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बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और वैश्विक उथलपुथल

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बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और वैश्विक उथलपुथल

विश्व व्यवस्था से तात्पर्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों, सरकारों और नियमों के आपसी तालमेल से है। यह एक ऐसी प्रणाली है जिसमें देश संप्रभुता का सम्मान करते हुए सहयोग करते हैं, नियमों का पालन करते हैं और विवादों का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से करते हैं। संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और अन्य संस्थाएं इसी व्यवस्था का आधार हैं। लेकिन आज यह व्यवस्था चुनौतियों का सामना कर रही है-शक्ति संतुलन बदल रहा है, बड़े देश अपने हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं, और बहुपक्षीयता कमजोर पड़ रही है। यह संक्रमण काल अस्थिरता, संघर्षों और नई गठबंधनों को जन्म दे सकता है।

आज के दौर की वैश्विक राजनीतिक उथल-पुथल ने न सिर्फ पूर्व में स्थापित अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक और आर्थिक मिनिकों को चुनौती दी है बल्कि वैश्विक व्यवस्था के पूरे स्वरूप में बदलाव की प्रक्रिया को जन्म दिया है। 20वीं शताब्दी के मध्य में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी अधिपत के बीच स्थापित हुई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था जिसे बाद में भूमंडलीकरण के प्रभाव में वैश्विक स्वरूप प्राप्त किया था लगातार नए संकटों से जूझ रही है। 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के बीच शुरू हुई यह चुनौतियां, चीन के बढ़ते प्रभुत्व और उदय, तमकी नेतृत्व में अमेरिका की आक्रामक विदेश नीति, कोरोना संकट, रूस यूक्रेन लड़ाई और हाल में जारी ईरान इजरायल अमेरिका की संघर्ष के बीच लगातार समन्वय बनाने का सफल प्रयास कर रही है। इसके साथ ही मध्य शक्तियों जिसमें कि भारत एक प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक देश है ने भी वैश्विक स्तर पर अपनी नई पहचान और भूमिका की तलाश में कई अंतरराष्ट्रीय और वैश्विक सुधारो की मांगों को दिशा दी है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाएं आज के दौर की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करतीं, जिससे उनकी प्रभावशीलता कम हो रही है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की विश्व व्यवस्था, जिसे (Pax Americana) के नाम से जाना जाता है, अमेरिका के नेतृत्व में स्थापित हुई थी। इस व्यवस्था ने संयुक्त राष्ट्र, नाटो, विश्व बैंक, आईएमएफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत किया, जिसमें अमेरिका ने वैश्विक शांति, व्यापार और सुरक्षा की गारंटी दी। शीत युद्ध के अंत के बाद यह व्यवस्था और मजबूत हुई, लेकिन अब इसका अंत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति, यूरोपीय सहयोगियों से दूरी, और वैश्विक संस्थाओं पर कम भरोसा इस व्यवस्था के क्षय का संकेत है। 

21वीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के नेतृत्व में बनी ‘एक-धु्रवीय’ (Unipolar) व्यवस्था अब अतीत की बात होती जा रही है। आज की दुनिया एक ऐसी ‘बहु-धु्रवीय व्यवस्था’ (Multipolar Order) की ओर बढ़ रही है, जहां शक्ति के केंद्र वाशिंगटन से हटकर बीजिंग, मॉस्को और नई दिल्ली जैसे शहरों की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं। 

चीन का उदय (Rise of China as a Revisionist Power) इस दारू की एक महत्वपूर्ण घटना है जिसने वैश्विक राजनीति में हो रहे हैं बदलावों को बहुत प्रभावित किया है।

पिछले तीन दशकों में चीन का आर्थिक और सैन्य उभार आधुनिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। चीन अब केवल एक ‘मैनुफैक्चरिंग हब’ नहीं रहा, बल्कि वह एक (Revisionist Power) के रूप में उभरा है। इसका अर्थ है वह राष्ट्र जो वर्तमान अंतरराष्ट्रीय नियमों और संस्थानों (जैसे UN, WTO) को अपनी सुविधा और विचारधारा के अनुसार बदलना चाहता है। अपनी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के माध्यम से चीन ने एशिया से लेकर अफ्रीका और यूरोप तक अपना प्रभाव फैलाया है। दक्षिण चीन सागर में उसकी आक्रामकता और ताइवान पर उसका दावा यह स्पष्ट करता है कि वह पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए तैयार है। चीन की ‘वुल्फ वॉरियर’ कूटनीति और तकनीकी क्षेत्र (AI, 6G) में उसकी बढ़त ने उसे अमेरिका के सीधे प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़ा कर दिया है।

 सोवियत संघ के पतन के बाद, एक समय माना जा रहा था कि रूस वैश्विक मंच पर अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। हालांकि, व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व में रूस ने खुद को एक बार फिर से ‘महान शक्ति’ (Great Power) के रूप में स्थापित किया है। पुतिन की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य सोवियत काल के गौरव को वापस लाना और नाटो (NATO) के विस्तार को रोकना है। यूक्रेन के साथ जारी संघर्ष ने यह दिखा दिया है कि रूस अपनी सुरक्षा चिंताओं के लिए सैन्य शक्ति के उपयोग से पीछे नहीं हटेगा। ऊर्जा संसाधनों पर अपनी पकड़ के कारण रूस आज भी वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

इस वैश्विक उथल-पुथल का एक बड़ा कारण एशियाई राजनीति का आस्था स्वरूप भी है। जिसमें सहयोग और टकराव दोनों की संभावना बराबर बनी रहती है। आमतौर पर 21वीं सदी को एशिया की सदी कहा जाता है। लेकिन आज के दौर की यह सच्चाई है कि एशिया महाद्वीप एकजुट नहीं है। जिस प्रकार से एशिया में अलग-अलग देशों की ताकत बढ़ी है, इसमें कोई शक नहीं है कि उसने वैश्विक सुरक्षा, नियम-कानून पर आधारित बहुपक्षवाद और वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने तमाम चुनौतियां पेश की हैं।

इस वैश्विक उथल-पुथल और टकराव के बीच भारत अपनी नई भूमिका को परिभाषित कर रहा है। भारत विशेष रूप से ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बनकर उभरा है, जो पश्चिम और पूर्व के बीच एक सेतु (Bridge) का कार्य कर रहा है। इस लिहाज से देखा जाए तो भारत के उभार को व्यापक स्तर पर बेहद अच्छा माना जाता है, यानी भारत को एक ऐसा देश माना जाता है, जो दुनिया में नैतिकता और अच्छाई के लिए लड़ाई करता है और बुरी चीजों का विरोध करता है। एक ऐसी दुनिया में, जिसमें विचारों को लेकर जबरदस्त खींचतान मची हुई है और जिसका बंटवारा सा हो चुका है, इन परिस्थितियों में भारत एक पुल के रूप में सामने आया है, यानी एक ऐसे माध्यम के तौर पर उभरा है, जिसकी आज के दौर में सबसे ज्यादा जरूरत है। इसके अलावा, विश्व में जब भी मूल्यों को लेकर सवाल उठते हैं, तो भारत सामान्य तौर पर सही पक्ष के साथ खड़ा नजर आता है।

वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका आज इतनी अहम हो गई है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता से लेकर वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र की मजबूती तक, सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने से लेकर जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने तक और आज के दौर के ऐसे हर अहम मुद्दे का समाधान तलाशने की क़ामयाबी भारत द्वारा की जाने वाली कार्रवाई पर ही निर्भर करती है।

जी20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने इस मंच का उपयोग अपनी वैश्विक पहुंच को मजबूत करने के लिए किया। जी20 के मंच पर भारत ने न केवल अपनी बातों को मजबूती के साथ रखा, बल्कि अफ्रीका से लेकर लैटिन अमेरिकी देशों समेत तमाम और राष्ट्रों को लेकर अपने विचारों एवं चिताओं को भी बेबाक़ तरीक़े से सभी के सामने रखा। चाहे जलवायु परिवर्तन का मुद्दा हो, या भू-राजनीतिक संघर्ष का मसला, या फिर बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार का मुद्दा, ऐसे हर वैश्विक मसले पर भारत ने खुलकर अपने पक्ष को दुनिया के सामने रखा।

 आज जब वैश्विक स्तर के मामलों में पड़ने से पश्चिमी देश अपने कदम पीछे खींच रहे हैं, तब भारत कुशलता के साथ दुनिया के साथ अपने संबंध स्थापित कर वैश्विक स्तर पर मची खींचतान में दखल देते हुए अपने लिए अनुकूल जगह बना रहा है। भारत ने जिस अंदाज में अपने दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया उससे यह लग रहा था कि वह कई पश्चिमी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को ग्लोबल साउथ के विचारों को सुनने के लिए बाध्य कर रहा है। 

  बदलती विश्व व्यवस्था किसी एक देश के प्रभुत्व के अंत और साझा जिम्मेदारी की शुरुआत का संकेत है। हालांकि यह संक्रमण काल अनिश्चितताओं से भरा है, लेकिन यह भारत जैसे देशों के लिए वैश्विक नीतियों को आकार देने का एक स्वर्णिम अवसर भी है। भविष्य की शांति इस बात पर निर्भर करेगी कि ये नई शक्तियां आपस में प्रतिस्पर्धा करती हैं या एक ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ की ओर सहयोग करती हैं।

लेखक देशबंधु कॉलेज, दिल्ली विवि में  सहायक प्रोफेसर है।