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भारतीय संचार परंपरा का उत्सव है कुम्भ

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भारतीय संचार परंपरा का उत्सव है कुम्भ

कुम्भ भारतीय संचार और ज्ञान परंपरा का एक ऐसा उत्सव है, जिससे ‘भारत’ को जानने की समझ मिलती है। आंखें मिलती हैं। नई रोशनी मिलती है। भारत जैसे विशाल देश, उसकी संस्कृति, संत परंपरा का यह महा उत्सव है। स्वयं को जानना, भारत को जानना, भारत के धर्म और उसकी विविध ज्ञान धाराएं और ज्ञान परंपरा का अवगाहन करने का उत्सव है कुम्भ। यह भारत की अद्भुत संचार परंपरा का भी केंद्र है। सामान्य जन से लेकर देश के प्रबुद्धजनों का न सिर्फ यहां आगमन होता है, बल्कि यहां से मिले संदेश को वे देश भर में लेकर जाते हैं। यह संवाद, संदेश और एकत्व का सृजन विशेष है। दुनिया भर के मनुष्य एक हैं और वे एक ही भावबोध से बंधे हुए हैं यह विचार यहां हमें मिलता है। भारत का ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ का विचार इसके मूल में हैं। जो सामान्यजन को शक्ति देता है। यहां से प्राप्त विचार हमें जीवन युद्ध में खड़े और डटे रहने का हाैंसला देते हैं। यह सामान्य संवाद क्षण नहीं है, विमर्श का भी उत्सव है।

भारत की संवाद और संचार परंपरा से ही यह राष्ट्र सांस्कृतिक रूप से एक रहा है। इसलिए कहते हैं इस राष्ट्र में राज्य अनेक थे, राजा अनेक थे किंतु राष्ट्र एक था। राष्ट्र को जोड़ने वाली शक्ति ही संस्कृति है। इसलिए विष्णु पुराण में हमारे ऋषि कह पाए- 

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।

इस सांस्कृतिक एकता को बनाए रखने के लिए संवाद सबसे जरूरी तत्व था। जिससे सम भाव, मम भाव और समानुभूति पैदा होती है। उत्तर से दक्षिण तक, पूर्व से पश्चिम तक समूचा भारत एक भाव से जुड़े और सोचे इसके लिए ऐसे आयोजन जरूरी हैं जो एकत्व के सूत्र को मजबूत कर सकें। कुम्भ एक ऐसा ही आयोजन है जिसमें समूचा भारत एक साथ आकर अपने सामयिक संदर्भों, जीवन संदर्भों, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भों पर विचार करता है। हमारी संत परंपरा, ऋषि परंपरा के नायक हमें संवाद के वे सूत्र देते हैं जिनसे हमारा आगे का जीवन समर्थ होता है। संवाद परंपरा की यह उजली परिपाटी आज भी बनी हुई है। एक समय था जब हमारे पास संवाद के, संचार के आधुनिक माध्यम नहीं थे। मीडिया या पत्रकारिता नहीं थी। किंतु समाज था, लोग थे, विविध भाषाएं थीं। संवाद, संचार और शास्त्रार्थ जैसे शब्द भी थे। ये आधुनिक शब्द नहीं हैं। यानी तब भी समाज में जीवंत संचार परंपरा थी। जिसने सारे राष्ट्र को जोड़ रखा था। राजा राज्यों को बनाते होंगें, किंतु भारत राष्ट्र को ऋषियों ने रचा है। इसलिए यह राष्ट्र चिरंतन है। एक साथ नया और पुराना दोनों है। इसलिए भारत राष्ट्र को एक ओर जीता जागता राष्ट्रपुरुष कहा गया तो दूसरी ओर भारतमाता कहकर इससे आत्मीयता का संबंध भी बनाया गया। ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।’ यह मंत्र इसी भाव की सार्थक अभिव्यक्ति है।

भारतीय ज्ञान परंपरा में विमर्श का सबसे बड़ा मंच कुम्भ ही है। यहां होने वाले विमर्श और चर्चाएं सारे भारत के गिरिवासियों, नगरवासियों, ग्रामवासियों और वनवासियों तक पहुंचती रही हैं। संवाद और संचार की यह परंपरा कितनी वैज्ञानिक रही होगी कि यहां होने वाली चर्चाओं का समूचा संदेश उसी रूप में बिना विकृत हुए आमजन तक पहुंचता रहा है। जबकि आधुनिक संचार माध्यमों से प्रसारित संदेश- ग्रहणशीलता के कई तल हैं। भारत की संचार परंपरा वास्तव में श्रुति और स्मृति परंपरा से ही आकार लेती है। जिसका उद्देश्य ही लोकमंगल है। लोककल्याण भारत की चिति है। इससे कम और ज्यादा कुछ नहीं। हमारे शास्त्र कई रूपों में इसकी घोषणा करते हैं। भारत के पर्व, उत्सव, मेले, प्रवचन, प्रदर्शन कलाएं, लोक कलाएं, संगीत, साहित्य, योग, आयुर्वेद सब लोकमंगल में ही अपनी मुक्ति खोजते हैं। कुंभ मेला इन अभिव्यक्तिजन्य कलाओं का सामूहिक मंच रहा है। ये सभी अनुशासन अपना स्थान पाते रहे हैं। भारत में मनुर्भव की संस्कृति को अपने समूचे लोकजीवन में स्थापित किया। इसलिए ‘सर्वभूत हिते रताः’ का भाव पूरे भारत के मन पर अंकित हो गया।

भारत की सांस्कृतिक यात्रा में कुंभ के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि विविधता भरे भारत की सांस्कृतिक थाती और विरासत को बनाने, बचाने और संवाद में रखने का काम भी ऐसे महान आयोजनों ने किया है। ज्ञान को अमृत मानकर इसके रसास्वादन की परंपरा का उत्कर्ष ही कुम्भ है। यह काम दुनिया में भारत ही कर सकता है। क्योंकि वह ज्ञान में ही रत है यानी ‘भा-रत’ है। संचार के सभी प्रकारों का कुम्भ में प्रकटीकरण होता है। इन अर्थों में यह सभा आध्यात्मिक शुद्धि के विचारों से कहीं आगे है, जिसमें संपूर्ण जीवन का विचार है। आध्यात्मिक यात्रा के साथ-साथ विविध जीवनानुभवों का साक्षी बनकर व्यक्ति भारत की सांस्कृतिक यात्रा से भी जुड़ जाता है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा जारी विवरण में कहा गया है कि- ”वर्ष 2025 का महाकुंभ मेला सिर्फ एक सभा नहीं है; यह स्वयं की ओर एक यात्रा है। अनुष्ठानों और प्रतीकात्मक कृत्यों से परे, यह तीर्थयात्रियों को आंतरिक प्रतिबिंब और परमात्मा के साथ गहरे संबंध का अवसर प्रदान करता है। आधुनिक जीवन की माँगों पर अकसर हावी रहने वाली दुनिया में, महाकुंभ मेला एकता, पवित्रता और ज्ञानोदय के प्रतीक के रूप में खड़ा है। यह कालातीत तीर्थयात्रा शक्तिशाली अनुस्मारक के रूप में कार्य करती है कि मानवता के विभिन्न मार्गों के बावजूद, हम मूल रूप से शांति, आत्म-बोध और पवित्रता के प्रति स्थायी श्रद्धा की ओर एक साझा यात्रा के लिए एकजुट हैं।“

कुम्भ यानी साथ मिलना-बैठना, संवाद करना। लोक विमर्श से बनी इस महान परंपरा का महत्व आधुनिक युग में भी कम नहीं हुआ है। आज के समय में जब समूची दुनिया में संघर्ष, हिंसा और प्रतियोगिता के लिए दूसरे को कुचल डालने के षड़यंत्र आम हैं। भारत ने संवाद और शास्त्रार्थ के माध्यम से संकटों का हल निकालने की परिपाटी विकसित की है। जहां हिंसा का कोई स्थान नहीं है। संवाद न होने से ही ज्यादातर संकट खड़े होते हैं। संवाद की दुनिया इसका एकमात्र विकल्प है। एक ही देश से अलग होकर बने दो देशों में भी संवाद नहीं है। रूस-यूक्रेन, भारत- पाकिस्तान-बंगलादेश इसके उदाहरण हैं। इसका एकमात्र कारण है कि हमने लोकमंगल और संवाद का विचार त्याग दिया है। संवाद न होने से राज्य-राज्य, व्यक्ति-व्यक्ति, समाज-समाज टकरा रहे हैं। कुम्भ का विचार आध्यात्म, ज्ञान और संवाद तीनों की त्रिवेणी है। कुम्भ विश्व मानवता के सुमंगल का विचार करने का केंद्र भी है। मानवता के सम्मुख चुनौतियां हम सबकी हैं। समूचे विश्व की हैं। आध्यात्म जहां हमें समष्टि से जोड़ता है वहीं संवाद हमें आपस में जोड़ता है। कुम्भ भारतबोध का भी उत्सव है। यह हमें बताता है कि भारत क्या है? यहां आप भारत को महसूस कर सकते हैं। आज जब मानवता के सामने संकट के बादल छाए हुए हैं, ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में कुम्भ का आयोजन सही मायने में बहुत प्रासंगिक है। इसके आयोजन से विश्व मानवता आपस में जुड़ती है, संवादित होती है और लोकमंगल के संकल्प प्रखर होते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत की संचार और संवाद परंपरा का अनुगमन कर समूचा विश्व अपने संकटों का ठोस समाधान खोज सकेगा।