक प्रतिभाएँ दी हैं। मेरठ जिले के सिसौली गाँव की अलका तोमर इसका प्रेरक उदाहरण हैं। उन्होंने 2010 दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में 59 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती में स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय महिला कुश्ती को नई पहचान दी। इसी परंपरा को आगे बढ़ाया मुजफ्फरनगर के पुरबालियान गाँव की दिव्या काकरान ने। आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के बीच संघर्ष करते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में भारत का प्रतिनिधित्व किया और राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतकर सिद्ध किया कि बेटियां अवसर मिलने पर मिट्टी को भी सोना बना सकती हैं।
वाराणसी की धरती ने भी कुश्ती के क्षेत्र में अपना परचम फहराया। नरसिंह पंचम यादव, जिनका संबंध वाराणसी क्षेत्र से है, ने 2010 दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में 74 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती में स्वर्ण पदक जीता। उनके प्रदर्शन ने पूर्वांचल की कुश्ती परंपरा को राष्ट्रीय पहचान दी।
युवा खेल-प्रतिभाओं की एक और विशिष्ट पहचान है-
शूटिंग में मेरठ के निकट कालिना गाँव के सौरभ चौधरी ने छोटी उम्र में ही भारतीय शूटिंग को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्होंने 2018 युवा ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता और एशियाई खेलों में भी स्वर्ण पदक हासिल किया। गाँव में साधारण संसाधनों से शुरू हुआ उनका सफर अंतरराष्ट्रीय शूटिंग रेंज तक पहुँचा। मेरठ के भैंसा गाँव के रवि कुमार ने भी निशानेबाजी में देश का गौरव बढ़ाया। 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने 10 मीटर एयर राइफल में कांस्य पदक जीता। उनके पास प्रारंभिक दौर में अत्याधुनिक संसाधन नहीं थे; परिवार के सहयोग और अपने संकल्प के बल पर उन्होंने अपनी राह बनाई।
इन खिलाड़ियों की कहानियाँ बताती हैं कि प्रतिभा महानगरों की मोहताज नहीं। कभी-कभी भारत का अगला चैंपियन किसी महानगर के वातानुकूलित प्रशिक्षण केंद्र में नहीं, बल्कि गाँव की धूल में अपना पहला अभ्यास कर रहा होता है।
वाराणसी के ददूपुर गाँव की पूनम यादव की कहानी उत्तर प्रदेश की बेटियों के अदम्य साहस की कहानी है। किसान परिवार से आने वाली पूनम ने सीमित संसाधनों के बावजूद वेटलिफ्टिंग को अपना जीवन बनाया। 2014 राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक के बाद 2018 गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने 69 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। गाँव लौटने पर उनका जिस प्रकार स्वागत हुआ, वह इस बात का प्रतीक था कि एक बेटी की विजय पूरे गाँव की विजय बन जाती है। पूनम की कहानी केवल पदक की कहानी नहीं है; यह उस सामाजिक परिवर्तन की कहानी है जिसमें ग्रामीण भारत की बेटियाँ परिवार की सीमाओं से निकलकर विश्व-मंच पर अपनी पहचान गढ़ रही हैं।
उत्तर प्रदेश की खेल-यात्रा में महिला खिलाड़ियों का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मेरठ की प्रियंका गोस्वामी ने 2022 बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में 10,000 मीटर रेस वॉक में रजत पदक जीतकर इतिहास रचा। बस कंडक्टर की बेटी से राष्ट्रमंडल पदक विजेता बनने तक का उनका सफर कठिन परिश्रम, धैर्य और आत्मविश्वास की मिसाल है।
इसी श्रृंखला की नई और तेजस्वी कड़ी हैं मेरठ के इकलौता गाँव की पारुल चौधरी। कभी नंगे पाँव दौड़ने वाली यह बेटी आज भारत की अग्रणी लंबी दूरी की धाविकाओं में शामिल है। 2026 राष्ट्रमंडल खेलों में उत्तर प्रदेश की ओर से भारतीय दल में पारुल का चयन इस बात का प्रमाण है कि गाँव की पगडंडी से शुरू हुई दौड़ अब विश्व के सिंथेटिक ट्रैक तक पहुँच चुकी है।
वर्ष 2026 ने उत्तर प्रदेश के खेल इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में उत्तर प्रदेश के अनेक खिलाड़ियों ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। भारतीय दल में गुलवीर सिंह, कुलदीप कुमार, रोहित यादव, पारुल चौधरी, प्रियंका गोस्वामी, नीरू पाठक, अस्मिता डे, आदित्य प्रताप सिंह तथा पैरा एथलीट सागर थायत और श्रेयांश त्रिवेदी जैसे खिलाड़ी शामिल रहे।
इनमें अलीगढ़ के सिरसा गाँव के गुलवीर सिंह की कहानी विशेष रूप से प्रेरक रही। खेतों की पगडंडियों पर दौड़ते हुए उन्होंने ग्लासगो के अंतरराष्ट्रीय ट्रैक तक का सफर तय किया और 10,000 मीटर में रजत पदक जीतकर इतिहास रचा। राष्ट्रमंडल खेलों में इस स्पर्धा में पदक जीतने वाले पहले भारतीय पुरुष एथलीट बने। गुलवीर की सफलता का अर्थ केवल एक रजत पदक नहीं है। इसका अर्थ है, गाँव की मिट्टी ने विश्व के ट्रैक पर अपनी पहचान लिख दी। उत्तर प्रदेश के इन युवाओं की यात्रा में एक समान सूत्र दिखाई देता है संकल्प, संघर्ष, अनुशासन और परिवार का विश्वास। इन खिलाड़ियों ने यह मिथक तोड़ा है कि अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनने के लिए केवल महानगरों में जन्म लेना आवश्यक नही है बल्कि वो दृढ़ संकल्प व मजबूत इरादों के साथ गाँव की पगडंडियों से राष्ट्रमंडल खेलो का सफर तय कर सकते है।
राष्ट्रमंडल खेलों में उत्तर प्रदेश का योगदान: कुश्ती, निशानेबाजी, भारोत्तोलन, एथलेटिक्स और अन्य खेलों में प्रदेश के युवाओं ने भारत की पदक-यात्रा को गति दी है। 2010 के दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों से लेकर 2018 के गोल्ड कोस्ट, 2022 के बर्मिंघम और 2026 के ग्लासगो तक यह यात्रा निरंतर आगे बढ़ी है। उपलब्ध अभिलेखों में उत्तर प्रदेश के खिलाड़ियों के कुश्ती, शूटिंग, भारोत्तोलन, हॉकी और एथलेटिक्स में पदक दर्ज हैं।
उत्तर प्रदेश में खेलों के विकास को संस्थागत रूप देने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में लागू खेल नीतियों का उल्लेख करना यहाँ आवश्यक हो जाता है! उत्तर प्रदेश खेल नीति-2023 में जमीनी स्तर के खिलाड़ियों से लेकर एलीट खिलाड़ियों तक आर्थिक सहायता का प्रावधान किया गया है। जूनियर खिलाड़ियों के लिए ₹75,000, सब-जूनियर के लिए ₹50,000, विकासशील खिलाड़ियों के लिए ₹2 लाख और एलीट खिलाड़ियों के लिए ₹3 लाख तक वार्षिक सहायता का प्रावधान है। खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों और खेल-विज्ञान कर्मियों के लिए ₹5 लाख तक कैशलेस स्वास्थ्य बीमा तथा वरिष्ठ राष्ट्रीय स्तर या उससे ऊपर के खिलाड़ियों के लिए पेंशन व्यवस्था भी नीति का हिस्सा है।
नीति का लक्ष्य केवल पदक जीतना नहीं, बल्कि खिलाड़ी के संपूर्ण जीवन-चक्र, प्रतिभा पहचान, प्रशिक्षण, पोषण, स्वास्थ्य, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर और करियर को सुरक्षित करना है। राज्य ने ओलंपिक, एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों के पदक विजेताओं के लिए आकर्षक पुरस्कार व्यवस्था भी विकसित की है। राज्य सरकार के उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार राष्ट्रमंडल खेलों/विश्व कप स्तर की उपलब्धियों के लिए स्वर्ण पर ₹1.5 करोड़, रजत पर ₹75 लाख और कांस्य पर ₹50 लाख तक पुरस्कार का प्रावधान किया गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 में मेरठ में मेजर ध्यानचंद खेल विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी। लगभग ₹700 करोड़ की अनुमानित लागत वाली इस संस्था में हॉकी, फुटबॉल, एथलेटिक्स, शूटिंग, तीरंदाजी, भारोत्तोलन, जिम्नास्टिक, तैराकी, साइकिलिंग सहित अनेक खेलों की अत्याधुनिक सुविधाएँ प्रस्तावित हैं। इसकी प्रशिक्षण क्षमता 1,080 खिलाड़ियों,540 पुरुष और 540 महिला खिलाड़ियों की है।
यह केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की खेल-प्रतिभा को गाँव से विश्व-मंच तक पहुँचाने का संस्थागत सेतु है। प्रधानमंत्री मोदी ”खेल“ से ”खिलाड़ी“ और ”खिलाड़ी“ से ”राष्ट्र“ पर बल देते है। प्रधानमंत्री ने खेलों को राष्ट्रनिर्माण की व्यापक दृष्टि से जोड़ा है। खेलो इंडिया, फिट इंडिया और टॉप्स जैसी पहलों ने प्रतिभा खोज, प्रशिक्षण और उच्चस्तरीय तैयारी के लिए नया वातावरण तैयार किया है।
खेलो इंडिया का मूल उद्देश्य ही जमीनी स्तर पर खेल-संस्कृति को पुनर्जीवित करना और प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ाना है। 2018 से अब तक 63,000 से अधिक खिलाड़ी ‘खेलों इंडिया गेम्स’ में भाग ले चुके हैं। 31 जुलाई 2026 को केंद्र सरकार ने ‘खेलों इंडिया’ तथा राष्ट्रीय खेल महासंघों की सहायता को और विस्तारित करते हुए 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए ₹36,441 करोड़ का संयुक्त प्रावधान स्वीकृत किया।
यह उस सोच का विस्तार है जिसमें खेल को केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि युवा शक्ति को राष्ट्रशक्ति में बदलने का साधन माना गया है। आज आवश्यकता है कि गांव-गांव खेल मैदान हों, विद्यालयों में प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षा शिक्षक हों, प्रतिभाओं की वैज्ञानिक पहचान हो और आर्थिक रूप से कमजोर खिलाड़ियों को पर्याप्त प्रशिक्षण, पोषण तथा उपकरण उपलब्ध कराए जाएँ। एक खिलाड़ी का संघर्ष व्यक्तिगत नहीं होता; उसके पीछे परिवार, गाँव और पूरे समाज की आशा होती है।
उत्तर प्रदेश के युवाओं में वह ऊर्जा है जो भारत को खेल महाशक्ति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। आवश्यकता केवल इस ऊर्जा को सही दिशा देने की है। आज जब सिरसा का गुलवीर दौड़ता है, तो उसके साथ पूरा उत्तर प्रदेश दौड़ता है, जब इकलौता की पारुल ट्रैक पर उतरती है, तो हजारों बेटियों के सपने दौड़ने लगते हैं। जब कालिना का सौरभ निशाना साधता है, तो देश की उम्मीदें लक्ष्य पर टिक जाती हैं। जब ददूपुर की पूनम भार उठाती है, तो भारतीय नारी की शक्ति विश्व के सामने उठ खड़ी होती है। यही है खेलों में उत्तर प्रदेश के युवाओं की असली कहानी है। मिट्टी से मैदान तक, मैदान से राष्ट्रीय मंच तक और राष्ट्रीय मंच से राष्ट्रमंडल की रोशनी तक। यह यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है। यह तो केवल शुरुआत है, जहाँ हर गाँव कह सकता है।
”हमारी मिट्टी में केवल अन्न ही नहीं,
विश्व-विजेता भी उगते हैं।“
”खेलेगा युवा-जीतेगा उत्तर प्रदेश,
जीतेगा उत्तर प्रदेश-तो जीतेगा भारत!“




