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प्रकृति का पर्व वसंत पंचमी

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प्रकृति का पर्व वसंत पंचमी 


प्रकृति का इकलौता पर्व है, जिसमें लगता है कि जैसे प्रकृति ने हमें वसंत ऋतु के रूप में एक उपहार दिया है। इस समय शीत ऋतु जाने की तैयारी कर रही होती है। प्रकृति का कण-कण मनमोहक लगता है। वसंत ऐसा उत्सव है जिसमें ठंड से सिमटे पशु और परिन्दों में मानो नवजीवन का संचार हो जाता है। यानी पूरी सृष्टि में उमंग आ जाती है। जहां भी वन उपवन हैं, वहां बहार आ जाती है। खेतों में फूली हुई सरसों और फूलों के गहनों से सजी धरती की छटा देखते ही बनती है। वातावरण ऐसा कि जैसे ऋतुराज वसंत के स्वागत में कोई सुंदरी फूलों के गहने पहनकर प्रतीक्षा कर रही हो। इस मौसम में बेल बूटों और वृक्षों पर नई कोंपलों की शोभा निराली होती है। नये खिले फूलों पर भौंरे, तितलियां मंडराते रहते हैं। मधुमक्खियों में फूलों के रस को पीने की होड़ रहती है। यानि वसंत पंचमी का उत्सव चहुंओर रंग और उमंग से सराबोर करने वाला पर्व होता है। 

वसंत पंचमी से वसंत ऋतु का आगमन होता है। ठंडी हवा का स्थान वसंती हवा ले लेती है। वसंत को ऋतुओं का राजा इसलिए कहते हैं, क्योंकि पंच तत्व - जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपने मोहक रूप में होते हैं। स्वच्छ आकाश, सूर्य का ताप, सर्दी की कंपकंपाहट से मुक्त करता है, तो पक्षी उड़ने का सुख प्राप्त करते हैं। सावन की हरियाली सर्दी तक बूढ़ी हो जाती है, ऐसे में वसंत उसे फिर से युवा कर देता है। सतत्, सुदंर लगने वाली प्रकृति, वसंत ऋतु में सोलह कलाओं से खिल उठती है। 

ब्रह्मपुराण के अनुसार ब्रह्माजी को वनस्पतियों, जीवधारियों की मनमोहक रचना के बाद संतुष्टि नहीं मिली, सृष्टि मौन और उदास महसूस हुई। तब भगवान विष्णु के कहने पर उन्होंने अपने कमण्डल के जल की अंजुरी भरकर उसे अभिमंत्रित करके भूमि पर छिड़का, तो वृक्षों से एक अद्भुत चर्तुभुजी देवी प्रकट हुईं। जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर की मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। तब ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। देवी की वीणा की झंकार सुनते ही जीवों को वाणी मिल गई। जल की धारा में कल-कल और हवा में सरसराहट के साथ मूक सृष्टि मुखर हो गई। वह तिथि माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी थी। जिसे भारत, नेपाल, बांग्लादेश, और इण्डोनेशिया में वसंत पंचमी के रूप में मनाते हैं। मां सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादिनी और विद्या, बुद्धि देने वाली देवी के नाम से भी जाना जाता है। इस तरह मां सरस्वती की विभिन्न रूपों में आराधना की जाती है। मां शारदा कला और संगीत की देवी भी कहलाती हैं। सोलह कलाओं से संपूर्ण श्री कृष्ण के लिए ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, सर्वप्रथम श्रीकृष्ण ने ही सरस्वती पूजन किया था।

दक्षिण भारत में इसे श्रीपंचमी कहा जाता हैं। वसंत पंचमी के दिन पुस्तकों, वाद्य यंत्रों की पूजा करना, गृह प्रवेश, नया कारोबार शुरू करना, बच्चों को पुस्तकें भेंट करने की प्रथा है। इस दिन पीले कपड़े पहनना प्रकृति से साम्यता का भाव दर्शाता है। सरसों के फूल तो ऐसे लगते हैं मानों धरती ने पीले कपड़े पहने हों। महानगरों में जिन्होंने छतों पर बागवानी की है, उन्हें भी वसंत परिश्रम के फलस्वरूप, रंग बिरंगे फूलों का उपहार देता है। कहीं सफेद फूल, तो कहीं लाल, तो कहीं गुलाबी, तो कहीं रंग-बिरंगे फूल प्राकृतिक सौन्दर्य को बढ़ाते हैं। वसंत के मौसम में देशभर के अलग-अलग हिस्सों में फूलों से जुड़ी कई मान्यताएं और परंपराएं प्रचलित हैं। गुजरात में इस दिन फूलों का आदान-प्रदान किया जाता है। 


हमारे किसी भी उत्सव में घर पकवानों की महक से भर जाता है। इसलिए इस पर्व में भी अलग-अलग राज्यों में तरह-तरह के पकवान और प्रसाद बनाने की परंपरा है। पीले चावल या हलुआ बनाना, खाना, खिलाना और परिवार सहित सरस्वती पूजन की मान्यता है। प. बंगाल में खिचड़ी, राजभोग, बिहार में केसरी रंग के मालपुआ और बूंदी, पंजाब में केसरिया मीठे और नमकीन चावल, तेलंगाना और दक्षिण भारत में शुद्ध घी में मीठे भात और केसरी लड्डू, उत्तर प्रदेश में 16 तरह के व्यंजन जिसमें पीले मीठे का भोग लगाया जाता है। महाराष्ट्र में पूरनपोली, पुआ और खास तरह से चने की दाल बनती है। पूरे देश में इस दिन बिना साहे (विवाह का शुभ मुहूर्त) के विवाह संपन्न किए जाते हैं। कोई भी शुभ कार्य कर सकते हैं। बच्चे का अन्नप्राशन यानि पहली बार अन्न खिलाने का संस्कार किया जाता हैं। बच्चे का तख्ती पूजन (अक्षर ज्ञान) करते हैं। सरस्वती पूजन के बाद तख्ती पर हल्दी के घोल से बच्चे की अंगुली से स्वास्तिक बनाते हैं। परिवार बोलता है। ”गुरु गृह पढ़न गए रघुराई। अल्पकाल सब विद्या पाई।“ और बच्चे की स्कूली शिक्षा शुरू होती है।  

मान्यता है कि महाभारत के रचयिता वेदव्यास मानसिक उलझनों में थे, तब शांति के लिए वे तीर्थाटन पर गए। दंडकारण्य (बासर का प्राचीन नाम) तेलंगाना में, गोदावरी के तट के प्राकृतिक सौन्दर्य ने उन्हें कुछ समय के लिए रोक लिया था। यहीं ऋषि वाल्मीकि ने रामायण लिखने से पहले, मां सरस्वती को स्थापित कर उनका आर्शीवाद प्राप्त किया था। आज उसी स्थान पर मां शारदे निवास को श्री ज्ञान सरस्वती मंदिर कहते हैं। वसंत पंचमी को बासर में गोदावरी तट पर स्थित इस मंदिर में बच्चों को अक्षर ज्ञान से पहले अक्षर अभिषेक के लिए लाया जाता है। भारत भूमि ज्ञान की भूमि कहलाती है। प्राचीन समय में विदेशी छात्र बौद्ध काल में पढ़ने आए, जब वे लौटे तो अपने साथ कई भारतीय परंपराएं लेकर गये। जहां-जहां बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ वहां सरस्वती पूजन भी होने लगा। चीनी और जपानी भी इस परंपरा से जुड़ गये।

पूर्वांचल में वसंत पंचमी को होलिका दहन के लिए ढाड़ा गाढ़ देते हैं। फगुआ के बिना होली कैसी! अब फगुआ, फाग, जोगीरा और होली गायन शुरू हो जाता है। जिसमें शास्त्रीय संगीत, उपशास्त्रीय संगीत और लोकगीत हर्षाेल्लास से गाए जाते हैं। प्रवासी घर जाने की तैयारी शुरू कर देते हैं।

वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर, शाह बिहारी मंदिर, मथुरा के श्री कृष्ण जन्मस्थान और बरसाना के राधाजी मंदिर में ठाकुरजी को वसंत पंचमी के दिन पीली पोशाक पहनाई जाती है। वसंत पंचमी से फाग गाने की शुरुआत होती है। देश विदेश से श्रद्धालु ब्रजमंडल की होली में शामिल होने के लिए तैयारी शुरु कर देते हैं। इस दिन से ब्रज में चलने वाले 40 दिन के उत्सव पर, होलिका दहन को अनोखा नजारा देखना अपने आप में सौभाग्य की बात है। वसंत पंचमी से वसंत ऋतु शुरू होती है और होली पर उल्लास चरम पर होता है इसके साथ ही वसंतोत्सव पूर्ण होता है। वसंत पंचमी न केवल पवित्र त्यौहार है, बल्कि इससे भारतीयता और हिंदू सभ्यता की प्राचीन परंपराओं का दिग्दर्शन भी होता है। यही हमारे उत्सवों की मिठास है जिसमें प्रकृति और पर्व का गजब का समन्वय है।