मेरी प्यारी चिड़िया (विश्व गोरैया दिवस 20 मार्च पर विशेष)
एक पक्षी के दर्द का फसाना था, टूटे थे पंख और उड़ते हुए जाना था।
तूफान तो झेल गया पर अफसोस, वह डाल टूट गई जिस पर उसका आशियाना था।।
जी हां हम बात कर रहे हैं मानव की सबसे प्यारी पक्षी, घरों में चहचहाती फुदकती उस नन्ही सी चिड़िया गौरैया की, जो प्राचीन काल से ही हमारे उल्लास, स्वतंत्रता एवं संस्कृति की संवाहक रही है। मानव की सबसे निकटतम मित्र गौरैया की संख्या में लगातार गिरावट आने से उनके विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। परंतु आज भी इस भौतिकतावादी युग में ऐसे मानवता प्रेमी लोग हैं जो ‘जियो और जीने दो’, तथा ‘जीवों पर दया करो’ के सिद्धांत को समर्पित है। प्रस्तुत है केशव संवाद पत्रिका की कार्यकारी संपादक डॉ. नीलम कुमारी द्वारा गौरैया मित्र क्लब, टीम वंडरफुल के सदस्य एवं नानकचंद एंग्लो संस्कृत कॉलेज मेरठ के सांख्यिकी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. विवेक त्यागी जी से साक्षात्कार पर आधारित संपादित अंश-
आपने गौरैया संरक्षण अभियान की शुरुआत कब की ?
मैंने गौरैया बचाओ अभियान की शुरुआत 2011 में की जब हमारे घर में गौरैया पंखे के बॉक्स में घोंसला बना रही थी और उसके अंडे बार-बार गिर कर टूट रहे थे जिसे देखकर मेरा बेटा दुखी होता था।
इसका जिक्र जब मैंने अपने वरिष्ठ साथी प्रो. देवेश चन्द्र शर्मा जी से किया तो उन्होंने मुझे बताया कि वो स्वयं भी इस दिशा में काफी पढ़ रहे हैं और गौरैया की तेजी से घटती संख्या पर चिंतित हैं। इस तरह मेरठ में प्रो. देवेश चंद्र शर्मा जी के ही निर्देशन में हमने गौरैया बचाओ अभियान की शुरुआत की।
आपको गौरैया संरक्षण की प्रेरणा कहां से मिली ?
एक शाम खिड़की के पास गौरैया के करुण क्रंदन को देखकर मेरा दिल भर गया यह घटना उस समय की है जब हम रोज महाविद्यालय से लौटकर घर आते थे तो एक छोटी सी नन्ही सी गौरैया ने एक छोटा सा घोंसला हमारे घर के अंदर बनाया था, परंतु पीड़ा की बात है कि जब भी हम आते हैं हमें उसका एक अंडा टूटा हुआ मिलता था। जब दो-तीन बार उसकी पुनरावृत्ति हुई तो मेरे मन में आया कि क्यों ना हम इसका एक कृत्रिम घोंसला बनवा दे, जिससे कि गौरैया के बच्चे और वह सुरक्षित रह सके। जैसे ही हमने वहां पर कृत्रिम घोंसला बनाया, धीरे-धीरे हमारे घर मंे नन्ही चिड़िया आने लगी और धीरे-धीरे हमारी दोस्त बन गयी। तब से हमारे मन में एक भावना घर कर गई कि हमें गौरैया को बचाने के लिए एक अभियान की शुरुआत करनी चाहिए।
एक बात और, आज भौतिकता की अंधी दौड़ में हमने गगनचुंबी भवन तो खड़े कर लिए लेकिन उन परिंदों के बारे में नहीं सोचा जो इन अट्टालिकाओं की भेंट चढ़ गए। अपनी इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में हम इतना वक्त नहीं निकाल पाते कि इस नन्ही सी जान के लिए आशियाना बना पाए बस यहीं से मुझे उस नन्ही सी चिड़िया को बचाने की प्रेरणा मिली।
आपका गौरैया मित्र क्लब क्या-क्या काम करता है और इसमें आपके साथ कौन-कौन लोग सम्मिलित हैं ?
हमारा ‘गौरैया मित्र क्लब’ और ‘टीम वंडरफुल’ पर्यावरण के क्षेत्र में और गौरैया संरक्षण अभियान को बढ़ावा देने के लिए कृत्रिम घोंसला बनवा कर देता है तथा स्कूल कॉलेज और कॉलोनी में वृक्षारोपण करना, स्वच्छता अभियान चलाना आदि का कार्य करता है। इस पुनीत कार्य में गौरैया मित्र क्लब के संस्थापक सदस्य प्रो. देवेश चंद्र शर्मा, डॉ नवीन गुप्ता, डॉ. देवेश टंडन , डॉ. हरीश गुप्ता, डॉ. के के शर्मा, डॉ. जितेंद्र तोमर मिलकर कार्य करते हैं।
अब तक आप गौरैया बचाओ अभियान के तहत कितने कृत्रिम घांेसले बनवा कर दे चुके हैं ?
अभी तक ‘गौरैया मित्र क्लब’ एवं ‘टीम वंडरफुल’ के संयुक्त प्रयास से हम सभी लोग लगभग 500 से अधिक कृत्रिम घोंसले या घर बनवाकर वितरण कर चुके हैं और साथ ही साथ पर्यावरण के क्षेत्र में अधिक से अधिक पेड़ लगाने व संरक्षण करने का कार्य कर रहे हैं।
गौरैया का घर में आना किस बात का संकेत है।
गौरैया का घर में आना बहुत शुभ होता है इसके आने से जीवन में मधुरता आती है, बिगड़ते हुए कार्य बनते हैं और कार्य क्षेत्र में भी सफलता मिलती है।
आप विश्व गौरैया दिवस पर हमारे पाठकों को क्या संदेश देना चाहेंगे।
विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर हम सभी, विशेषतः युवा वर्ग गौरैया संरक्षण की शपथ लें और हमें चाहिए कि हम गौरैया के प्रति जागरूक होकर इन्हें बचाने के लिए घरों की छत पर पानी के बर्तन और पेड़ पौधे अधिक से अधिक लगायें ताकि गौरैया के साथ-साथ अन्य परिंदों का भी जीवन बच सके।
आपने बिल्कुल सही कहा कि अगर हम अपने पर्यावरण को बचाना चाहते हैं और आने वाली पीढ़ी को गौरैया के बारे में जागरूक करना चाहते हैं तो गौरैया का संरक्षण अति आवश्यक है। अन्यथा वह दिन दूर नही जब गौरैया सिर्फ किताबों और कहानियों में याद बनकर रह जायेगी।
महादेवी वर्मा के शब्दों में -
आँधी आई जोर शोर से,
डालें टूटी हैं झकोर से।
उड़ा घोंसला अंडे फूटे,
किससे दुख की बात कहेगी!
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी?
हमने खोला अलमारी को,
बुला रहे हैं बेचारी को।
पर वो चीं-चीं करती है
घर में तो वो नहीं रहेगी!
घर में पेड़ कहाँ से लाएँ,
कैसे यह घोंसला बनाएँ!
कैसे फूटे अंडे जोड़ें,
किससे यह सब बात कहेगी!
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी?




