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‘शतक’ विचार, विरासत और राष्ट्रभाव की सिनेमाई गाथा’

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‘शतक’ विचार, विरासत और राष्ट्रभाव की सिनेमाई गाथा’

शतक केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक वैचारिक दस्तावेज है। एक ऐसी सिनेमाई यात्रा जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष को स्मरण करते हुए उसके उद्भव, विस्तार और वैचारिक आधार को परदे पर साकार करती है। यह प्रस्तुति केवल इतिहास का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि भारतीय सनातन संस्कृति, त्याग, संगठन-शक्ति और राष्ट्रभक्ति के भाव को जनमानस में पुनर्स्थापित करने का प्रयास है।

फिल्म का प्रारंभ भगवा ध्वज की प्रतीकात्मक महिमा से होता है-वह ध्वज जिसके तले छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज का स्वप्न साकार किया। यही भगवा, बालक केशव बलिराम हेडगेवार के अंतर्मन में राष्ट्रभाव की ज्वाला प्रज्वलित करता है और आगे चलकर 27 सितंबर 1925, विजयदशमी के पावन दिवस पर संघ स्थापना का आधार बनता है। फिल्म इस ऐतिहासिक क्षण को केवल घटना नहीं, बल्कि युग-संकल्प के रूप में प्रस्तुत करती है।

निर्माता वीर कपूर और निर्देशक आशीष माल की यह कृति हेडगेवार जी के जीवनवृत्त को तीव्र, किन्तु प्रभावी गति से उकेरती है। प्लेग के कारण माता-पिता के निधन की करुण पृष्ठभूमि, बालकृष्ण शिवराम मुंजे का संरक्षण, वंदे मातरम् के उद्घोष पर विद्यालय से निष्कासन, कोलकाता में चिकित्सा-शिक्षा और क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति से जुड़ाव से सभी प्रसंग उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता, साहस और राष्ट्रनिष्ठा को सशक्त रूप से रेखांकित करते हैं।

फिल्म में बाल गंगाधर तिलक से प्रेरणा, कांग्रेस में सक्रियता, असहयोग आंदोलन में सहभागिता और ब्रिटिश शासन द्वारा कारावास जैसे प्रसंगों के माध्यम से उस युग की वैचारिक उथल-पुथल को दर्शाया गया है। मालाबार विद्रोह के पश्चात वैचारिक मंथन और कांग्रेस से मोहभंग के बाद संघ स्थापना को निर्णायक मोड़ के रूप में चित्रित किया गया है। एक ऐसा मोड़, जिसने संगठन-आधारित राष्ट्रनिर्माण की दिशा को स्पष्ट किया।

फिल्म की कथा आगे बढ़ती है और लक्ष्मीबाई केलकर द्वारा राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना, महात्मा गांधी का संघ कार्यों से प्रभावित होना, तथा संगठन की बागडोर माधवराव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) को सौंपे जाने के प्रसंगों को समाहित करती है। गुरुजी के नेतृत्व में संघ का विस्तार, उस पर लगा प्रतिबंध, प्रतिबंध-निवारण के प्रयास, 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में सहभागिता और दादरा-नगर हवेली की मुक्ति जैसे अध्यायों को फिल्म प्रभावपूर्ण ढंग से सामने लाती है।

साथ ही, मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग द्वारा घोषित डायरेक्ट एक्शन डे और उससे उपजे सांप्रदायिक तनाव, कश्मीर जैसे ज्वलंत प्रश्न आदि सभी घटनाओं के माध्यम से फिल्म उस कालखंड की ऐतिहासिक जटिलताओं को उद्घाटित करती है। विनायक दामोदर सावरकर और सुभाष चंद्र बोस का उल्लेख कथा को व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक से निर्मित दृश्यांकन फिल्म को आधुनिक प्रस्तुति देता है, जबकि संवादों में निहित ओजस्विता दर्शक के अंतर्मन को उद्वेलित करती है। पृष्ठभूमि में सुखविंदर सिंह का गाया गीत ”जय जय हिंदुस्तान, भगवा है अपनी पहचान“ फिल्म के भाव-संदेश को सशक्त स्वर प्रदान करता है।

‘शतक’ का अर्थ यहां केवल सौ वर्षों की यात्रा नहीं, बल्कि एक सतत प्रवाहमान संकल्प का प्रतीक है। यह फिल्म संघ के शताब्दी वर्ष को स्मरण करते हुए हिंदुत्व की उस अवधारणा को रेखांकित करती है, जो भारतीय सनातन संस्कृति के गौरव, आत्मबल और संगठन-शक्ति को केंद्र में रखती है। यह जनमानस को यह संदेश देती है कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं का नाम नहीं, बल्कि साझा संस्कृति, परंपरा और मूल्यों की चेतना है।

समग्रतः ‘शतक’ एक ऐसी सिनेमाई प्रस्तुति है, जो इतिहास, विचार और संगठन-शक्ति को एक सूत्र में पिरोते हुए दर्शक को अपनी जड़ों से जुड़ने, राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध जगाने और सनातन सांस्कृतिक अस्मिता पर गर्व करने की प्रेरणा देती है। यह केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के लिए संकल्प का उद्घोष है। एक शताब्दी का सार और आने वाले शतक की प्रस्तावना।