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मकर संक्रांति पर्व : सूर्य उपासना से सामाजिक समरसता तक, भारतीय संस्कृति का अनुपम उत्सव

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भारत: पर्वों और उत्सवों की पुण्यभूमि

भारतभूमि उत्सवों और परंपराओं से सजी वह पावन धरा है जहाँ वर्ष का शायद ही कोई दिन बिना पर्व के हो। हमारे पर्व न केवल आनंद का स्रोत हैं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन मूल्यों, परंपराओं और संस्कृति को आगे बढ़ाने का माध्यम भी हैं।

मकर संक्रांति: एक अखिल भारतीय पर्व

मकर संक्रांति भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है, मध्य भारत में सकरात, असम में बिहू, दक्षिण भारत में पोंगल, पूर्वी भारत में संक्रांति और उत्तर भारत में लोहड़ी। यह पर्व भारत की सांस्कृतिक विविधता में एकता का सुंदर उदाहरण है।

Makar Sankranti 2026: लोहड़ी से पोंगल तक, एक त्योहार, कई नाम...इस दिन मनाया  जाएगा साल का पहला बड़ा त्योहार | Makar Sankranti 2026 Harvest Festival  Lohri Pongal Uttarayan Magh Bihu How it

भारत से एशिया तक सांस्कृतिक विस्तार

मकर संक्रांति केवल भारत तक सीमित नहीं है। थाईलैंड में इसे सोंगक्रान और कंबोडिया में मोहा संक्रान के रूप में मनाया जाता है, जो एशियाई क्षेत्र में भारतीय संस्कृति के प्रभाव और विस्तार को दर्शाता है।

खगोलीय और वैज्ञानिक महत्व

मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करते हैं। यह खगोलीय घटना हमारे पूर्वजों की वैज्ञानिक समझ का प्रमाण है। इसी कारण इस पर्व को उत्तरायण पर्व भी कहा जाता है।

सूर्य उपासना और कृतज्ञता का पर्व

सनातन धर्म में सूर्य को जीवन ऊर्जा का स्रोत माना गया है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की पूजा कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य की परंपरा इस दिन का विशेष अंग है।

दान, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व

इस पर्व पर जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और आवश्यक वस्तुओं का दान करने की परंपरा है। यह भावना समाज में करुणा, सेवा और समानता के भाव को मजबूत करती है।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मकर संक्रांति

मकर संक्रांति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छह प्रमुख उत्सवों में से एक है। संघ इसे सामाजिक समरसता के प्रतीक के रूप में मनाता है और पुरानी परंपराओं में आई कुरीतियों को खत्म करने का प्रयास करता है।  

डॉ. हेडगेवार जी का सामाजिक दृष्टिकोण

संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी का मानना था कि जब तक हिंदू समाज संगठित नहीं होगा, तब तक भारत की अस्मिता सुरक्षित नहीं रह सकती। इसी सोच के तहत संघ की पद्धति में छह उत्सवों को सम्मिलित किया गया।

खिचड़ी: समरसता का प्रतीक

मकर संक्रांति के दिन स्वयंसेवक मिलकर खिचड़ी बनाते हैं, उसे साथ बैठकर ग्रहण करते हैं और वंचित वर्गों में वितरित करते हैं। यह परंपरा सामाजिक एकता और समरसता का जीवंत प्रतीक है।


सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रबोध का पर्व

मकर संक्रांति स्वयंसेवकों को राष्ट्र की महान संस्कृति से जोड़ती है और समाज में एकात्मता एवं आत्मसम्मान का भाव जाग्रत करती है।