नया भारत खड़ा होकर रहेगा: भागवत जी
अयोध्या में 22 जनवरी 2024 को भगवान रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अपने संबोधन में कहा कि यह आनंद शब्दों में वर्णनातीत है और उसके वर्णन करने का प्रयास इसके पहले के वक्तव्यों में अच्छा हो गया। यह भी बता दिया गया है और हम जानते भी हैं कि आज अयोध्या में रामलला के साथ भारत का स्व लौट आया है। और संपूर्ण विश्व को त्रासदी से राहत देने वाला एक नया भारत खड़ा होकर रहेगा। इसका प्रतीक यह कार्यक्रम बन गया है। ऐसे समय में आपके उत्साह का, आपके आनंद का वर्णन कोई नहीं कर सकता। हम यहां पर अनुभव कर रहे हैं कि देशभर में भी यही वातावरण है। छोटे-छोटे मंदिर के सामने दूरदर्शन पर इस कार्यक्रम को सुनने वाले हमारे समाज के करोड़ों बंधु वहां पहुंच ना पाए ऐसे घर-घर के हमारे नागरिक, सज्जन, माता, भगिनी सब भावविभोर हैं। सब में आनंद है सब में उत्साह है और ऐसे समय में जोश की बातों में थोड़ी सी होश की बात करने का काम मुझे ही दिया जाता है। आज हमने सुना कि इस प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में पधारने के पूर्व प्रधानमंत्री जी ने कठोर व्रत रखा। जितना कठोर व्रत रखने को कहा था उससे कई गुना अधिक कठोर व्रताचरण उन्होंने किया।
मेरा पुराना उनसे परिचय है, मैं जानता हूं वह तपस्वी हैं ही, परंतु वह अकेले तप कर रहे हैं, हम क्या करेंगे? अयोध्या में रामलला आए हैं, अयोध्या से बाहर क्यों गए थे? क्योंकि अयोध्या में कलह हुआ। अयोध्या उस पुरी का नाम है जिसमें कोई द्वंद नहीं, जिसमें कोई कलह नहीं, जिसमें कोई दुविधा नहीं। वह हुआ 14 वर्ष वनवास में गए। वह सब ठीक होने के बाद दुनिया की कलह मिटाकर वापस आए। आज रामलला वापस फिर से आए हैं 500 साल के बाद। जिनके त्याग, तपस्या, प्रयासों से यह सोने का दिन आज हम देख रहें, सुवर्ण दिवस देख रहे हैं, उनका स्मरण प्राण प्रतिष्ठा के संकल्प में हम लोगों ने कहा आपने सुना होगा। स्मरण किया उनकी तपस्या को, उनके त्याग को, उनके परिश्रम को शत बार, सहस्त्र बार, कोटि बार नमन है। रामलला के यहां इस युग में आज के दिन फिर वापस आने का इतिहास जो-जो श्रवण करेगा, वह राष्ट्र के लिए कर्म प्रवण होगा और उसके राष्ट्र का सब दुख दैन्य हरण होगा ऐसे इस इतिहास का सामर्थ्य है। परंतु उसमें हमारे लिए कर्तव्य का आदेश भी है। प्रधानमंत्री जी ने तप किया अब हमको भी तप करना है। राम राज्य आने वाला है वो कैसा था-
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं कहुहि व्यापा।।
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।
सब निर्दध धर्मरत पुनी।
नर अरु नारि चतुर सब गुनी।।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी।
सब कृतज्ञ नहिं कपट सयानी।।
संघ प्रमुख ने कहा कि राज्य के सामान्य नागरिकों का जो वर्णन है हम भी इस गौरव मय भारतवर्ष की संताने हैं। कोटि-कोटि कंठ उसका जयगान करने वाले हमारे हैं। हमको इस प्रकार के व्यवहार को रखने का तप आचरण करना पड़ेगा। हमको भी सारे कलह को विदाई देनी पड़ेगी। छोटे-छोटे परस्पर मत रहते हैं। छोटे-छोटे विवाद रहते हैं। उसको लेकर लड़ाई करने की आदत छोड़ देनी पड़ेगी। आखिर है क्या, यह बात बताई वह सामान्य नागरिक कैसे थे। निर्दंभ, प्रामाणिकता से आचरण करने वाले केवल बातें करने वाले नहीं और बातें करके उसका अहंकार पालने वाले नहीं थे। काम करते थे आचरण करते थे और अहंकार नहीं था।
ऐसे वह थे और धर्मरत थे यानि क्या थे? इस पर कठिन भाषा में प्रवचन बहुत लंबा हो सकता है, लेकिन थोड़े में धर्म के जो चार मूल्य जिनकी चौखट पर धर्म है ऐसा श्रीमद् भागवत में बताया है सत्य, करुणा, शुचिता और तपस उसका आज हमारे लिए युगानुकूल आचरण क्या है, तो सत्य कहता है कि सब घटों में राम हैं ब्रह्म सत्य है, वही सर्वत्र हैं, तो हमको यह जानकर आपस में समन्वय से चलना होगा। क्योंकि हम चलते हैं सबके लिए चलते हैं, सब हमारे हैं इसलिए हम चल पाते हैं और इसलिए आपस में समन्वय रखकर व्यवहार करना यह धर्म का पहला आचरण है। करुणा दूसरा कदम है उसका आचरण है सेवा और परोपकार। सरकार की कई योजनाएं गरीबों को राहत दे रही हैं सब हो रहा है, लेकिन हमारा भी कर्तव्य है यह सब समाज बांधव हमारे अपने बंधु हैं, तो जहां हमको दुख दिखता है, पीड़ा दिखती है वहां हम दौड़ जाएं। सेवा करें दोनों हाथों से कमाएं। अपने लिए न्यूनतम आवश्यक रखकर बाकी सारा वापस दें सेवा और परोपकार के माध्यम से। यह करुणा का अर्थ आज है। शुचिता पर चलना है यानी पवित्रता होनी चाहिए। पवित्रता के लिए संयम चाहिए। अपने को रोकना है सब अपनी इच्छा है सब अपने मत सब अपनी बातें ठीक होंगी ही ऐसा नहीं और होगी तो भी अन्यों के भी मत हैं। अन्यों की भी इच्छाएं हैं और इसलिए अपने आप को संयम में रखते हैं, तो सारी पृथ्वी, सब मानवों को जीवित रखेगी। गांधी जी कहते थे ”द वर्ड हैज एनफ फॉर एवरीवन नीड, बट नाट एनफ फॉर एवरीवन ग्रीड।“ तो लोभ नहीं करना, संयम में रहना और अनुशासन का पालन करना। अपने जीवन में अनुशासित रहना। अपने कुटुंब में, अपने समाज में और सामाजिक जीवन में नागरिक अनुशासन का पालन करना।
भगिनी निवेदिता कहती थीं कि स्वतंत्र देश में नागरिक संवेदना रखना और नागरिक अनुशासन का पालन करना, यही देश भक्ति का रूप है। इससे जीवन में पवित्रता आती है और तपस का तो मूर्तिमान उदाहरण आपके सामने दिया गया। व्यक्तिगत तपस तो हम करेंगे। सामूहिक तपस क्या है - संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। हम साथ चलेंगे, बोलेंगे आपस में, उसमें से एक सहमति का संवाद निकालेंगे। एक ही भाषा बोलेंगे। वो वाणी, मन, वचन, कर्म समन्वित होगा और मिलकर चलेंगे। अपने देश को विश्व गुरु बनाएंगे। यह तपस हम सबको करना है। 500 वर्षों तक अनेक पीढ़ियों ने लगकर परिश्रम करके प्राणों का बलिदान देकर खूनपसीना बहाकर आज यह आनंद का दिन सारे राष्ट्र को उपलब्ध करा दिया। उन सबके प्रति हमारे मन में कृतज्ञता है। मैं यहां बैठता हूं तो मेरे मन में विचार आता है कि मुझे बिठा दिया, मैंने क्या किया? वह तो किया उन्होंने किया, उसका प्रतिनिधि भी मुझे बनाया गया है। उस प्रतिनिधि के नाते मैं यह अवदान स्वीकार करता हूं और उन्हीं को अर्पण करता हूं। परंतु उनका यह व्रत हमको आगे लेकर जाना है जिस धर्म स्थापना विश्व में करने के लिए राम का अवतार हुआ था उस धर्म स्थापना को अनुकूल स्थिति अपने आचरण में अपने देश में उत्पन्न करना।
यह अपना कर्तव्य बनता है रामलला आए हैं हमारे मन को अह्लादित करने के लिए, उत्साही करने के लिए, प्रेरणा देने के लिए, साथ-साथ इस कर्तव्य की याद दिलाकर उसमें कृति प्रवण करने केलिए आए हैं। उनका आदेश सर पर लेकर हम यहां से जाएं। सब लोग तो यहां आ नहीं सके, लेकिन वो सुन रहे हैं, देख रहे हैं। अभी इसी क्षण से इस व्रत का पालन हम करेंगे, तो मंदिर निर्माण पूरे होते होते विश्व गुरु भारत का निर्माण भी पूरा हो जाएगा। इतनी क्षमता हम सबकी है।




