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भारतीय संस्कृति के मूल में है महिला सशक्तिकरण

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भारतीय संस्कृति के मूल में है महिला सशक्तिकरण  

वैदिक हिन्दू संस्कृति-सभ्यता, संस्कार एवं परम्पराओं के वाहक लाखों वर्ष पुराने वेदों में नारी को पुरुषों से उच्च स्थान दिया गया है। वेदों के अनुसार स्त्री यज्ञीय है अर्थात् यज्ञ के समान पूजनीय एवं पवित्र है, साथ ही ज्ञान एवं सुख समृद्धि देने वाली देवी, विदुषी, इंद्राणी जैसे अनेकों नामों से उसे सम्बोधित किया गया है। वैदिक काल में स्त्रियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति मजबूत और महत्वपूर्ण होने के साथ उसे परिवार और समाज दोनों स्थानों पर उचित सम्मान दिया जाता था। शिक्षा का समान अधिकार होने के कारण उसे समितियों और सभाओं में भाग लेने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। घुड़सवारी एवं शस्त्र चलाने में पुरुषों के समान दक्षता हासिल होने के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने के अतिरिक्त अनुष्ठान क्रियाएं सम्पन्न कराने वाले पुरोहितों एवं ऋषियों तक का दर्जा प्राप्त था। महिलाएं धर्म शास्त्रार्थ में पुरुषों के समान बढ़ चढ़ कर भाग लेती थीं इसका उदाहरण विदुषी गार्गी हैं जिन्होंने ऋषि याज्ञवल्क्य को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। नारियों को परिपक्व उम्र में स्वयंवर के द्वारा अपना वर चुनने की पूर्ण आजादी थी। वैदिक काल में स्त्रियों को पुरुषों के समान या कहें उससे ज्यादा अधिकार, सम्मान एवं स्वतंत्रता प्राप्त थी। वेदों में अनेकों ऐसे श्लोक वर्णित हैं जो नारी के अध्ययन, अध्यापन, राजनीति, श्रवण एवं वाचन में समान अधिकार के पक्षधर होने के साथ समस्त सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों में भाग लेने का वर्णन करते हैं। मैत्री, अपाला, गार्गी, विश्वआरा, रत्नावली, मुद्रा आदि कुछ ऐसी विदुषी नारियां हैं, जिनकी चर्चा वेदों में की गई है।

वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ और सशक्त थी। महिलाएं कृषि एवं बाजार हाट आदि के कार्यों में पुरूषों का हाथ बटाया करती थीं। गणिकाएं भी नृत्य, संगीत, श्रृंगार, गायन आदि में कुशल होती थीं। नृत्य व संगीत उनकी आजीविका के साधन थे, वे केवल मनोरंजन की सामग्री मात्र नहीं थीं वरन संगीत की उपासना के साथ राज्यों में युद्ध के भेदिये जैसे दुष्कर कार्यों के लिए भी समर्पित रहती थीं वे आय का एक भाग राज्य को कर के रूप में भी देती थीं। नारी द्वारा सूत कातना, वस्त्र बुनने आदि का उल्लेख भी इतिहास में मिलता है। 11वीं सदी से लेकर 18 वीं सदी के मध्य विदेशी आक्रमणकारियों एवं मुगलों के शासन काल में महिलाओं की जिदंगी बद्तर हो गई। उन पर अत्याचार होने लगे तथा अधिकारों का हनन होने के कारण उन्हें गुलामों की जिंदगी जीने को मजबूर होना पड़ा। इस काल में रानी लक्ष्मीबाई, जीजाबाई, चिन्नम्मा, बेगम हजरत महल, पद्मावती आदि कुछ ऐसी वीरांगनाएं हैं जिन्होंने अपनी बहादुरी, साहस एवं हिम्मत के बल पर स्वयं के स्वाभिमान को बचाये रखते हुए राष्ट्र की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। 19 वीं सदी में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात पुनः महिलाओं की स्थिति में सुधार शुरू हुआ। शिक्षा की अनिवार्यता ने महिलाओं को न केवल घर की चारदीवारी से बाहर निकाला बल्कि समान अधिकारों के चलते महिलाओं को पुरुषों के बराबर लाकर खड़ा किया। शिक्षा के कारण महिलाएं रूढ़िवाद की कोठरी से बाहर निकल स्वयं अपने पैरों पर खड़े होने लगीं और कभी पुरूष को बैसाखी बनाकर चलने वाली महिलाएं स्वयं अपने बलबूते आसमान छूने लगीं।

वर्तमान परिदृश्य में महिलाएं न केवल घर परिवार को भलीभांति संभाल रही हैं बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा के बल पर स्वयं को नए मुकाम पर स्थापित करने में भी सफल हो रही हैं। महिलाओं को उनकी प्रतिभा निखारने एवं आगे बढ़ाने में तत्कालीन मोदी सरकार की भी अहम भूमिका रही है। सरकार द्वारा वंचित बस्तियों की महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम एवं स्वावलंबी बनाने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। शिक्षा के अतिरिक्त महिलाओं के चहुमुखी विकास को ध्यान में रखते हुए कौशल विकास योजना के तहत युवक युवतियों को निःशुल्क प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है तथा प्रशिक्षण के उपरांत अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए बैंकों से कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराने की सरकार की योजना चालू है, ताकि घरों अथवा फैक्ट्री में कार्य करने वाली महिलाएं आर्थिक शोषण से बच सकें और छोटे पैमाने पर घर से अपना व्यापार चालू कर सकें। महिला सशक्तिकरण को लेकर वर्तमान सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास कोरोना काल में रंग लाते दिख रहे हैं। लॉकडाउन के समय जब आमजन घर की चारदीवारी के भीतर रहने को मजबूर था और काफी लोगों की नौकरी पर संकट आने के कारण रोजीरोटी छिन गई थी।उस समय महिलाओं ने अचार, पापड़, मठरी, मास्क, राखी निर्माण व हस्तशिल्प सामग्री आदि का घर से निर्माण कर उसका ऑनलाइन व्यापार चालू कर न् केवल अपने परिवार का पेट पाला बल्कि स्वयं आत्मनिर्भर बन अब अन्य लोगों को रोजगार प्रदान कर रही हैं।

आज की नारी ने यह साबित कर दिया है कि वह कोमल है पर कमजोर नहीं। उसमें पन्नाधाय का त्याग है तो रानी लक्ष्मीबाई सा साहस भी, अवनि चतुर्वेदी सी बहादुरी है तो अरुणिमा सिंह जैसा साहस भी, कल्पना चावला व सुनीता विलियम्स जैसी अंतरिक्ष विजय करने की क्षमता है तो बछेंद्री पाल जैसी पर्वत फतह करने की हिम्मत भी, पी टी उषा जैसा जीत का जज्बा है तो लक्ष्मी शाह जैसी जीवटता भी, दीपा कर्माकर जैसा जुनून है तो सुरसम्राज्ञी लता मंगेशकर जैसी मधुरता भी, स्व. सुषमा स्वराज जैसी राजनीतिज्ञ है तो इंदिरा नूई जैसी सफल व्यवसायी भी। राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक आदि सभी क्षेत्र में न जाने ऐसे कितने ही उदाहरण भरे पड़े हैं जो महिला सशक्तिकरण के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं जो ये दर्शाते हैं कि आज की नारी अबला नहीं सबला है जो विपरीत परिस्थितियों में भी सक्षम और सबल बन परिवार के साथ राष्ट्र की प्रगति,रक्षा और निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाने की हिम्मत रखती है। महर्षि दयानंद सरस्वती जी व स्वामी विवेकानंद जी का कथन था कि जब तक महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं होगा तब तक विश्व का कल्याण नहीं हो सकता, किसी भी पक्षी का एक पंख से उड़ना सम्भव नहीं है।

आज भारत सबसे तेज गति से आर्थिक तरक्की प्राप्त करने वाले देशों में शुमार हो गया है, इसमें कहीं न कहीं महिलाओं की भी अहम भागीदारी है, नारी की स्थिति में निरंतर सुधार राष्ट्र की प्रगति का मापदंड है।