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अंतरराष्ट्रीय जगत में हिंदुत्व: भारतीय सभ्यता का उदयमान विश्व-चेतना मॉडल

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अंतरराष्ट्रीय जगत में हिंदुत्व: भारतीय सभ्यता का उदयमान विश्व-चेतना मॉडल

विश्व आज जिस दौर से गुजर रहा है, वह केवल राजनीतिक अस्थिरता का नहीं, अपितु सभ्यताओं के पुनर्संयोजन का काल है। पहचान के संकट, संस्कृति से दूराव, मानसिक तनाव, पर्यावरण असंतुलन, परिवार व्यवस्था का विघटन और आर्थिक वर्चस्व की अंधी स्पर्धा, इन सबके बीच मानवता एक ऐसे मार्ग की तलाश में है जो उसे संतुलित, शांत और स्थायी भविष्य दे सके। ऐसे समय में भारत, अपने सांस्कृतिक मूल्यों और दार्शनिक दृष्टि के साथ, वैश्विक विमर्श के केंद्र में उभर रहा है। इसी उदय का प्राण तत्त्व है ‘हिंदुत्व’, जिसकी वैचारिक स्पष्टता और सांस्कृतिक गहराई को अपने संगठित कार्यों द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) दशकों से प्रतिपादित करता आया है।

हिंदुत्व एक संकीर्ण धार्मिक अवधारणा नहीं, अपितु भारतीय संस्कृति की आत्मा है, एक ऐसी जीवन पद्धति जो मनुष्य को प्रकृति, समाज और राष्ट्र के साथ जोड़ती है। इसकी जड़ें वेदों से लेकर विवेकानंद तक, लोकजीवन से लेकर आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक फैली हुई हैं। आरएसएस के चिंतन में हिंदुत्व का अर्थ अपनी पहचान का पुनर्जागरण है बिना किसी आक्रामकता के, बिना किसी श्रेष्ठताबोध के, बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन, समरसता और कर्तव्यबोध के साथ। यही कारण है कि आज अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक भारत को ‘सभ्यतापूर्ण राज्य’ कहकर संबोधित कर रहे हैं, एक ऐसा राष्ट्र जो आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी सभ्यता की आत्मा को नहीं खोता। विश्व-राजनीति में भारत की उभरती भूमिका हिंदुत्व की वैश्विक पहचान को और मजबूत करती है। भारत अब किसी दबाव में निर्णय नहीं लेता, वह न तो पश्चिम का अनुयायी है और न किसी नए गुट का हिस्सा। आतंकवाद, क्षेत्रीय शांति, आर्थिक स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा, हिंद-प्रशांत रणनीति और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर भारत का स्पष्ट और दृढ़ स्वर एक नए सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। यह वही आत्मविश्वास है जिसकी नींव संघ के विचार एकात्म मानववाद, स्वदेशी चेतना और राष्ट्रीय अस्मिता पर टिकी है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिंदुत्व के प्रसार में प्रवासी भारतीयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुनिया के सौ से अधिक देशों में बसे भारतीय समुदाय जिसे आज विश्व का सबसे सशक्त डायस्पोरा माना जाता है। अपने जीवन व्यवहार, परिवार व्यवस्था, संस्कार, मंदिरों, सांस्कृतिक उत्सवों और सेवा-कार्यों के माध्यम से भारतीय जीवन दर्शन को जीवंत रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इन प्रवासी समुदायों में आरएसएस से प्रेरित कई संगठन जैसे हिन्दू स्वयंसेवक संघ भारतीय मूल्यों को अनुशासित और सकारात्मक तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। वे न केवल भारतीय संस्कृति का परिचय कराते हैं अपितु स्थानीय समाज में सेवा, सहकार्य और सद्भाव का वातावरण भी निर्मित करते हैं। इससे हिंदुत्व की छवि एक समन्वयकारी, शांतिप्रिय और समाज-निर्माणकारी शक्ति के रूप में स्थापित हो रही है।

भारत की सॉफ्ट पॉवर ने तो हिंदुत्व के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को और भी व्यापक बना दिया है। योग, ध्यान, आयुर्वेद, शाकाहार, पर्यावरण के प्रति श्रद्धा, परिवार-केंद्रित समाज और संतुलित जीवन ये सभी आज वैश्विक जीवनशैली के केंद्र में हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को स्वीकृति मिलना इस बात का प्रमाण है कि दुनिया भारतीय जीवन-पद्धति को समाधान के रूप में देख रही है। आधुनिक पश्चिमी समाज, जो मानसिक तनाव, अकेलेपन और अवसाद की समस्या से जूझ रहा है, भारतीय आध्यात्मिकता को राहत और संतुलन का स्तंभ मानने लगा है। यह वही आध्यात्मिकता है जिसे हिंदुत्व मनुष्य की अंतर्निहित दिव्यता के रूप में देखता है।

परिवर्तन और विचारों के इस वैश्विक दौर में हिंदुत्व एक संतुलनकारी शक्ति बनकर उभर रहा है। यह न तो कठोर राष्ट्रवाद है और न ही भावनाशून्य वैश्वीकरण। यह एक ऐसा मॉडल है जिसमें राष्ट्र-हित, सांस्कृतिक अस्मिता और मानव-कल्याण तीनों समान रूप से समाहित हैं। हिंदुत्व कहता है कि राष्ट्र की मजबूती मानवता के विरोध में नहीं जाती, बल्कि मानवता का आधार बनती है। इसी कारण आरएसएस के सिद्धांत ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, और ‘एकात्म मानववाद’ आज अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन रहे हैं। हिंदुत्व का लक्ष्य प्रभुत्व नहीं अपितु संवाद, सहकार, सहअस्तित्व और मानव कल्याण है।

भविष्य की दृष्टि से देखें तो विश्व जिन चुनौतियों से जूझ रहा है पर्यावरण संकट, परिवार प्रणाली का विघटन, मानसिक अस्थिरता, सांस्कृतिक विभाजन, मूल्य-शून्यता और सामाजिक तनाव उनके समाधान भारतीय संस्कृति के पास मौजूद हैं। आने वाले वर्षों में वैश्विक स्तर पर ‘भारतीय मॉडल’ की आवश्यकता और स्वीकार्यता दोनों बढ़ेंगी। यह एक ऐसा मॉडल है जो संस्कृति में जड़ें रखता है और आधुनिकता को संतुलित रूप में अपनाता है। हिंदुत्व की यही क्षमता-मूल्यों पर आधारित आधुनिकता उसे दुनिया के लिए एक प्रकाश-स्तंभ बना रही है।

अंतरराष्ट्रीय जगत में हिंदुत्व का उदय वास्तव में भारत की सभ्यतागत आत्मा का पुनर्जागरण है। यह लड़ाई या प्रतिस्पर्धा का नहीं अपितु जागरण और संवाद का काल है। हिंदुत्व का शक्ति-स्रोत न तो राजनीतिक सत्ता है और न ही आर्थिक दबाव। इसका वास्तविक बल है भारतीय समाज की आत्मा, सेवा-भाव, अनुशासन, संगठनात्मक शक्ति और संस्कृति में निहित समरस मूल्य। यही मूल्य आज पूरे विश्व के सामने भारत को एक नई ऊँचाई पर स्थापित कर रहे हैं।

अतः यह स्पष्ट है कि आने वाले दशकों में हिंदुत्व न केवल भारत की दिशा तय करेगा, बल्कि विश्व के लिए भी वैकल्पिक सभ्यतागत मार्ग प्रस्तुत करेगा। यह मार्ग संघर्ष का नहीं, समाधान का है, वर्चस्व का नहीं, सहअस्तित्व का, विभाजन का नहीं, समरसता का और इसी कारण हिंदुत्व का यह वैश्विक उदय केवल भारतीयों का नहीं मानवता का भविष्य भी निर्धारित कर सकता है।