बच्चों के मानसिक विकास पर वायु प्रदूषण का मंडराता गंभीर खतरा - ज्ञानेन्द्र रावत, वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद्
वायु प्रदूषण अब गंभीर जानलेवा समस्या बन गया है। हालात इस बात के सबूत हैं कि वायु प्रदूषण का असर अब हृदय, फेफड़ों, सांस, त्वचा, दमा, पाचनतंत्र से जुड़े रोगों को ही प्रभावित नहीं कर रहा है, हड्डियों, श्वसन प्रणाली, प्रजनन तंत्र से भी काफी आगे बढ़ गया है। अब यह शरीर के हर अंग को प्रभावित कर रहा और अब यह कैंसर और मेटाबोलिक विकार को भी पार कर गया है। इससे मस्तिष्क पर भी गंभीर असर पड़ रहा है जिससे डिमेंशिया का खतरा बढ़ गया है। कारण अब वातावरण में मानक से भी ढ़ाई गुणा ज्यादा प्रदूषक कण मौजूद हैं। अब तो यह इन रोगों के साथ मानसिक विकार के साथ-साथ बच्चों की बुद्धिमता पर भी असर डाल रहा है। दुनिया के शोध-अध्ययन प्रमाण हैं कि वायु प्रदूषण बच्चों के मानसिक विकास के लिए गंभीर खतरा है। यह उनकी बुद्धिमत्ता, याददाश्त, एकाग्रता और उनके सीखने की क्षमता को कम करता है।
प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कण बच्चों के दिमाग के विकास में बाधा डालते हैं जिसके परिणाम स्वरूप उनकी भाषा, कौशल, मूड नियंत्रण और व्यवहार सम्बंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। उच्च वायु प्रदूषण और गंदी हवा में रहने वाले बच्चों के आई क्यू स्कोर में मौजूद प्रदूषक तत्व बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन, उनकी सोचने-समझने की शक्ति-क्षमता और व्यवहार को सीमित कर देते हैं। यही नहीं अति सक्रियता विचार, खराब स्मृति और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई पैदा कर सकती है। यह स्थिति अवसाद और चिंता के जोखिम को और बढ़ा देती है। यातायात सम्बंधी वायु प्रदूषण इन समस्याओं की बढ़ोतरी में अहम भूमिका निभाता है।
एन पी जे क्लीन एयर नाम से प्रकाशित शोध में इस तथ्य का खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण के कारण इंसान की सोचने-समझने की शक्ति आई क्यू भी प्रभावित हो रही है। बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कुल 134 देशों में मौजूद 7800 से अधिक शहरों में सेटेलाइट से सूक्ष्म कणों के लांग-लीनियर मॉडल के इस्तेमाल कर गणना की कि वायु प्रदूषण का आई क्यू पर कितना असर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने अध्ययन के बाद कहा है कि हवा में मौजूद पी एम 2.5 (सूक्ष्म कण) की वजह से पूरी दुनिया की आबादी को 65 अरब आई क्यू अंक का नुकसान हो रहा है। उनके अनुसार पी एम कण इतने सूक्ष्म हैं कि वे शरीर के माध्यम से सीधे मस्तिष्क तक पहुंच रहे हैं। इससे दिमाग में आक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन पैदा हो रही है। धूल के इन कणों में कैडमियम, मैंगनीज और आर्सैनिक जैसी जहरीली धातुएं होती हैं जो बच्चों के मानसिक विकास के लिए बेहद हानिकारक हैं। यह खतरनाक स्थिति है।
दरअसल वैज्ञानिकों ने यह शोध ईक्यू एक संख्या मानकर किया है जो यह बताती है कि किसी व्यक्ति की सोचने, समझने, तर्क करने और समस्याओं को सुलझाने की क्षमता, उसकी उम्र के अन्य लोगों की तुलना में कितनी है। उन्होंने शोध में पाया कि हवा में मौजूद पी एम 2.5 के हर एक माइक्रोग्राम बढ़ने पर आई क्यू स्कोर में कितनी गिरावट आई है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रति व्यक्ति आई क्यू हानि का स्तर उन्नत देशों में ज्यादा है, जहां पी एम 2.5 का स्तर बहुत ज्यादा है। भारत में अत्याधिक प्रदूषण के कारण आई क्यू का नुकसान 20 अंक तक पहुंच गया है। कम और मध्यम आय वाले देश इस संकट की सबसे ज्यादा मार झेल रहे हैं। इस दृष्टि से भारत में नुकसान ज्यादा है।
शोध के अनुसार इससे बच्चों का विकास सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। यही नहीं सूक्ष्म कणों के असर से गर्भवती महिलाओं पर इसका ज्यादा खतरा है। गर्भावस्था के दौरान सूक्ष्म कणों का प्रभाव (1 से 6 अंक की हानि) या शराब के सेवन (3 से 7 अंक की हानि) जैसे स्थापित जोखिम कारकों के समान है। विकासशील देशों पर प्रदूषण की सबसे ज्यादा मार है। वहां यह नुकसान 19 अंक तक हो सकता है जबकि वैश्विक औसत 1 अंक से 2 अंक के बीच है। सबसे दुखदायी यह है कि 15 साल से कम उम्र के लगभग 2.02 करोड़ बच्चे इस प्रदूषण के शिकार हैं। इस बारे में चिकित्सकों की अभिभावकों को सलाह है कि वे अत्याधिक प्रदूषण की स्थिति में बच्चों को बाहर खेलने से रोकें। घर के अंदर एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें और बाहर जाते समय मास्क लगायें।
हकीकत यह है कि वायु प्रदूषण से हर साल तकरीबन 20 लाख से ज्यादा लोग मौत के मुंह में चले जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज 93 फीसदी बच्चे प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। वायु प्रदूषण से जुड़ी होने वाली स्वास्थ्य समस्यायें अक्सर एयरोसोल से जुड़ी होती हैं। एयरोसोल हवा में निलंबित सूक्ष्म ठोस या तरल लवण होते हैं। इनका आकार कुछ नैनोमीटर से लेकर कई माइक्रोमीटर तक हो सकता है। एयरोसोल मानव आंखों को मुश्किल से दिखाई देते हैं। एयरोसोल में यह धुंआ, कोहरा और औद्योगिक प्रदूषण कण हैं। ये कण वायुमंडल में निलंबित धूल, समुद्री नमक, ज्वालामुखी की राख, धुंआ, पेड़ों से निकलने वाला रसायन और विभिन्न प्रकार के उत्सर्जन जैसे जीवाश्म ईंधन जलने यथा कारों और कारखानों से निकलने वाला प्रदूषण और औद्योगिक प्रदूषण आदि रूपों में पाया जाता है। यह जलवायु, मौसम और शरीर में विषाक्तता सम्बंधित प्रतिक्रियाओं को जन्म देते हैं। एयरोसोल रसायनों के चलते श्वसन सम्बंधी, लीवर, तंत्रिका तंत्र, आंख और त्वचा की समस्या पैदा होती हैं। इसके लम्बे समय तक संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। यहां तक कि इसके प्रभाव से पौधे और जानवर भी अछूते नहीं रह गये हैं। एयरोसोल के कण फेफड़ों में जलन पैदा कर सकते हैं और अत्याधिक सान्द्रता के कारण श्वसन तंत्र को अवरुद्ध भी कर सकते हैं। यहां तक कि यह मृत्यु का कारण भी बन सकते हैं।
जहां तक देश की राजधानी दिल्ली का सवाल है, वह आज भी सबसे गंभीर वायु प्रदूषण का सामना करने को विवश है। इसका एक सबसे बड़ा कारण यह है कि यहां पी एम 2.5 का सालाना औसत आज भी सर्वाधिक है। चिंतनीय यह कि यहां पर गंभीर और आपात श्रेणी के वायु गुणवत्ता वाले दिनों की तादाद सबसे ज्यादा दिनों की अवधि तक बनी रहती है। हालात की भयावहता का जीता जागता सबूत है दिल्ली विधान सभा में पिछले दिनों पेश आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट जिसमें कहा गया है कि अभी प्रदूषण के मामले में दिल्ली में ढाई गुणा सुधार की जरूरत है। उसी दशा में दिल्ली वालों को सांस लेने लायक साफ हवा मिल सकेगी। दिल्ली विधान सभा की लोक लेखा समिति की रिपोर्ट भी राष्ट्रीय राजधानी में वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण से निपटने में सरकारी दावों की पोल खोलती है। उसके अनुसार प्रदूषण की निगरानी, सार्वजनिक परिवहन की बदहाली और उत्सर्जन मानकों को लागू करने में ‘गंभीर प्रणालीगत खामियां’ हैं। गौरतलब है यह रिपोर्ट कैग द्वारा किए गये आडिट पर आधारित है। समिति ने परिवहन और पर्यावरण विभागों को इन खामियों को दूर करने के लिए तत्काल और समयबद्ध सुधारात्मक कार्यवाही करने का निर्देश दिया है।
अब तो सर्दियों के दिनों में उत्तरी भारत के मुकाबले साफ माने जाने वाले देश के दक्षिणी राज्यों के प्रमुख शहर चेन्नई और बंगलुरू में वायु गुणवत्ता बिगड़ने के संकेत मिल रहे हैं जो एक खतरनाक नया जोखिम है। इसके पीछे मौसम को जिम्मेदार बताया जा रहा है। सीपीसीबी के एयर क्वालिटी मानीटरिंग डेटा पर आधारित संस्था क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण की मानें तो मौसम की बदलती स्थितियां प्रदूषण के स्तर में 40 फीसदी तक बदलाव ला सकती हैं। देश के दिल्ली, मुंबई, बंगलुरू, पटना, कोलकाता और चेन्नई जैसे प्रमुख शहरों के विश्लेषण से यह खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण को केवल उत्सर्जन की समस्या मानना अधूरा दृष्टिकोण है। विश्लेषण के अनुसार वास्तव में उत्सर्जन और मौसम के बीच की परस्पर क्रिया ही वायु गुणवत्ता को नियंत्रित करती है। उन हालात में जबकि हवा की गति कम और नमी ज्यादा होती है। तब वातावरण में ठहराव बनता है और प्रदूषण तेजी से बढ़ता है। इसलिए विभिन्न मौसमों को दृष्टिगत रखते हुए अलग-अलग लक्ष्यों का निर्धारण और मौसम आधारित कार्रवाई तंत्र विकसित करना बेहद जरूरी हो गया है।
असलियत में देश में अब वायु प्रदूषण केवल सर्दियों के मौसम का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि सालभर जारी रहने वाला गंभीर स्वास्थ्य खतरा बन चुका है। भारत में सभी श्वसन संबंधी मौतों में से एक तिहाई से अधिक वायु गुणवत्ता से जुड़ी हैं। इसके अलावा स्ट्रोक से होने वाली लगभग 40 फीसदी मौतों के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार है। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत व न्यायमूर्ति जायमाल्या बागची की आला पीठ ने सही ही कहा है कि वायु प्रदूषण की समस्या को अब सिर्फ सर्दियों की मुसीबत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। वायु प्रदूषण अब एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है। अब इसका फौरी निदान के बजाय दीर्घकालिक उपाय ढूंढना जरूरी हो गया है।
गौरतलब यह है कि शुद्ध हवा और शुद्ध पानी दोनों जीवन के अनिवार्य तत्व हैं। जाहिर है इनकी अनिवार्यता का कोई विकल्प नहीं है। इसके लिए संकीर्ण राजनीति और तंत्र की नाकामी जिम्मेदार है। इसे नकारा नहीं जा सकता। यहां इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि आज जब दुनिया के कई शहर प्रदूषण मुक्त हो चुके हैं और वहां की नदियां प्रदूषण मुक्त होकर कलकल बह रही हैं, उस दशा में हम क्यों नाकाम हो रहे हैं। यह चिंतनीय तो है ही, विचार का भी विषय है।




