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नासिक, उज्जैन, हरिद्वार एवं प्रयागराज में ही कुम्भ क्यों ?

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नासिक, उज्जैन, हरिद्वार एवं प्रयागराज में ही कुम्भ क्यों ? 

भारतवर्ष के अति प्राचीन काल के इतिहास में नासिक, उज्जैन, हरिद्वार एवं प्रयाग इन चार स्थानों का बहुत महत्व है। ये चारों मोक्षदायिनी स्थान भी है। भगवान शिव की ये चारों नगरियां अथवा स्थान शिव को बहुत प्रिय है। नासिक में वनवास के समय श्रीराम पंचवटी में रहते थे, यहां रावण की बहन सूर्पणखा की जिद के कारण लक्ष्मण ने उसकी नासिका (नाक) को काट दिया था। नाक का अग्रभाग कटकर यहां गिरने से यह स्थान कालान्तर में ‘नासिक’ नाम से प्रसिद्ध हो गया। गोदावरी नदी के तट पर नासिक के पास भगवान का त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है जो शिव के बारह ज्योतिर्लिंग में से एक विश्व प्रसिद्व है। सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहिताश्व के शासन काल के समय बाहर वर्षों का अनावृष्टि काल आया था। जिसमें सभी वनस्पति, तालाब सूख गये थे तब गौतम ऋषि ने सह्याद्रि पर्वत शिखर के जलस्रोत से एक नदी का उदय कराया था जिससे नदी के किनारे जनसमूह आवासित होकर अपना जीवन सुरक्षित कर सके। उस नदी का नाम पहले गौतमी पड़ा फिर गोदावरी हो गया। इस नदी के पास ही नासिक स्थान है। 

उज्जैन का पहला नाम ‘अवन्ति’ था ऋषियों ने इस स्थान को भारतवर्ष का केन्द्र माना है। क्षिप्रा नदी के दांये तट पर बसा मध्यप्रदेश का यह प्रसिद्धनगर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में महाकालेश्वर के नाम से जाना जाता हे। बौद्धकाल में अवंती उत्तर भारत के सोलह महाजनपदों में से एक महाजनपद था। जिनकी सूची अंगुतरनिकाय में है। पुराणों के अनुसार अवंती की स्थापना यदुवंशी राजा अवन्त ने की थी।  कालान्तर में यदुवंशी राजाओं ने अपना राज्य विस्तार मगध तक व इससे पूर्व तक के भू-भाग पर किया और अपने राज्य का केन्द्र मगध-पाटल को बनाया। अवन्ती प्रदेश के अथवा मालव क्षेत्र से यदुवंशियों का ध्यान हटते ही उनके भ्राता वंशियों पौरवों ने उस पर अपना अधिकार कर लिया। पोरव और यदु चन्द्रवंशी क्षत्रिय ही थे। पौरव वंशज उज्जयन्त ने अवन्ती को उज्जयन्तिका नाम दिया।  कालान्तर में यह शिवपुरी नगरी उज्जयिनी और उज्जैन नाम से प्रसिद्ध हई। 

पवित्र गंगा के तट पर हरिद्वार का प्रारम्भिक नाम मायापुरी था जिसका पुराणों और महाभारत में उल्लेख है। मायापुरी को दक्षपुरी, सतीपुरी (कनखल) भी कहते थे। प्रजापति दक्ष ने यहां विशाल यज्ञ किया था, उस यज्ञ में शिव का अपमान हुआ था जिसे शिव पत्नि सती सहन न कर सकी और यज्ञ कुण्ड में कूदकर जल गयी थी। वर्तमान में कनखल में सतीकुण्ड बना है जहां सायंकाल प्रतिदिन चारो ओर दीप प्रज्ज्वलित  किये जाते हैं यह सती की याद में आज भी प्रचलित है। भगवान विष्णु का धाम बद्रिकाश्रम में बद्रीधाम (बद्रीनाथ) नाम से प्रसिद्ध है और भगवान शिव का स्थान केदारनाथ नाम से विख्यात है यह दोनों स्थान पर्वतों में है। वहां पैदल जाने का मार्ग मायापुरी से प्रारम्भ होता था इसलिए ‘हरि’ का द्वार कहा जाने लगा। यहां  की पहाड़ियों शिवालिक से निकलकर भागीरथी गंगा पहली बार मैदान में आती है।  इस मायापुरी नगरी का सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में भी उल्लेख मिलता है।  महाभारत में हरिद्वार (हरद्वार) को गंगाद्वार कहा गया है। चीनी यात्राी युवानत्वांग ने इस मायापुरी का मथूरपुरी नाम से उल्लेख किया है। 

प्रयागराज का अतिप्राचीन नाम प्राकृष्टयाग था। इसे चन्द्रवंश के संस्थापक पुरुरवा ने बसाया था। प्रयागराज के निकट गंगा के दूसरे तट पर स्थ्ति झूसी ही प्राचीन प्रतिष्ठानपुर है। महाभारत में सब तीर्थों की यात्रा को प्रतिष्ठान में ही प्रतिष्ठित माना गया है। प्राकृष्टयाग और प्रतिष्ठानपुर का अपभ्रंश ही प्रयाग है। प्रयागराज का अर्थ नदियों का संगम भी होता है जैसे रूद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग। कृषि योग्य तीन नदियों के संगम की भूमि को वेदों में प्राकृष्टयाग कहा गया है। अतः यमुना और गंगा नदियों के मध्य एक सरस्वती नदी भी प्रवाहित थी जिसे सप्तसरस्वती नदियों में से एक माना गया हे। जो अब सूख गई है जिसका उद्गम शाकुम्भरी देवी की पर्वत घाटी से माना गया है। इन तीन नदियों से संगम पर ही प्रयागराज बसा है। पुराणों में यहां अक्षयवट वृक्ष का भी उल्लेख मिलता है। जहां यह अक्षयवट वृक्ष है वहां इला आवास था जिसे बाद में इलाबास कहा जाने लगा। वैवस्वतमनु की पुत्री इला का विवाह चन्द्र पुत्र बुद्ध के साथ हुआ था। इला बुद्ध के पुत्र पुरूखां ने अपनी माता के आवास को ध्यान में रखकर प्राकृष्टयाग (प्रयागराज ) को स्थापित किया था। मुगलकाल में अकबर ने इलाबास स्थान को अपने किले के रूप में जीर्णोद्धार करके अल्लाहाबाद या इलाहाबाद नाम से प्रचलित करवा दिया। अपने देश के प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार सभी तीर्थों का राजा होने से प्रयाग को प्रयागराज कहा जाने लगा। 

उपरोक्त वर्णित चारों नगरी अतिप्राचीन काल से विश्वविख्यात हैं और इन चारों नगरियों का सम्बन्ध कुम्भ मेले से भी है। प्रत्येक बारह वर्षों में बारी-बारी से इन चारों स्थानों पर कुम्भ मेला लगता है। अतः प्रत्येक तीन वर्ष बाद इनमें से एक स्थान पर कुम्भ होता है। सनातन धर्म के अनुसार भारत में मनाया जाने वाले विश्व का सबसे बड़ा मेला कुम्भ है। कुम्भ मेले का इतिहास कम से कम हजार साल पुराना माना जाता है कि आद्य शंकराचार्य ने सम्पूर्ण भारत के जनमानस को एक दूसरे के साथ जोड़ने के लिए इसकी शुरुआत की थी लेकिन पुराणों के अनुसार कुम्भ की शुरूआत समुद्रमन्थन के समय से की जाती है। स्वर्ग भूमि को लेकर देव और दैत्यों के युद्ध होते रहते थे। स्वर्ग पर राक्षस न दैत्यों का अधिकार होने से देव आदित्य ब्रह्मा जी के पास गये तो उन्होंने उन्हें भगवान विष्णु के पास भेजा और समुद्र मन्थन का उपाय भगवान विष्णु ने बताया। दैत्यों और देवों ने मिलकर समुद्र मन्थन किया उसमें से अनेक चीजें प्राप्त हुई उन्ही में से अमृत कलश भी प्राप्त हुआ। तब अमृत घट को लेकर देवताओं और असुरों में खींचतान शुरू हो गयी तो इन्द्र के पुत्र उज्जयन्त ने अमृतकलश लिया और आकाश मार्ग से जाने लगा तब असुरों ने आकाश में छीना छपटी की जिससे अमृत छलक कर इन चार स्थानों यथा नासिक, उज्जैन, प्रयाग और हरिद्वार में गिरा जिससे ये स्थान भूमि के सर्वाधिक पवित्र माने जाने लगे और इन पवित्र स्थलों पर स्नान करने की परम्परा प्रारम्भ हुई। 

कुम्भ का  आयोजन में ग्रहों का भी विशेष महत्व है। ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है, जब अमृत पाने के लिए संघर्ष हुआ तब असुरों से अमृत की रक्षा करते हुए चन्द्रमा ने अमृत को बहने से बचाया। सूर्य ने कलश को फूटने से बचाया और शनि ने इन्द्र के कोप से रक्षा की तथा गुरु ने कलश को छुपाकर रखा था। इसलिए जब इन ग्रहों का संयोग एक राशि में होता है तब कुम्भ का आयोजन होता है क्योंकि इन चार ग्रहों के सहयोग से अमृत की रक्षा हुई थी। पचांग के अनुसार कुम्भ का सम्बन्ध राशि और ग्रहों के साथ स्थापित हो गया। प्रयागराज में कुम्भ तब लगता है जब माघ अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र मकर राशि में होते हैं और गुरु मेष राशि में होता है। हरिद्वार में कुम्भ तब लगता है जब गुरु कुम्भ राशि में और सूर्य मेष राशि में आता है। नासिक में कुम्भ के लिए सूर्य और गुरु दोनों ही सिंह राशि में आना आवश्यक है। गुरु जब कुम्भ राशि में प्रवेश करता है तब उज्जैन में कुम्भ लगता है। 

गुरु एक राशि में लगभग एक वर्ष रहता है। इस तरह बारह राशियों में भ्रमण करते हुए उसे बारह वर्ष का समय लगता है। हर बारह वर्ष बाद उसी स्थान पर कुम्भ का आयोजन होता है। कुम्भ के लिए निर्धारित चारों स्थानों में प्रयाग के कुम्भ का विशेष महत्व है। प्रत्येक 144 वर्ष बाद यहां महाकुम्भ आयोजन होता है। देवताओं का बारह वर्ष पृथ्वी लोक के 144 वर्ष बाद आता है। इसलिए यह महाकुम्भ, जो प्रयागराज में है उसकी विशेष महत्ता है।