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समरसता का संदेश देती अयोध्या

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समरसता का संदेश देती अयोध्या   

भारत अनगिनित विविधताओं यथा पंथ, संप्रदाय, वर्ग, जाति, भाषा, वेशभूषा वाला देश है। अनेकों विविधताओं के बावजूद समाज में निहित समरसता देश की शक्ति का न केवल वास्तविक स्रोत है, अपितु हमारी वैश्विक पहचान भी है। सामाजिक समरसता के ये धागे वास्तव में बड़े कोमल, नरम एवं संवेदनशील होते हैं। अपनी राजनैतिक स्वार्थ-पूर्ति के लिए लंबे समय से विदेशी आतताई और बाद में उन्हीं से प्रेरित एवं पोषित देश के कुछ नफरती तत्व एकता, बंधुता और समरसता के इन धागों को उलझाने एवं नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं। अतः भारत के मूल में समाहित सामाजिक समरसता को अक्षुण्ण रखने के लिए आवश्यक है कि समाज के सभी मत, पंथों, एवं वर्गों में एकता, सामंजस्यता, समानता एवं स्वर ऐक्य ध्वनित हो। दुनिया में व्यावहारिक सामाजिक समरसता का यदि कोई आदर्श हो सकता है तो वो हैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, जो भारतीयों के रोम-रोम की स्पंदन हैं। जिनका जीवन राम से है, जिनका जीवन राम का है, जिनके मन, वचन और कर्म में सिर्फ राम हैं।

श्रीराम का पूरा जीवन सामाजिक समरसता की शिक्षाओं से ओतप्रोत है। वनगमन कि अवधि में मल्लाह जाति के निषादराज को अपने मित्र का दर्जा देकर और वनवास के बाद पहली रात उन्हीं के यहां व्यतीत कर श्रीराम ने पूरे समाज को समरसता का संदेश दिया। रावण जैसे शक्तिशाली राजा के साथ युद्ध करने के लिए श्रीराम अयोध्या, मिथिला एवं अन्य राजाओं का सहयोग ले सकते थे, परंतु उन्होंने समाज के वंचित वनवासियों और आदिवासियों की शक्ति को पहचाना और उन्हीं के सहयोग से लंका विजय सिद्ध कर उनकी सामर्थ्य को समाज के सम्मुख प्रदर्शित एवं स्थापित किया। साथ ही यह संदेश दिया कि अनाचारी कितना ही शक्तिशाली क्यूं न हो, सामाजिक समरसता के सहारे ऐसे अनाचार, अत्याचार एवं शोषण से छुटकारा पाना संभव है। ऋषि-मुनियों द्वारा भील जाति कि मां शबरी को अछूत बताने पर श्रीराम उन्हीं से पूछते हैं कि इंसान को जन्म देने वाली स्त्री क्या अछूत हो सकती है? उन्होंने मां शबरी की कुटिया में पहुंच और फिर उनके झूठे बेर खाकर, प्रचलित छुआछूत को धता एवं अप्राकृतिक सिद्ध किया। इसी तरह माता अहिल्या का उद्धार कर, वनवासियों को अपने समान स्थापित कर, जटायु को सम्मान देकर सामाजिक समरसता को ही बढ़ावा दिया। आज कुछ लोगों द्वारा वनवासियों को ‘वंचित’, ‘अशिक्षित’, ‘असभ्य’, तो वनों को ‘अविकसित’ के रूप में परिभाषित किया जाता है। राम के समय सभी नागरिक एक समान थे, कुछ वनवासी थे, तो शेष नगरवासी। वे शिक्षा ग्रहण करने भी वन स्थित ऋषि-मुनियों के आश्रम गए। अपने जीवन के सबसे कष्टमय कालखंड में श्रीराम ने सहयोगी और सलाहकार वनवासियों को ही बनाया, जिनमें केवट निषाद, कोल, भील, किरात और भालू सम्मिलित रहे। वनवासियों, गिरिवासियों एवं आदिवासियों को श्रीराम ने ‘सखा’ कहकर संबोधित किया, तो वनवासी हनुमान को लक्ष्मण से अधिक प्रिय बताया। शायद राम इसलिए ही भगवान बन पाए, चूंकि उन्हें सर्वाधिक चिंता वंचितों, शोषितों, आदिवासियों, एवं तिरिस्कृतों की थी। उपरोक्त घटनाएं हमें यह सिखाती हैं कि भगवान श्रीराम के लिए केवल कर्म ही महत्व रखता है, मत, पंथ, जाति, वर्ग, समुदाय आदि सब निरर्थक हैं।

   बाईस जनवरी को पुरषोत्तम श्रीराम की जन्मस्थली श्रीअयोध्या में श्रीराममंदिर में भगवान श्रीराम की प्राण प्रतिष्ठा ने भारतीय समाज में व्याप्त समरसता को प्रदर्शित करने के साथ ही इसे और सुदृढ़ किया है। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से प्राण प्रतिष्ठा तक का कालखंड यह बोध कराता है कि समाज में इससे एकता, अखंडता एवं समरसता का प्रकटीकरण हुआ। उदाहरण के लिए, मंदिर निर्माण हेतु पहली ईंट ही 9 नवंबर 1989 को बिहार के दलित समुदाय के श्री कामेश्वर चौपाल द्वारा रखी गई। यहां तक कि एएसआई के तत्कालीन क्षेत्रीय निदेशक श्री के. के. मोहम्मद ने बार-बार दोहराया कि अयोध्या में राम मंदिर भारत में इस्लाम के आने से पहले से मौजूद था। उन्होंने पुरातात्विक खुदाई एवं शोध के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि बलात स्थापित बाबरी ढांचे के नीचे श्रीराम मंदिर के स्पष्ट साक्ष्य हैं। वास्तविकता के इस रहस्योदघाटन ने न्यायालय के फैसले में अहम भूमिका अदा की। स्वामी श्री रामभद्राचार्य जी, जोकि 2 महीने की उम्र से ही दृष्टिबाधित हैं, उन्होंने न्यायालय में अयोध्या में राम मंदिर होने के अथर्ववेद, स्कंदपुराण एवं वाल्मीकि रामायण जैसे स्रोतों से साक्ष्य एवं संदर्भ उपलब्ध कराकर वहां मूल रूप से राम मंदिर होने के अकाट्य सबूत उपलब्ध कराए। मंदिर निर्माण के संबंध में अंतिम फैसला सुनाने वाली उच्चतम न्यायालय की 5 सदस्यीय पीठ में न केवल बहुसंख्यक अपितु अल्पसंख्यक समुदाय के न्यायाधीश सैय्यद अब्दुल नजीर भी शामिल थे और पूरी पीठ ने अंतिम फैसला भी एकमत से ही सुनाया। समरसता की अपेक्षित भावना के अनुरूप इसे स्वीकार भी सम्पूर्ण समाज ने किया और वो भी हर्ष और उल्लास के साथ।

राम मंदिर निर्माण के लिए धन संग्रह हेतु चलाए गए निधि समर्पण अभियान में भी समरसता प्रतिबिंबित हुई। अभियान का आरंभ दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर से स्वामी कृष्ण विद्यार्थी जी महाराज द्वारा दस रुपये की समर्पण राशि से, लखनऊ में नगरपालिका में कार्यरत सफाई कर्मी नरेंद्र वाल्मीकि से तथा मुंबई में अंबेडकर बस्ती से हुआ। निधि समर्पण अभियान का समापन दिल्ली के रविदास मंदिर में संत रविदास जयंती के दिन ही कार्यक्रम आयोजित कर हुआ। इसके माध्यम से समाज में यह स्पष्ट संदेश गया कि श्रीराम मंदिर निर्माण में लगी प्रत्येक ईंट में समाज के उपेक्षित समझे जाने वाले समुदायों की भी बराबर की हिस्सेदारी है। मंदिर के लिए चयनित 24 पुजारियों में अनुसूचित जाति और 1 पिछड़ा वर्ग से हैं। इनका चयन भी मात्र योग्यता के आधार पर ही हुआ है न कि जाति आदि पर। अतः श्री राम मंदिर निर्माण ने स्वामी रामानंद जी की, ”जाति-पाति पूछे न कोई, हरि का भजे सो हरि का होई“ कहावत को वास्तविकता में चरितार्थ किया है।

राम नगरी अयोध्या में भव्य, दिव्य भगवान श्रीराम का राष्ट्र-मंदिर दुनिया भर में रह रहे आस्थावान भारतीयों के लिए बड़ी खुशखबरी है। भारत में ही नहीं, अपितु श्रीलंका, इंडोनेशिया, मॉरीशस, थाइलैंड, नेपाल आदि देशों के राम भक्तों को अयोध्या में भगवान राम के प्रतिष्ठित होने का इंतजार था। 22 जनवरी को इन देशों में भी उत्सव मनाए गए और अनेक विदेशी एवं विदेशों में बसे भारतीय अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के साक्षी बने। श्रीलंका की रामायण टीम का नेतृत्व कर रहीं डॉ. उशांति थुरैसिंगम इस अवसर पर अयोध्या में अपनी मौजूदगी को गर्व और सौभाग्य का विषय मानती हैं, श्रीलंका के ही आई सजीतभगवान राम की तरह एक आदर्श पुत्र, पति और भाई होना चाहते हैं। थाईलैंड की रामायण टीम का समन्वय कर रही किट्टीपोरन छैबून  थाईलैंड से सोशल मीडिया व फोन पर लोगों की खुश करने वाली प्रतिक्रियाओं से अभिभूत थीं। जहां थाईलैंड के कलाकारों ने इस अवसर पर रामायण प्रस्तुति दी। मॉरीशस के कलाकारों ने राम कीर्तन एवं भजन प्रस्तुत किये। थाईलैंड में सात सालों से रामलीला में राम का किरदार निभाने वाले जिरत वीजीट्रजिट्लर्सके परिवर को नाज है कि वह राम जैसे आदर्श की भूमिका निभा रहा है। श्रीलंका में रावण का किरदार निभाने वाले अनुजाआनंदभी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर भारत आकार खुश और गौरवान्वित हैं। कार्यक्रम में राष्ट्र एवं समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों यथा  45 आर्थिक विशेषज्ञ, 48 राजनीतिक दलों से, 15 राम जन्मभूमि ट्रस्ट से, 92 अनिवासी भारतीय, 400 श्रमिक, 50 कारसेवकों के परिवारजन तथा 4000 साधु-महात्माओं ने भाग लिया। साथ ही 258 वकील अथवा कानून के जानकार, 30 वैज्ञानिक, 44 रक्षा विशेषज्ञ, 159 कलाकार, 50 शिक्षाविद, 16 साहित्यकार, 93 खिलाड़ी, 7 डॉक्टर, 30 प्रशासनिक अधिकारी, 164 मीडिया कर्मी, 5 पुरातत्ववेत्ता, तथा 800 उद्योगपति इसके साक्षी बने। अयोध्या में हुई राम-मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा ने भारत में सामाजिक समरसता को प्रतिबिंबित करने के साथ ही इसे और भी सुदृढ़ करने कि नीव रखी है।