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भारतीय संस्कृति में अंतर्निहित पर्यावरण संरक्षण

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भारतीय संस्कृति में अंतर्निहित पर्यावरण संरक्षण

 यह शाश्वत सत्य है कि भारतीय संस्कृति अपने स्वाभाविक स्वरूप में सदैव अरण्यक संस्कृति के रूप में प्रतिस्थापित रही है। भारतीय चिन्तन परम्परा में प्रकृति की उपासना एवं संरक्षण को सदैव आध्यात्मिक दायित्व के रूप में स्वीकार भी किया गया है। यह भी सत्य है कि भारतीय जीवन दर्शन तथा प्रकृति के मध्य सम्बन्ध सदैव सकारात्मक, सन्तुलित एवम वैज्ञानिक रहे हैं। इस कथन में कतई अतिशयोक्ति नहीं है कि भारत के अतिरिक्त शायद ही विश्व की कोई ऐसी संस्कृति है जहां प्रकृति के संरक्षण को संस्कार के रूप में नित्य जिया भी जाता है।

भारतीय सनातन शास्त्रों में प्राकृतिक शक्तियों के विभिन्न स्वरूपों की स्तुति भी इस बात का प्रमाण है कि प्रकृति के प्रति स्नेह और आस्था हमारे संस्कारों में बीजस्वरूप विद्यमान हैं।

भारतीय जीवन दर्शन में प्रकृति के प्रति प्रेम एवं समर्पण का मुख्य कारण यह भी है कि हमारे धार्मिक ग्रंथों में प्रकृति के अस्तित्व से मनुष्यता को सकारात्मक रूप से सहसम्बन्धित किया गया है।

ऋग्वेद का उद्घोष है कि नवीन पौधों को सतत रूप से रोपना मनुष्य का अनिवार्य सामाजिक दायित्व है। इसकी ऋचाएं देवताओं को तीन प्रमुख वर्गों में विभक्त किया करती हैं- जल, वायु और भूमि देवता। देवताओं का यह वर्गीकरण पहाड़ों, पौधों, वृक्षों, मरुस्थलों, पर्वतों, नदियों, महासागरों झीलों, जीव-जंतुओं, चट्टानों, खनिज पदार्थों, जलवायु, मौसम और ऋतुओं आदि का प्रतिनिधित्व करता है। ये इस बात का साक्ष्य भी है कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति पूजन को प्रकृति संरक्षण के रूप में आध्यात्मिक मान्यता प्राप्त है।

अथर्ववेद में विद्वानों ने वर्षों पूर्व उद्घोषित किया था, ‘माता भूमिः पुत्रोहं पृथिव्याः’ अर्थात् वसुंधरा जननी है, हम सब उसके पुत्र हैं। ऋग्वेद (1/158/1, 7/35/11) तथा अथर्ववेद (10/9/12) में दिव्य, पार्थिव और जलीय देवों से कल्याण की कामना स्पष्ट रूप से उल्लिखित है।

वृक्षों के महत्व को परिभाषित करते हुए श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण पीपल को अपना अवतार घोषित करते हैं। वह स्वयं कहते हैं-

‘अश्वत्थ: सर्व वृक्षा वृक्षाणां अर्थात् वृक्षों में पीपल मैं हूं..।’

 आचार्य वेदांतदेशिक ने तात्पर्यचंद्रिका में स्पष्ट लिखा है कि पीपल की महिमा स्वर्ग में स्थित पारिजात आदि वृक्षों से भी ज्यादा है। अतः भगवान कृष्ण ने स्वयं को पारिजात नहीं बल्कि अश्वत्थ (पीपल) ही कहा, क्योंकि सारी वनस्पतियों में पीपल की सर्वश्रेष्ठता निर्विवाद है।

कालिदास, सूरदास, रसखान, तुलसीदास, कबीरदास ने किसी औपचारिक संस्था से शिक्षा प्राप्त नहीं की, लेकिन अपनी रचनाओं में प्रकृति को इस दैवीय स्वरूप में प्रस्तुत किया कि इनकी रचनाएं आज भी मानव जाति को दिशा प्रदान कर रही हैं। कालिदास ने पर्यावरण संरक्षण के विचार को मेघदूत तथा अभिज्ञान शाकुन्तलम में दर्शाया है। रामायण, महाभारत तथा अन्य धार्मिक ग्रन्थों, उपनिषदों में प्रकृति की प्रासंगिकता एवम उपादेयता का गहन वर्णन किया गया है।

 छान्दोग्यउपनिषद् में उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु से आत्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भांति सुख-दुःख की अनुभूति करते हैं। महान भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु ने भी यह सिद्ध किया था कि पेड़-पौधों तथा वनस्पति में भी जीवन होता है,ये भी हमारी तरह ही प्रेम एवं पीड़ा महसूस करते हैं।

वैदिक दर्शन में एक वृक्ष की मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गई है-

‘दशकूप समावापीः दशवापी समोहृदः।

दशहृद समरूपुत्रो दशपत्र समोद्रुमः।।

हमारे ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है- वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं- ‘अरण्यं ते पृथिवी स्योनमस्तु’ यही कारण है कि हिन्दू जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है।

हम कह सकते हैं कि इन्हीं वनों में हमारी सांस्कृतिक विरासत का संवर्धन हुआ है। हिन्दू संस्कृति में वृक्ष को देवता मानकर पूजा करने का विधान है. वृक्षों की पूजा करने के विधान के कारण ही हिन्दू स्वभाव से वृक्षों का संरक्षक हो जाता है। सम्राट विक्रमादित्य और अशोक के शासनकाल में वनों की रक्षा सर्वाेपरि थी। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने प्रकृति की महत्ता को स्वीकारते हुए वन्य जीव जन्तुओं के शिकार पर प्रतिबन्ध लगाया जो आज भी अशोक के शिलालेखों में अंकित है। भारत में आर्यों के आगमन से पूर्व सिंधु घाटी की सभ्यता में प्राप्त मुहरों पर अंकित चित्रों से स्पष्ट है कि सिन्धु घाटी के निवासी वृक्षों की पूजा किया करते थे। ज्ञान और नीतिपरक पंचतंत्र की कहानियों तथा जातक कथाओं में वन्य जीवन सें संबंधित अनेकानेक प्रसंगों को उद्घाटित किया जाना हमारे संस्कारों का प्रत्यक्ष प्रमाण है। आचार्य चाणक्य ने भी आदर्श शासन व्यवस्था में अनिवार्य रूप से अरण्यपालों की नियुक्ति करने की बात कही है।

जलस्रातों का भी वैदिक धर्म में बहुत महत्व रहा है। भारतीय सभ्यता में बिना नदी या ताल के गांव-नगर के अस्तित्व की कल्पना की ही नहीं गयी है। ऐसे गांव जो नदी किनारे नहीं थे, वहां ग्रामीणों द्वारा तालाबों का निर्माण किया जाना वैदिक चिंतन को प्रतिस्थापित करता है।  अथर्ववेद में बताया गया है कि आवास के समीप शुद्ध जलयुक्त जलाशय अनिवार्य रुप से होना चाहिए.जल दीर्घायु प्रदायक, कल्याणकारक, सुखमय और प्राणरक्षक होता है।

समस्त भारतीय पर्व जैसे; मकर संक्रान्ति, वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, होली, नवरात्र, गुड़ी पड़वा, ओणम, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, अन्नकूट, देव प्रबोधिनी एकादशी, हरियाली तीज, गंगा दशहरा आदि सभी पर्वों के आयोजन में प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन का संदेश ही नीहित है। वट-सावित्री पूजन में जहां वट वृक्ष की पूजा होती है। वहीं छठ जैसे त्योहार में नदियों की साफ-सफाई की जाती है।

भारतीय संस्कृति में धर्म और पर्यावरण में एक गहरा संबंध है तथा यहां पल्लवित सभी धर्मों का दृष्टिकोण प्रकृति के प्रति सकारात्मक ही रहा है।

सनातन चिंतन के अनुसार, जीवन पाँच तत्त्वों- क्षिति (पृथ्वी), जल, पावक (अग्नि), गगन (आकाश), समीर (वायु) से मिलकर बना है। पृथ्वी को देवी का रूप माना गया है। इसके अलावा इसके विभिन्न अवयव जैसे- पर्वत, नदी, जंगल, तालाब, वृक्ष, पशु-पक्षी आदि सभी को दैवीय कथाओं व पुराणों से जोड़कर देखा जाता है। भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर कहा गया है कि ईश्वर सर्वव्यापी है तथा विभिन्न रूपों में सभी प्राणियों में विद्यमान है इसलिये व्यक्ति को सभी जीवों की रक्षा करनी चाहिये।

वैदिक धर्म में कर्म की प्रधानता पर बल दिया जाता है और यह विश्वास किया जाता है कि व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त होता है। इसके अलावा व्यक्ति के कर्मों का प्रभाव प्रकृति पर भी पड़ता है अतः मानव जाति को प्रकृति तथा उसके विभिन्न जीवों की रक्षा करना चाहिये।

वैदिक धर्म का प्रकृति के साथ कितना गहरा रिश्ता है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि की स्तुति में रचा गया है। हिन्दुत्व स्वयं में वैज्ञानिक जीवन पद्धति है। इसकी प्रत्येक परम्परा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है। इन रहस्यों को प्रकट करने का कार्य होना चाहिए। सनातन धर्म के संबंध में एक बात दुनिया मानती है कि इसका दर्शन ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत पर आधारित है। यह विशेषता किसी अन्य धर्म में नहीं है। सनातन संस्कृति के सह अस्तित्व का सिद्धांत ही भारतीयों को प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। वैदिक वाङ्मयों में प्रकृति के प्रत्येक अवयव के संरक्षण और संवर्धन के निर्देश मिलते हैं। वैदिक धर्म में पुनर्जन्म पर विश्वास किया जाता है। इसके अनुसार, मृत्यु के बाद कोई व्यक्ति पृथ्वी पर विद्यमान किस जीव के रूप में जन्म लेगा यह उसके कर्मों पर निर्भर करता है। इसलिये सभी जीवों के प्रति अहिंसा वैदिक दर्शन का मुख्य सिद्धांत है।

भारतीय दर्शन के प्रेरित जैन संस्कृति में भी अहिंसा को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है तथा किसी भी जीव-जंतु, वनस्पति आदि को नुकसान पहुँचाना वर्जित माना गया है। इनके अनुसार पंचमहाव्रत है-सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। इनके अनुयायी जीवन के सभी आयामों में इन पंचमहाव्रतों का अनुपालन करते हैं। अतः जैन चिंतन धारा के अनुयायियों के लिये प्रकृति व इसके सभी जीव जंतुओं को सामान माना गया है तथा इनका संरक्षण और इनके प्रति समान व्यवहार करना इस संस्कृति की मूल शिक्षा है। 

बौद्ध दर्शन भी पूर्णतः प्रेम, सद्भाव तथा अहिंसा पर आधारित है। ये दर्शन ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ पर आधारित है जिसे करण-कारण का सिद्धांत भी कहते हैं। इसके अनुसार, प्रत्येक कार्य का प्रभाव होता है। इसे वैदिक संस्कृति के कर्म के सिद्धांत के समान माना जा सकता है अर्थात् मानव के व्यवहार का प्रभाव उसके पर्यावरण पर पड़ता है। बौद्ध चिंतन साधारण जीवनशैली को बढ़ावा देता है, जो सतत-पोषणीय विकास के लिये आवश्यक है। यह संसाधनों के अतिदोहन को वर्जित करता है। बौद्ध दर्शन सभी प्राकृतिक जीवों की परस्पर निर्भरता में विश्वास करता है और इसमें सभी जीव-जंतु, वनस्पतियाँ, नदी, पर्वत, जंगल आदि शामिल हैं।

परन्तु आज मनुष्य की भौतिकवादी आकांक्षाओं ने संस्कृति और संस्कारों के उस अनूठे ताने बाने को तोड़ दिया है। आज हम निज़ी विलासता में प्रकृति के प्रति अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं की मान मर्यादाओं और भावनाओं को जीवन से तिरोहित करते जा रहे है। आधुनिकता के नाम पर हमारी प्रकृति-उपासना की आस्थाएं समाप्त हो रही हैं और यदि शेष भी हैं तो मात्र प्रतीकात्मक औपचारिकताओं के रूप में हैं। संकीर्ण जीवन शैली के कारण आज बरगद, पीपल, नीम, आंवला आदि का महत्व कम होता जा रहा है। गोचर भूमि पर अतिक्रमण कर आवासीय भवन खड़े किए जा रहे है। पशु पक्षियों की जातियाँ लुप्त होती जा रही हैं। हमारे जल स्त्रोत अब शहर के शौचालय बनते जा रहे है। जिन नदियों को हम मातृवत् पूजते रहे हैं, अब उनमें कल-कारखानों का प्रदूषित जल और शहर का मल प्रवाहित हो रहा है। सच कहूं तो यदि आज भी हमारी पुरातन पर्यावरण संरक्षण की प्रथाओं को सामाजिक स्तर पर प्रधानता देते हुए, इन परम्पराओं का अनुगमन दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ किया जाए तो पर्यावरण संतुलन तथा संरक्षण को पुनः प्रवाह दिया जा सकता है। यदि मनुष्य पुनः धरती को मातृवत् मानकर तथा जल, हवा, नदियों, पर्वत, वृक्ष और जलाशयों को पूजनीय मानकर उनकी सुरक्षा एवं संरक्षण की व्यवस्था करे तो वेदों की वह आदर्श परिकल्पना साकार हो सकेगी जो ये कहती है कि यदि मनुष्य शुद्ध वायु में श्वास ले, शुद्ध जलपान करे, शुद्ध भोजन करे, शुद्ध मिट्टी में खेले कूदें और कृषि करे, तब उसकी आयु ‘‘जीवेम् शरदः शतम्’’ हो सकती है।


 लेखक कु. मायावती रा.म. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बादलपुर, गौतमबुद्ध नगर के शिक्षक शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर है।