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अब वक्फ संपत्ति नहीं महाभारतकालीन लाक्षागृह

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क्या महाभारत का “लाक्षागृह” कभी दरगाह था?

क्या सदियों पुराने इतिहास को सरकारी रिकॉर्ड में बदला जा सकता है?

उत्तर प्रदेश के बागपत में स्थित महाभारतकालीन लाक्षागृह को लेकर पिछले कुछ महीनों से यही सवाल चर्चा का विषय बने हुए थे। अब इस मामले में बड़ा मोड़ आया है। महाभारतकालीन माने जाने वाले बरनावा के लाक्षागृह को उत्तर प्रदेश सरकार ने आधिकारिक रूप से वक्फ संपत्तियों की सूची से हटा दिया है। इसके साथ ही ‘उम्मीद पोर्टल’ पर इसे दरगाह के रूप में दर्ज की गई जानकारी भी हटा दी गई है।

यह केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं…

बल्कि इतिहास, आस्था और 54 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आया बड़ा मोड़ माना जा रहा है।

क्या है लाक्षागृह?

महाभारत में वर्णित “लाक्षागृह” वही स्थान माना जाता है, जहाँ कौरवों ने पांडवों को जलाकर मारने की षड्यन्त्र रचा था।

इतिहासकारों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, वर्तमान बागपत का बरनावा क्षेत्र प्राचीन “वारणावत” माना जाता है।

यहीं वह विशाल लाक्षागृह बनाया गया था, जिसमें पांडवों को फंसाने की योजना रची गई थी।

आज भी यहां प्राचीन टीले, सुरंगों के अवशेष और पुरातात्विक संरचनाएं मौजूद हैं, जिन्हें महाभारतकालीन इतिहास से जोड़कर देखा जाता है।

अब वक्फ संपत्ति नहीं महाभारत काल का लाक्षागृह, सरकार ने 'उम्मीद पोर्टल' से  हटाया नाम


कैसे शुरू हुआ विवाद?

5 महीने पहले उम्मीद पोर्टल पर बदला गया रिकॉर्ड

देशभर की वक्फ संपत्तियों को डिजिटल रूप से दर्ज करने के लिए उम्मीद पोर्टल बनाया गया।

इसी पोर्टल पर बागपत के लाक्षागृह को ‘दरगाह’ के रूप में दर्ज कर दिया गया।

जैसे ही यह जानकारी सामने आई, स्थानीय लोगों और हिन्दू संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया।

लोगों का कहना था कि यह स्थल महाभारतकालीन लाक्षागृह है, न कि वक्फ संपत्ति।

54 वर्ष पुराना है मामला

इस विवाद की शुरुआत वर्ष 1970 में हुई थी। बरनावा निवासी मुकीम खान ने मेरठ कोर्ट में केस दायर कर दावा किया कि प्राचीन टीले की जमीन पर दरगाह, बदरुद्दीन की मजार और कब्रिस्तान है। इस मामले में लाक्षागृह गुरुकुल के संस्थापक ब्रह्मचारी कृष्णदत्त महाराज को पक्षकार बनाया गया। 1977 में बागपत जिला बनने के बाद यह मामला बागपत कोर्ट में ट्रांसफर हो गया। तब से हिन्दू और मुस्लिम पक्ष की ओर से अदालत में लगातार साक्ष्य और दस्तावेज पेश किए जाते रहे।

5 फरवरी 2024 को आया बड़ा फैसला

करीब 54 वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद 5 फरवरी 2024 को बागपत की सिविल जज (जूनियर डिवीजन) कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

अदालत ने मुस्लिम पक्ष के दावों को साक्ष्यों के अभाव में खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि:

खुदाई में मिले अवशेष 

मिट्टी के प्राचीन पात्र 

ऐतिहासिक संरचनाएं 

पुरातात्विक साक्ष्य 

इस स्थान के महाभारतकालीन और प्राचीन हिन्दू सभ्यता से जुड़े होने की पुष्टि करते हैं।

अदालत ने स्पष्ट रूप से इस स्थल को लाक्षागृह माना।

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निर्णय के बाद भी बढ़ा विवाद

दिलचस्प बात यह रही कि कोर्ट का निर्णय आने के बावजूद दिसंबर 2025 में देशभर की वक्फ संपत्तियों को ऑनलाइन दर्ज करने की प्रक्रिया के दौरान इस स्थल को फिर से उम्मीद पोर्टल पर “दरगाह” के रूप में अपलोड कर दिया गया। इसके बाद विरोध और तेज हो गया। श्री गांधी धाम समिति गुरुकुल लाक्षागृह के मंत्री राजपाल त्यागी सहित कई लोगों ने इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई।

सरकार ने क्या कहा?

बागपत के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी कैलाशचंद तिवारी ने बताया-

कोर्ट के आदेश और ऐतिहासिक तथ्यों की समीक्षा की गई 

विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेजी गई 

जिला स्तर पर इस मामले में सीधे बदलाव संभव नहीं था 

शासन के निर्देश पर अब लाक्षागृह को वक्फ सूची और उम्मीद पोर्टल से हटा दिया गया है 

अभी भी जारी है कानूनी लड़ाई

हालांकि, मुस्लिम पक्ष ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी है।

इस मामले की सुनवाई अभी अपर जिला एवं सत्र न्यायालय प्रथम में चल रही है।

यानी कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

बरनावा का यह स्थल केवल एक टीला नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, महाभारत और प्राचीन इतिहास का जीवित प्रतीक माना जाता है।

यह वही स्थान माना जाता है जहाँ:

पांडवों के खिलाफ षड्यंत्र रचा गया 

लाक्षागृह बनाया गया 

सुरंग के रास्ते पांडवों के बच निकलने की कथा जुड़ी है 

इसी कारण यह स्थान धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।