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शांति और शक्ति का समन्वय

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शांति और शक्ति का समन्वय  

जय माँ! सनातन धर्म में कथाओं का विशेष महत्व है। पूर्व काल में घटित देवी-देवताओं की पौराणिक कथाएँ - श्रुति व स्मृति और शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य के द्वारा अगली पीढ़ियों को बतलाई जाती रही हैं। ऐसी ही एक दिव्य कथा - मार्कन्डेय पुराण में वर्णित श्री दुर्गा सप्तशती (देवी महात्मय) में माँ दुर्गा के महिषासुरमर्दिनी स्वरूप का सुंदर उल्लेख है। 

चैत्र के इस मंगल माह में नवरात्रि का महापर्व भारतवर्ष में श्रद्धा व अतिउत्साह के साथ मनाया जाता है। माँ दुर्गा की कथा के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस और उसकी सेना के राक्षसों से नौ दिवस तक माँ ने युद्ध करके दसवे दिन उसे पराजित किया। यह सत्य की असत्य पर, धर्म की अधर्म पर और शक्ति की दुराचार पर विजय का प्रतीक है। देवी को नौ रात्रि भक्तिभाव से पूजा जाता है, और प्रत्येक दिन उनकी एक विशेष शक्ति की आराधना की जाती है। 

वैदिक काल से प्रारंभ हुआ यह शुभ पर्व सहस्त्रों वर्षों से भारतीय संस्कृति और समाज का महत्वपूर्ण भाग रहा है। भक्तगण देवी माँ की कृपा को प्राप्त होने व अपने जीवन को शुद्ध करने हेतु समर्पण से व्रत उपवास करते हैं। माता के कीर्तन का सुमधुर गान होता है। कई सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भक्त इस समय देवी दुर्गा की महिमा और उनकी महिषासुर पर विजय की कथाएँ प्रस्तुत करते हैं।

मंदिरों व धार्मिक अनुष्ठानों से जन्मी भारत की शास्त्रीय नृत्य कला कथक में देवी-देवताओं की कथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। लोक कथाओं व परंपराओं से प्रचलित एक पंक्ति कही जाती है- ‘कथा कहे सो कथक कहलावे।’ आध्यात्म और संस्कृति में जिसकी जड़ें सुदृढ़ हैं, ऐसी कला की शैली कथक द्वारा वर्षों से सनातन धर्म की दिव्य कथाओं को विभिन्न मुद्राओं द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। गणेश जी, देवी, शिव जी, श्री राधा कृष्ण, रामायण व अनेकों और अलौकिक कथाओं की नृत्य के पवित्र माध्यम से प्रस्तुति की जाती है। कथक साधक इसे अपनी आराधना मानते हैं व अपनी प्रस्तुति भगवान को समर्पित करते हैं।

कथक नृत्यशैली में देवी का महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसी मान्यता है कि नृत्य में तांडव भगवान शिव द्वारा प्रकट हुआ और लास्य नृत्य की उत्पत्ति माता पार्वती द्वारा हुई। उमा-शंकर जी की अर्धनारेश्वर स्वरूप हैं, दोनों एक दूसरे से अभिन्न हैं - अर्थात एक हैं। दोनों ही रूपों में दया व पराक्रम, शांति व शक्ति का समत्व हैं। तांडव नृत्य पक्ष जिधर तीव्र, ऊर्जावान, आक्रामक, और शक्ति का प्रतीक है। वहीं लास्य नृत्य कोमलता, सुंदरता, प्रेम व शांति का प्रतीक है। 

नवरात्रि और कथक का एक सुंदर संबंध है। कथक में देवी दुर्गा की आराधना करते समय मंत्रों, स्तुतियों और भक्ति गीतों के साथ नृत्य किया जाता है, जो पूरे प्रदर्शन को आध्यात्मिक बना देता है। देवी स्तुति, सरस्वती वंदना, काली तांडव व पखावज के तीव्र और प्रभावशाली बोलों पर दुर्गा परण द्वारा माँ की असीम शक्ति को साधक भक्तिभाव से अभिव्यक्त करता है। देवी की वीरता व करुणा को कथक की घूम (चक्कर), तिहाई ऐवं भाव भंगिमा से प्रकट किया जाता है। माँ जगदंबा की ऊर्जा व दिव्यता को कथक साधक श्रद्धा, भक्ति और नृत्य कौशल से चित्रित करते है। इन प्रस्तुतियों में माँ के अनेक स्वरूपों के अनुसार गुणों को उजागर करते हैं - जैसे माँ सरस्वती की आराधना और ज्ञान को समर्पण दर्शाया जाता है, वैसे ही काली माँ के ऊग्र स्वरूप को कथक नृत्य के माध्यम से जीवंत किया जाता है। 

नवरात्रि की धार्मिक व सांस्कृतिक महत्ता और कथक नृत्य साधना के माध्यम से श्रद्धा और उल्लास से यह शुभ पर्व और भी सुशोभित हो जाता है। माँ के ध्यान को साधने से यह ज्ञात होता है कि सत्य स्वरूप यह आत्मा अपार शांति व शक्ति का समन्वय ही है।