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AI: तकनीक की दौड़ में भारत विश्वगुरु

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एआई: तकनीक की दौड़ में भारत विश्वगुरु

आज हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ विज्ञान कथाएं हकीकत में बदल रही हैं। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, हमारी दुनिया ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ या ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के अदृश्य धागों से बुनी जा रही है। चाहे वह हमारे फोन का फेस लॉक हो, गूगल मैप्स का रास्ता दिखाना हो, या चैट जीपीटी जैसे टूल्स से बात करना हो, एआई अब भविष्य नहीं, बल्कि हमारा वर्तमान है। अगर हम ध्यान से अपने आस-पास भी देखें, तो साफ दिखाई देता है कि अब कई जगहों पर इंसानों की जगह मशीनें काम कर रही हैं। लेकिन, जिस प्रकार से शक्ति को नियंत्रण की जरूरत पड़ती है वैसे ही एआई को भी नियंत्रण की जरूरत है। एआई के साथ एक बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा हुआ है ‘नैतिकता’ का। क्या मशीनें सही और गलत में फर्क कर सकती हैं? और अगर नहीं, तो उनकी गलतियों का जिम्मेदार कौन है? जहाँ दुनिया एआई के खतरों से डर रही है, वहीं भारत ने इसे एक अवसर के रूप में देखा है, लेकिन अपनी शर्तों पर। भारत हमेशा से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत पर चला है, और यही सिद्धांत भारत की एआई नीति का आधार भी है।

एआई की इतनी शक्तिशाली तकनीक केवल कौशल का मामला नहीं है, बल्कि मूल्य और ज़िम्मेदारी का सवाल भी बन जाती है। यह समझना आवश्यक है कि एआई कोई जादुई वस्तु नहीं है। यह डेटा से पैटर्न सीखता है और उसी आधार पर निष्कर्ष निकालता है। यदि डेटा त्रुटिपूर्ण है, असमान है, या पक्षपाती है, तो एआई का निर्णय भी स्वाभाविक रूप से अनैतिक ही होगा। इसलिए एआई की प्रगति को केवल तकनीकी उपलब्धि की तरह नहीं देखा जा सकता। यदि इसमें मानव मूल्य, संवेदनशीलता, निष्पक्षता और जवाबदेही नहीं है, तो प्रगति अधूरी है। भारत के नीति आयोग ने अपनी राष्ट्रीय रणनीति में स्पष्ट किया है कि भारत एआई का उपयोग कंपनियों के मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि ‘सामाजिक सशक्तिकरण’ के लिए करेगा। भारत सरकार का मानना है कि एआई का विकास सुरक्षित, विश्वसनीय और जवाबदेह होना चाहिए। वैश्विक मंचों, जैसे कि G 20 की अध्यक्षता के दौरान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘जिम्मेदार एआई’ की वकालत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि डीपफेक और साइबर खतरों से निपटने के लिए वैश्विक नियमों की आवश्यकता है। यह भारत की परिपक्वता और नेतृत्व को दर्शाता है।

एआई को समझने और नैतिकता की आवश्यकता: आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस अब केवल एक तकनीक नहीं रही, बल्कि ऐसा सिस्टम बन चुकी है जो इंसानों की तरह सीख सकती है, समझ सकती है और फैसला लेना सीख रही है। इसलिए एआई को समझना जरूरी है। एआई की मुख्य शक्ति मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग में है। मशीन लर्निंग में एल्गोरिद्म डेटा से सीखता है, जबकि डीप लर्निंग मानव मस्तिष्क के न्यूरल नेटवर्क की नकल करके जटिल पैटर्न पहचानता है। यह तकनीक भाषा समझती है, चित्र पहचानती है, निर्णय लेती है और भविष्य का अनुमान भी लगाती है।  अस्पतालों में निदान तेज हुए, वित्तीय प्रणालियाँ स्वचालित हुईं, सरकारें डेटा-आधारित प्रबंधन अपनाने लगीं और लगभग हर उद्योग एआई की सहायता से निर्णय लेने लगा। स्वास्थ्य में एआई आधारित स्कैनिंग, बैंकिंग में जोखिम मूल्यांकन, ई-गवरनेंस में पहचान सत्यापन से लेकर जन-सेवाओं के वितरण तक एआई ने हर तरफ प्रवेश कर लिया है। लेकिन एआई मानव द्वरा निर्मित डेटा से सीखता है और यही डेटा समाज के भीतर मौजूद पूर्वाग्रहों को भी समेटता है। इसे उदहरण से समझ सकते हैं कि यदि भर्ती के पुराने रिकॉर्ड में महिलाओं को कम चुना गया, तो एआई नई भर्ती प्रक्रिया में भी महिलाओं को कम योग्य मानने लगेगा। यदि किसी क्षेत्र विशेष को अपराध के साथ अधिक जोड़ा गया है, तो उस समुदाय को एआई बड़े जोखिम के रूप में देखना शुरू कर देगा। 

यानी डेटा की नैतिकता ही एआई की नैतिकता बन जाती है। एआई कोई स्वतंत्र सोच नहीं रखता। यह हमारे द्वारा दिये गए पूर्वाग्रहों को बड़े पैमाने पर दोहरा कर समाज में असमानता बढ़ा सकता है। इसलिए जब हम ‘एआई एवं नैतिकता’ की बात करते हैं, तो हम मशीनों के चरित्र की नहीं, बल्कि उन्हें बनाने वाले और उनका उपयोग करने वाले इंसानों के इरादों की बात कर रहे होते हैं। तकनीक अपने आप में न अच्छी होती है न बुरी, उसका उपयोग उसे परिभाषित करता है। यहीं पर नैतिकता का प्रवेश होता है। 


भारत में नवोत्थान  - भारत ने केवल बातें नहीं की हैं, बल्कि ठोस कदम भी उठाए हैं-

इंडिया एआई मिशन (India एआई Mission) - 2024 में भारत सरकार ने 10,300 करोड़ रुपये से अधिक के बजट के साथ ‘इंडिया एआई मिशन’ को मंजूरी दी थी। इसका उद्देश्य भारत में एक मजबूत एआई इकोसिस्टम बनाना है। इसके तहत कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाई जा रही है ताकि भारतीय स्टार्टअप्स और शोधकर्ताओं को महंगे विदेशी संसाधनों पर निर्भर न रहना पड़े।

भाषिनि - bhashini.gov.in यह भारत की सबसे क्रांतिकारी एआई उपलब्धियों में से एक है। ‘भाषिनि’ एक एआई आधारित भाषा अनुवाद प्लेटफॉर्म है। इसका लक्ष्य इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं को हर भारतीय की अपनी भाषा में उपलब्ध कराना है। हाल ही में ‘काशी तमिल संगमम’ के दौरान प्रधानमंत्री के भाषण का वास्तविक समय में तमिल अनुवाद इसी तकनीक के जरिए किया गया। यह ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को तकनीक के जरिए साकार करना है।

ऐरावत - भारत का एआई सुपरकंप्यूटर ‘एआई RAWAT' दुनिया के शीर्ष 500 सुपरकंप्यूटरों की सूची में अपनी जगह बना चुका है (इसे 75वां स्थान प्राप्त हुआ था)। यह उपलब्धि साबित करती है कि भारत तकनीकी क्षमता में किसी से पीछे नहीं है।

प्रमुख सरकारी पोर्टल्स 

INDIA एआई (india,आई.gov.in) - यह भारत का राष्ट्रीय एआई पोर्टल है। यहाँ एआई से जुड़ी हर खबर, लेख, केस स्टडी और सीखने के संसाधन उपलब्ध हैं। यह दुनिया के लिए भारत की एआई यात्रा की खिड़की है।

युवाओं के लिए (YUV,आई) -  स्कूली छात्रों को एआई सिखाने के लिए 'Responsible एआई वितYouth' जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी न केवल उपभोक्ता बने बल्कि निर्माता भी बने।

कृषि और स्वास्थ्य में एआई - भारत ने एआई का उपयोग अस्पतालों और खेतों में भी शुरू कर दिया है-

स्वास्थ्य - ‘आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन’ में एआई का उपयोग करके रोगों की जल्दी पहचान और इलाज को सुलभ बनाया जा रहा है।

कृषि - तेलंगाना और अन्य राज्यों में किसानों को बुवाई और मौसम की जानकारी देने के लिए एआई चैटबॉट्स का इस्तेमाल हो रहा है।

भारत की सीख और नैतिकता का मार्ग - भारत ने दुनिया को सिखाया है कि तकनीक का मानवीकरण कैसे किया जाए। भारत में एआई की नैतिकता के तीन स्तंभ माने जा सकते हैं।

सर्वजन हिताय - तकनीक का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए।

गोपनीयता का सम्मान - डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट जैसे कानूनों के जरिए भारत ने डेटा की सुरक्षा को कानूनी रूप दिया है।

पारदर्शिता - यह जानना यूजर का अधिकार है कि वह मशीन से बात कर रहा है या इंसान से।

भारत सरकार डीपफेक और गलत सूचनाओं से निपटने के लिए आईटी नियमों में सख्ती ला रही है और सोशल मीडिया कंपनियों को जवाबदेह ठहरा रही है। यह दर्शाता है कि भारत नवाचार  का समर्थन करता है, लेकिन अराजकता का नहीं।

अंत में, ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नैतिकता’ का विषय केवल कोडिंग या एल्गोरिदम तक सीमित नहीं है, यह हमारे मूल्यों का दर्पण है। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह एआई की दौड़ में केवल एक मूक दर्शक नहीं, बल्कि एक विश्व गुरु और पथ-प्रदर्शक है। हमें एआई को एक ऐसे साथी के रूप में अपनाना होगा जो हमारी क्षमताओं को बढ़ाए, न कि हमारे मूल्यों को घटाए। जैसा कि भारत का मानना है-तकनीक अगर शरीर है, तो नैतिकता उसकी आत्मा है। बिना आत्मा के शरीर निर्जीव है, और बिना नैतिकता के एआई विनाशकारी। भारत इसी संतुलन को साधते हुए एक विकसित राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है।

मुख्य नैतिक और डिजिटल चुनौतियाँ -

पूर्वाग्रह और निष्पक्षता - एआई अक्सर जाति, लिंग, वर्ण, भाषा और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर निर्णयों में पक्षपात दिखा देता है। एआई सिस्टम उसी ‘डेटा’ (Data) से सीखते हैं जो उन्हें दिया जाता है। अगर डेटा में भेदभाव है, तो एआई के नतीजों में भी भेदभाव होगा। उदाहरण के लिए, अगर किसी एआई को केवल पश्चिमी देशों के डेटा पर ट्रेन किया गया है, तो वह भारतीय चेहरों, भाषाओं या संस्कृति को सही ढंग से नहीं समझ पाएगा। भारत के लिए यह सुनिश्चित करना एक नैतिक जिम्मेदारी है कि एआई मॉडल हमारी सांस्कृतिक विविधता और संवेदनशीलता का सम्मान करें।

जवाबदेही और पारदर्शिता - एआई के निर्णय अक्सर ब्लैक-बॉक्स जैसे होते हैं। किसी को नहीं पता चलता कि किसी एल्गोरिद्म ने किसी व्यक्ति का स्कोर कम क्यों दिया है या किसी प्रोजेक्ट को असुरक्षित क्यों माना है। जब गलती होती है तो जिम्मेदारी किसकी होगी? डेवलपर की, डेटा वैज्ञानिक की, या संस्था की? यह अस्पष्टता नैतिक रूप से स्वीकार्य नहीं है। स्पष्ट जवाबदेही संरचना एआई सिस्टम का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।

निजता और निगरानी  - एआई के लिए डेटा ईंधन का काम करता है। लेकिन यह डेटा व्यक्तिगत, संवेदनशील और निजी होता है। लगातार डेटा संग्रह, चेहरे की पहचान, लोकेशन ट्रैकिंग और व्यवहार विश्लेषण नागरिक स्वतंत्रता को खतरे में डाल सकता है। और डेट अगर दूसरे देशों में जमा हो तो खतरा और भी बढ़ जाता है। नैतिकता कहती है कि किसी भी तकनीक को नागरिक की स्वतंत्रता और निजता का सम्मान करना चाहिए और इसलिए नैतिकता की अवश्यकता है। 

डीपफेक: सच्चाई का भ्रम - हाल के दिनों में, ‘डीपफेक’ तकनीक ने दुनिया भर में चिंता पैदा कर दी है। एआई का उपयोग करके किसी व्यक्ति का चेहरा या आवाज किसी और के शरीर या वीडियो पर इतनी सफाई से लगा दिया जाता है कि असली और नकली में फर्क करना नामुमकिन हो जाता है। भारत में हाल ही में कई मशहूर हस्तियों और राजनेताओं के डीपफेक वीडियो वायरल हुए, जिसने निजता और सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए। यह केवल तकनीकी समस्या नहीं है, यह एक ‘नैतिक अपराध’ है जो किसी की गरिमा को ठेस पहुँचाता है।

दुष्प्रचार - एआई टूल्स का इस्तेमाल करके आज सेकंड में हजारों फर्जी खबरें बनाई और फैलाई जा सकती हैं। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में, जहाँ चुनाव और जनमत बहुत मायने रखते हैं, वहां एआई द्वारा फैलाया गया दुष्प्रचार लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर सकता है।