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धर्म हमें करणीय और अकरणीय का ज्ञान देता है – डॉ. मोहन भागवत जी

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नागौर, राजस्थान

जिले के छोटी खाटू कस्बे में 162वें मर्यादा महोत्सव के अवसर पर विशाल और भव्य कार्यक्रम संपन्न हुआ। आचार्य महाश्रमण के पावन सान्निध्य में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। मर्यादा महोत्सव के शुभारंभ के पूर्व दिवस पर आचार्य महाश्रमण जी ने कहा कि अच्छी वाणी भी एक रत्न होती है, जबकि नासमझ लोगों द्वारा पत्थर के टुकड़ों में रत्न देखा जाता है। कल्याण की वाणी और सम्यक ज्ञान प्रदान करने वाला सतगुरु होता है, जिससे हम अच्छा मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। भारत में ग्रंथ, शास्त्र और संतों की वाणी हमारी समझ और सामर्थ्य को बढ़ाते हैं और जीवन की दिशा दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि माघ शुक्ल सप्तमी को प्रथम गुरुवर ने प्रथम विधान का शुभारंभ किया और चौथे गुरु दयाचार्य जी ने मर्यादा महोत्सव का शुभारंभ किया।

उन्होंने कहा कि राजतंत्र और लोकतंत्र दोनों में अनुशासन और मर्यादा जरूरी है। आचार्य जी ने कहा कि हम सबके लिए साध्य शांति है। अगर कोई शांति की भाषा नहीं समझता है तो लाठी की आवश्यकता पड़ती है। शांति के लिए भी कड़ाई का पालन करना पड़ता है। देश की नीति में अहिंसा रहे तथा हम आक्रमण नहीं करें, यह हमारी मूल नीति है। सबके साथ मैत्री रहे। परंतु देश की सुरक्षा में खतरा अनुभव होता है तो देश के नागरिकों की रक्षा के लिए सेना को हाथ में शस्त्र उठाने पड़ते हैं। संतों के लिए अहिंसा का पालन अत्यावश्यक हो सकता है, लेकिन गृहस्थ की स्थिति में मजबूरी में देश की रक्षा के लिए शस्त्र जरूरी है। अच्छाई और शांति के लिए कड़ाई काम में लेनी पड़ सकती है।

इस अवसर पर सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा कि भारत दुनिया को मर्यादा सिखाने के लिए सदैव ही तत्पर रहा है। हम सभी प्राचीन काल से ही संतों के पास मर्यादा पालन व ज्ञान के लिए जाते रहे हैं। हम सभी संघ स्थान पर लाठी सीखते हैं। लेकिन लाठी क्यों रखें, इसका प्रयोग कब करें, इसकी भी मर्यादा सीखने के लिए संतों के पास आगमन रहता है।


उन्होंने कहा कि भारत में समाज के श्रेष्ठ लोग केवल बोलते ही नहीं हैं, बल्कि उसे अपने जीवन में भी ढालते हैं। भारत के श्रेष्ठ लोगों का सदैव से ही अनुकरण होता रहा है। आज भी समाज जीवन में आध्यात्मिक लोग इसके प्रमाण हैं। पैसे के पीछे भागना हमारी परंपरा नहीं है। पैसा कमाने वाला दान करता है। दान भारत के लोगों के जीवन में है, यहां जीवन का दान करने वाले भी हैं। कमाया हुआ कैसे बांटना है, यह ज्ञान जरूरी है।

सरसंघचालक जी ने कहा कि हम सब अलग-अलग दिखते हैं, लेकिन मूल में एक ही हैं। सभी अपने हैं, ये मानकर जीवन जीने में अपने आप मर्यादा आती है। सब अपने हैं, सबका जीवन चलना चाहिए। यही धर्म हमें सिखाता है। धर्म, धारण करने का भाव है। धर्म के पीछे सत्य का भाव है। अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह को प्रत्यक्ष रूप से जानना व अनुभव करना, भारत में ही हुआ है। महान दानी राजा शिवि का उदाहरण हमारे सामने है, जिसके अनुसार हमारा कर्तव्य हमारा धर्म ही है।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य पर उन्होंने कहा कि वर्तमान में कई देश सोचते हैं – चाहे जो भी हो, मेरा स्वार्थ पूरा होना चाहिए। लेकिन भारत न तो इस मार्ग पर चला है, न चलेगा। भारत विश्व में सब की चिंता करता है। भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसने आपदा व संकट के अवसर पर सेवा का कार्य किया है। अपना पेट काटकर भी भारत ने अन्य देशों की मदद की। यही धर्म है। धर्म हमें करणीय व अकरणीय का ज्ञान देता है। हिंसा, अहिंसा का संदर्भ भी धर्म के आधार पर होता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में कृषि के क्षेत्र में पश्चिम के रसायनों का प्रयोग करके कीटों का पूर्ण विनाश किया जा रहा है, जबकि प्रकृति के संतुलन का भारतीय दृष्टिकोण अलग है। भारत में कीट का नियंत्रण होता है। यह एक प्रकार का कृषि क्षेत्र में संतुलन है। हम अपने व्यवहार का भी संतुलन किस प्रकार से रखें, यह भी धर्म के संदर्भ से हमें ध्यान में आता है। सेवा, अनुशासन, मर्यादा ही भारत का कर्म है जो ईश्वर प्रदत्त या नियति प्रदत्त भारत को मिला है। भारत ने कभी भी सामरिक, आर्थिक, बलपूर्वक किसी को दबाया नहीं है और अपने उदाहरण से इसे प्रकट भी किया है।

इस अवसर पर आयोजन समिति के अध्यक्ष मनसुख भाई सेठिया ने कार्यक्रम की भाव भूमिका रखते हुए अतिथियों व श्रद्धालुओं का स्वागत किया। इस अवसर पर विभिन्न सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु व मातृशक्ति की सहभागिता रही। कार्यक्रम में किसी भी स्थिति में कोई भी श्रद्धालु भोजन सामग्री जूठी न छोड़े, इस पर विशेष ध्यान दिया गया। कार्यक्रम में कहीं भी प्लास्टिक के गिलासों का प्रयोग न करके पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण प्रस्तुत किया गया। सभी ग्रामवासियों ने कंधे से कंधा मिलाकर श्रद्धालुओं के साथ सहभागिता की।