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ब्रह्मवाणी की अमरता

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ब्रह्मवाणी की अमरता  

त्रेतायुग के अन्तिम चरण में श्रीमन नारायण विष्णु ने श्रीराम के नाम से भाईयों समेत परम शक्ति सीता के साथ अवतार लिया था। श्रीराम के अवतार की घटना कब हुई । कितना कालखण्ड बीत चुका है। इस सम्बन्ध में विभिन्न गणनाओं के आधार पर 17000 से 12000 वर्ष पूर्व के कालखण्ड के मध्य श्रीराम के धरा पर अवतरित होने की पुष्टि की गयी है।

 श्रीराम के अवतार के पहले यह धरा आततायियों के पापों से कम्पित हो रही थी। त्रेतायुग में श्रीरामावतरण से पूर्व सर्वत्र राक्षस वृत्ति प्रचण्ड थी। धरती आकाश सभी के देवता लंका के राक्षस राजा रावण और उनके साथियों के उत्पात से आकुल थे। तभी महादेव की अध्यक्षता और ब्रह्मा जी की उपस्थिति में समस्त देवता और देवियां संकट से उबरने के लिए एक धर्म सभा में एकत्र हुए थे। धरा के अनेक प्रतिनिधियों ने अपनी पीड़ा सुनायी थी। तब ब्रह्मा जी ने सभी की वेदना सुनने के बाद कहा था- यह संकट महादेव के वरदान का परिणाम है। इसलिए वही बताएंगे कि क्या करना होगा।


 रावण और उसकी आसुरी शक्ति इतनी प्रचण्ड है कि मेरे या समस्त देवों- देवियों के संयुक्त बल से भी नियन्त्रित नहीं हो सकती। धरती माता गो- माता, समस्त देवियां और देवता महादेव की ओर निहारने लगे। महादेव ने स्वीकार किया कि उन्होंने रावण को वरदान दिया था। एक संकल्प से हम और ब्रह्मा जी सहित समस्त दैवी शक्तियां बंधी हैं -कोई कठिन तपश्चर्या करता है तो अपेक्षित वरदान देना होगा।

महादेव की ओर सभा की समस्त दैवी शक्तियां विकल होकर दुखी मन से आस लगाये देखने लगीं। महादेव ने देखा कि वहां उपस्थित सभी सभासद अपलक उनकी ओर देख रहे हैं। महादेव ने कहा मैं अपना अभिमत बताता हूं। यह कि मैंने उसे अभयदान दिया है इसलिए स्वयं (रावण को) मारने के लिए अस्त्र शस्त्र नहीं उठाऊंगा। पर वह कैसे मरेगा, यह बताता हूं।  

श्रीमन नारायण हम सभी के मध्य सर्वशक्तिमान वरेण्य परम शक्ति हैं। उनकी स्तुति की जाय। उनसे विनती करने पर समाधान मिल जाएगा। संस्कृत भाषा में वह स्तुति आदि कवि वाल्मीकि ने रामकथा के प्रथम ग्रन्थ रामायण में और गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम चरित मानस में हिन्दी में प्रस्तुत की है। श्रीरामावतार की गाथा लिखने वाले अन्य कवियों भक्तों ने भी इस प्रसंग को अपनी भाषाओं में प्रस्तुत किया है। मानस ग्रन्थ में लिखी स्तुति इन पंक्तियों से प्रारम्भ होती है जो बालकाण्ड में मिलती है-

जय जय सुरनायक जन सुख दायक। प्रणत पाल भगवन्ता।

गो -द्विज हितकारी जय असुरारी

सिन्धु सुता प्रिय कन्ता ।-

यह स्तुति श्रीराम भक्तों के बीच बहुश्रुत है। बहुधा भक्त जन इसे नित्य गाते हैं। श्रीमन नारायण प्रसन्न हुए तो ब्रह्मवाणी सुनायी पड़ी। इसको शास्त्रज्ञ ब्रह्मवाणी अवतार कहकर पावन मानते हैं। 

श्रीनारायण ने सभा में उपस्थित समस्त जनों को बताया कि देवी देवताओं के पिता कश्यप ऋषि और उनकी संगिनी धर्मज्ञ अर्धांगिनी दिति को दिये गये वचन के अनुरूप मेरा अवतार होगा। तभी रावण समेत सभी आसुरी शक्तियां विनष्ट होंगी। रामावतार नर रूप में होगा। मेरे साथ परम् शक्ति भी अवतरित होंगी। वह जनक जी और सुनयना के घर पलेंगी। जबकि मेरा अवतरण तीन भ्राताओं के संग दशरथ के घर कौशल्या के पुत्र के रूप में होगा। राजा मनु वस्तुतः दशरथ होंगे और मनु की संगिनी शतरुपा ही कौशल्या के रूप में अयोध्या की महारानी होंगी। उनके साथ कैकेयी और सुमित्रा के पुत्रों के रूप में भरत और लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न जन्म लेंगे।

 श्रीमन नारायण की ब्रह्मवाणी के उपरान्त महादेव ने घोषणा की कि भगवान श्रीराम के परम भक्त के रूप में हनुमान बनकर वह वानर रूप धारण करेंगे। सूर्य ने कहा मैं सुग्रीव बनूंगा। इन्द्र देव को बालि बनने का दायित्व ब्रह्माजी ने सौंपा। स्वयं  ब्रह्माजी ने कहा कि वह जामवन्त बनकर श्रीराम की सेना के साथ श्रीरामावतार के समय से लेकर द्वापर के श्रीकृष्ण के समय तक सशरीर बने रहेंगे। सभी देवी देवताओं , ऋषि मुनियों के लिए भी ब्रह्मा जी ने उस अवतरण काल के निमित्त भूमिकाएं बता दीं।

ब्रह्मवाणी सुनकर सनातन धर्म के उस सर्व प्रथम हुए हिन्दू सम्मेलन में हर्ष ध्वनि होने लगी। धर्म सभा में उपस्थित सौर मण्डल के समस्त देव गण देवियां और हमारी धरती माता के ऋषि मुनि, द्विज गण, समस्त सज्जन वृन्द, गो-माता अपनी विकलता विस्मृत कर आनन्द विभोर हो गये।

 तभी सबको एक पल के लिए अपनी ओर केन्द्राभिमुख होकर स्थिर चित्त से एक और ब्रह्म ज्ञान की ओर कान लगाने को ब्रह्मा जी कहा- इस बार श्रीनारायण की धर्मांगिनी माता लक्ष्मी जी ने सम्बोधित किया - ध्यान रहे द्वापर युग में फिर एक बार ब्रह्म शक्ति का अवतरण श्रीराधाकृष्ण के रूप में होगा। तदन्तर जब कभी धरा पर अन्याय अधर्म बढ़ेगा। सनातन  संस्कृति पर संकट आएगा। तब संगठित होकर सनातन धर्म के अनुरागियों को धर्म सम्मेलनों के माध्यम से अवतारी संगठित शक्ति को जागृत करना होगा।

कलयुग की वह संगठित शक्ति है भारत में 100 वर्ष पूर्व अवतरित हुआ संसार का सबसे बड़ा, अनुशासन बद्ध, संयमी- कर्तव्यनिष्ठ ऋषि तुल्य संयम से परिपूर्ण सज्जन शक्ति का पर्याय - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। जिस प्रकार श्रीराम को आसुरी शक्तियां मात्र वनवासी मानती थीं, श्रीकृष्ण को ग्वाला कहती थीं उसी तरह संघ के स्वयंसेवकों को खेल के मैदानों में खेलने वाले बालक और टहलने वाले वयोवृद्ध जन कहकर उपहास करते रहते हैं।

संघ की समेकित जनशक्ति ही दैवी शक्ति का अवतार है। संघ जन मन की अभिव्यक्ति का संवाहक है। धर्म का संरक्षक है। यह जन शक्ति अपने जीवन के लक्ष्य को पहचानती है। आसुरी शक्तियों को समाप्त करने की विजेत्री शक्ति से युक्त है। यह शक्ति सनातन संस्कृति की अजेयता और अमरता को धारण करती आ रही है। सौ वर्ष एक पड़ाव भर है। जय जय भारत माता।

यह महाघोष इस अवतारी शक्ति की अमरता का मंत्र है।