पुणे
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य भय्याजी जोशी ने कहा कि “वनवासी भाइयों के प्रश्नों को लेकर केवल चिंता या संवेदना व्यक्त करने से बात नहीं बनने वाली। मात्र परिसंवादों (सेमिनार्स) के आयोजन से जनजातीय समस्याएं नहीं सुलझ सकतीं; इसके लिए उनकी समस्याओं को गहराई से समझकर प्रत्यक्ष क्षेत्र में जमीन पर उतरकर कार्य करना अनिवार्य है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ताओं ने दशकों से इसी नीति को अपनाया है, जिसके परिणामस्वरूप आज वनवासी जीवन में व्यापक और सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे रहा है”।
स्थानीय एस. पी. कॉलेज के लेडी रमाबाई सभागार में छत्तीसगढ़ के बारसुर स्थित ‘बनफूल’ संस्था के तत्वाधान में आयोजित ‘बस्तर की शोधयात्रा’ वृत्तचित्र (डाक्युमेंट्री) के अनावरण समारोह में संबोधित कर रहे थे। समारोह की अध्यक्षता पद्मश्री दादा लाड ने की, मंच पर पद्मश्री सुनीता गोडबोले, डॉ. राम गोडबोले और पद्मश्री डॉ. बुधरी ताती की उपस्थिति रही।
‘आदिवासी’ शब्द और षड्यंत्रकारी दूरियां
आपातकाल के बाद वनवासी क्षेत्र में सुनियोजित ढंग से कार्य करने के संघ के संकल्प पर भय्याजी जोशी ने कहा कि “दुर्भाग्यवश, समाज में कुछ भ्रामक धारणाएं जानबूझकर स्थापित की गईं, जिससे एक कृत्रिम खाई पैदा हो गई। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान सुनियोजित रूप से ‘आदिवासी’ शब्द का प्रयोग कर जनजातीय समाज को देश के अन्य सनातन प्रवाह से पृथक और भिन्न दिखाने का कुप्रयास किया गया।”
उन्होंने कहा कि “महानगरों की चकाचौंध और फुटपाथों के पैमानों पर वनवासी अंचल की समस्याओं का आकलन कभी नहीं किया जा सकता। अज्ञानता और गरीबी के कारण समाज में पिछड़ापन आया, जिससे उन्हें विकास का वास्तविक अर्थ समझ नहीं आ पाया। ऐसे समय में, जनजातीय समाज के भीतर निहित नैसर्गिक प्रतिभा और क्षमताओं को संबल प्रदान करने की परम आवश्यकता है।”
कल्याण आश्रम के सेवाकार्यों से अर्जित हुआ अटूट विश्वास
उन्होंने कहा, “अज्ञानतावश वनवासी समाज के कई बंधुओं को यह बोध ही नहीं होता कि उनके सामने कोई समस्या है भी या नहीं; अतः उनके समाधान का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। किंतु, कल्याण आश्रम ने जनजातीय समाज के दर्द को अंतरंग से समझने वाले सैकड़ों समर्पित कार्यकर्ताओं को तैयार किया। इन कार्यकर्ताओं ने समाज के भीतर असीम विश्वास का संबल अर्जित किया है। असम से लेकर बस्तर तक, संघ और सेवाकार्यों के माध्यम से आज राष्ट्रीय एकात्मता का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। अब शासन के दृढ़ संकल्प और संवेदनशील सरकार के कारण बस्तर की भूमि से नक्सलवाद और भ्रष्टाचार का काला साया छंट रहा है, तथा समस्याओं के स्थायी समाधान का मार्ग प्रशस्त हुआ है।”
बस्तर की पीड़ा और साढ़े तीन दशकों का अशांत यथार्थ
समारोह में डॉ. राम गोडबोले ने बस्तर के पिछले तीन दशकों के संघर्षपूर्ण इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “स्वर्गीय भास्करराव कलंबी ने हमें बस्तर की यात्रा करने के लिए प्रेरित किया था। सदियों तक राजशाही और अंग्रेजों के विरुद्ध शौर्य के साथ संघर्ष करने वाला बस्तर का यह अंचल और अबुझमाड़ का क्षेत्र सदैव उपेक्षित रहा। पिछले 35 वर्षों में बस्तर भयंकर अशांति की आग में सुलगता रहा; जहाँ क्रूर नक्सलवाद के तांडव में 12 हजार जनजातीय भाई-बहन अकाल मृत्यु के शिकार हुए, वहीं 65 हजार वनवासी परिवारों को अपना घर-बार छोड़कर विस्थापन का दंश झेलना पड़ा।” “जनजातीय समाज कभी किसी के सामने याचना नहीं करता, वह पुरुषार्थ और धैर्य के साथ लड़ने में सक्षम है। आज ‘बनफूल’ संस्था, ज्ञान प्रबोधिनी और दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल ने सेवा का जो नया हाथ बढ़ाया है, इस बड़े ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर में देश के युवाओं को बस्तर की जनता के साथ चट्टान की तरह खड़ा होना होगा।” कार्यक्रम में आभार प्रदर्शन डॉ. सुनीता गोडबोले ने किया।



