इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा विश्व
इतिहास गवाह है कि जब-जब मध्य पूर्व की धरती पर अशांति के बादल मंडराए हैं, उसका कंपन पूरी दुनिया ने महसूस किया है। वर्तमान में इज़राइल, अमेरिका और ईरान के त्रिकोण के बीच उपजा तनाव मात्र एक सीमा विवाद या धार्मिक संघर्ष नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी के नए ‘महान खेल’ का हिस्सा है। एक ओर इजराइल की अस्तित्व की लड़ाई है, दूसरी ओर अमेरिका का गिरता हुआ वैश्विक दबदबा और तीसरी ओर ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं। इस महाशक्ति-द्वंद्व के बीच भारत की भूमिका एक श्मूक दर्शकश् की नहीं, बल्कि एक ‘सक्षम शक्ति’ और ‘विश्व-मित्र’ की है। आज भारत जिस तरह से इन विपरीत परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ रहा है, उससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि में अभूतपूर्व निखार आया है ।
इजराइल और ईरान के बीच बढ़ता सीधा टकराव वैश्विक कूटनीति के पुराने नियमों को बदल रहा है। अमेरिका, जो पारंपरिक रूप से इस क्षेत्र का ‘थानेदार’ रहा है, अब अपनी आंतरिक राजनीति और यूक्रेन जैसे अन्य मोर्चों के कारण रक्षात्मक मुद्रा में है। इस शक्ति के शून्य को भरने के लिए चीन और रूस जैसे देश घात लगाए बैठे हैं।
ऐसी स्थिति में भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ दुनिया के लिए एक मिसाल बन गई है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी गुट विशेष की बंधक नहीं है। जहाँ हम इजराइल के साथ रक्षा और तकनीक में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं, वहीं ईरान के साथ हमारे ऊर्जा हित और चाबहार बंदरगाह के जरिए मध्य एशिया तक पहुँचने के रास्ते जुड़े हैं। भारत की यह ‘संतुलनकारी नीति’ आज की तारीख में सबसे कठिन कूटनीतिक कार्य है, जिसे भारत कुशलता से अंजाम दे रहा है।
आर्थिक चुनौती और अवसर युद्ध का सबसे भयावह रूप आर्थिक अस्थिरता के रूप में सामने आता है। ‘रेड सी’ (लाल सागर) में हो रहे हमलों ने वैश्विक व्यापार की कमर तोड़ दी है। माल ढुलाई का खर्च बढ़ने से महंगाई का खतरा पूरी दुनिया पर मंडरा रहा है। भारत के लिए यह दोहरा संकट हैकृएक तरफ तेल की कीमतों का डर और दूसरी तरफ हमारे निर्यात पर पड़ने वाला बुरा असर।
परंतु, एक ‘सक्षम शक्ति’ वही है जो आपदा को अवसर में बदले। भारत ने अपनी ऊर्जा निर्भरता को केवल खाड़ी देशों तक सीमित न रखकर रूस और अमेरिका जैसे अन्य स्रोतों तक फैलाया है। इसके अतिरिक्त, ‘इजराइल-हमास’ संघर्ष के बीच भी भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे की चर्चा कम नहीं हुई है। यह गलियारा भविष्य में भारत को वैश्विक व्यापार का केंद्र बनाने की क्षमता रखता है। भारत आज आर्थिक रूप से इतना सशक्त है कि वह बाहरी झटकों को सहने के साथ-साथ अपनी विकास दर को भी बरकरार रखे हुए है।
आज भारत ‘विश्व गुरु’ से ‘विश्व मित्र’ तक का सफर तय करेगा: इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस संकटकाल में भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि एक ‘शांतिदूत’ और ‘जिम्मेदार राष्ट्र’ के रूप में उभरी है। यूक्रेन संकट से लेकर मध्य पूर्व के मौजूदा युद्ध तक, प्रधानमंत्री मोदी का यह वाक्य कि ‘यह युद्ध का युग नहीं ह’, वैश्विक कूटनीति का मूलमंत्र बन गया है।
आज जब दुनिया वैचारिक रूप से दो फाड़ हो चुकी है, तब भारत ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) का नेतृत्व कर रहा है। जी-20 की अध्यक्षता के बाद से भारत ने यह संदेश दिया है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान युद्ध की विभीषिका में नहीं, बल्कि कूटनीति और संवाद की मेज पर है। यही कारण है कि आज संकट के समय चाहे वह इजराइल हो, ईरान हो या अरब देश, सभी भारत की ओर एक उम्मीद भरी नजर से देखते हैं। भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ आज उसकी श्हार्ड पावरश् के साथ मिलकर एक संपूर्ण महाशक्ति का निर्माण कर रही है।
मध्य पूर्व का यह युद्ध भारत को एक कड़ा सबक भी दे रहा है कि भविष्य की लड़ाइयां केवल थल और नभ पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष, साइबर और ड्रोन तकनीक से लड़ी जाएंगी। भारत को एक ‘सक्षम शक्ति’ के रूप में तैयार रहने के लिए अपनी सैन्य शक्ति का आधुनिकीकरण तीव्र गति से करना होगा। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन न केवल हमारी सेना को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भी हमारी साख बढ़ाएगा।
हमें यह समझना होगा कि वैश्विक राजनीति में ‘शांति’ केवल वही देश स्थापित कर सकता है जो ‘शक्तिशाली’ हो। भारत आज अपनी सैन्य शक्ति, आर्थिक गति और कूटनीतिक दूरदर्शिता के संगम पर खड़ा है।
एक नए भारत का उदय भी हो रहा हो इजराइल-अमेरिका-ईरान के मध्य छिड़ा यह संघर्ष विश्व व्यवस्था के पुनर्गठन का संकेत है। इस बदलते दौर में भारत का एक ‘स्थिरता के द्वीपश् के रूप में उभरना सुखद भी है और गौरवशाली भी। भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय छवि और उसकी कूटनीतिक सफलताएं इस बात का प्रमाण हैं कि हम केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति हैं।
यह समय आत्ममुग्ध होने का नहीं बल्कि और अधिक ‘सक्षम’ और ‘सजग’ होने का है। हमें अपनी आंतरिक मजबूती और बाहरी कूटनीति को इस स्तर पर ले जाना है कि आने वाले समय में विश्व का कोई भी बड़ा निर्णय भारत की सहमति के बिना न लिया जा सके। भारत की यह यात्रा ‘विश्व कल्याण’ की भावना से ओत-प्रोत है, और यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।




