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भारत ने सदैव विश्व को सांस्कृतिक मूल्य और सह अस्तित्व का संदेश दिया है – नरेंद्र ठाकुर जी

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उज्जैन

संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त श्री धन्वंतरि आयुर्वेद चिकित्सा महाविद्यालय में ‘प्रमुख जन संवाद’ आयोजित किया गया, जिसमें सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स, समाचार पत्रों के संपादक, ब्लॉगर और स्तंभकार शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में विचार निर्माण और सकारात्मक विमर्श को दिशा देना रहा। मुख्य वक्ता अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने संघ के उद्देश्य, राष्ट्र निर्माण की अवधारणा और ‘पंच परिवर्तन’ पर विस्तार से विचार रखे।

उन्होंने कहा कि आज के दौर में समाज केवल घटनाओं से नहीं, बल्कि उनके विश्लेषण और प्रस्तुतिकरण से अधिक प्रभावित होता है, जिसमें लेखकों और विचारकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। संघ का उद्देश्य भारत को ‘परम वैभव’ की स्थिति तक पहुंचाना है। इसका अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि ऐसा राष्ट्र बनाना है जो हर क्षेत्र में अग्रणी हो और विश्व में शांति का संदेश दे। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की शक्ति कभी आक्रामक नहीं रही, बल्कि उसने सदैव विश्व को सांस्कृतिक मूल्य और सह अस्तित्व का संदेश दिया है। भारत के मजबूत बनने से विश्व में स्थिरता और शांति सुनिश्चित होती है। संघ के स्वयंसेवक प्रतिदिन इसी संकल्प के साथ कार्य करते हैं कि भारत माता की जय विश्वभर में गूंजे, लेकिन बिना किसी पर अपनी विचारधारा थोपे।



स्वाधीनता से आत्मनिर्भरता तक: ‘स्व’ का बोध आवश्यक

उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति का आधार ‘स्व’ की भावना है – स्वदेशी, स्वभाषा और स्वावलंबन। यदि देश को आत्मनिर्भर बनाना है तो हमें अपने मूल्यों, परंपराओं और भाषा पर गर्व करना होगा। उदाहरण देते हुए कहा कि अपनी मातृभाषा में हस्ताक्षर करना भी आत्मसम्मान का प्रतीक है। वैश्विक संकटों के बीच आत्मनिर्भरता ही देश को सुरक्षित रख सकती है। स्वदेशी उत्पादों को अपनाने से न केवल आर्थिक मजबूती आएगी, बल्कि राष्ट्र की स्वतंत्र पहचान भी सुदृढ़ होगी। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे ‘स्व’ की भावना को अपने जीवन में व्यवहारिक रूप से अपनाएं।

उन्होंने भारतीय परिवार व्यवस्था को समाज की सबसे बड़ी शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसके संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों से है, जिसे दुनिया भी स्वीकार करती है। हालांकि आधुनिकता के दौर में इन मूल्यों में कुछ कमी आई है, जिसे सुधारने की आवश्यकता है। नई तकनीकों का उपयोग जरूरी है, लेकिन उसका विवेकपूर्ण उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि परिवार सशक्त रहेगा तो समाज और राष्ट्र भी मजबूत होंगे। संस्कारों से ही आने वाली पीढ़ी सही दिशा में आगे बढ़ेगी।

समाज परिवर्तन के पांच सूत्र

संघ ने समाज में परिवर्तन के लिए ‘पंच परिवर्तन’ का आह्वान किया है। इसमें सामाजिक समरसता, स्व का बोध, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्तव्य शामिल हैं। उन्होंने कहा कि जाति, भाषा या अन्य आधार पर भेदभाव समाप्त करना जरूरी है। पर्यावरण के संदर्भ में पेड़ लगाने, पानी बचाने और प्लास्टिक हटाने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। साथ ही, नागरिकों का नियमों का पालन करना और अनुशासन में रहना भी उतना ही आवश्यक है। ये पांच सूत्र व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक परिवर्तन लाने में सक्षम हैं, लेकिन इसके लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है।

कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख जनों ने संघ और उसके कार्य को लेकर अपनी जिज्ञासा भी रखी। मुख्य वक्ता ने जिज्ञासाओं का समाधान किया।

भ्रष्टाचार को समाप्त करने में संघ की भूमिका पर उन्होंने कहा कि संघ मूल रूप से व्यक्ति निर्माण का कार्य करता है। शाखा में ऐसे संस्कार दिए जाते हैं, जिससे स्वयंसेवक अपने जीवन में ईमानदारी अपनाए और भ्रष्टाचार से दूर रहे। संगठन के रूप में संघ आंदोलन नहीं करता, लेकिन स्वयंसेवक समाज में चल रहे अभियानों का समर्थन करते हैं। दीर्घकालीन समाधान के लिए चरित्र निर्माण को सबसे प्रभावी उपाय माना गया है।

संघ प्रत्यक्ष रूप से रोजगार योजनाएं नहीं चलाता, लेकिन स्वावलंबन और स्वदेशी के विचार के माध्यम से युवाओं को प्रेरित करता है। विभिन्न संगठनों और मंचों के जरिए युवाओं में उद्यमिता की भावना विकसित होती है। उद्देश्य यह है कि युवा आत्मनिर्भर बनें और समाज की आर्थिक मजबूती में योगदान दें।

सोशल मीडिया पर नकारात्मक कंटेंट को लेकर उन्होंने कहा कि सबसे पहले हमें स्वयं सकारात्मक और संस्कारित कंटेंट बनाना चाहिए। नकारात्मक सामग्री को बढ़ावा न दें और ऐसे हैंडल्स को रिपोर्ट करें। सरकार को भी सख्त नियम बनाने चाहिए, लेकिन समाज की जिम्मेदारी अधिक महत्वपूर्ण है। जितना अच्छा कंटेंट बढ़ेगा, उतना ही खराब कंटेंट स्वतः कम होता जाएगा।