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मकर संक्रांति के विविध रूप

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मकर संक्रांति के विविध रूप 

मकर संक्रांति एक महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन राशि चक्र में बदलाव होता है। गतिशीलता की यह आहट पृथ्वी पर हमें महसूस भी होती है। क्योंकि हमारी संस्कृति हर उस चीज का आभार दर्शाती है जिससे हमारे जीवन में बदलाव आता है। चाहे कृषि हो या ब्रह्मांड की सौर गतिविधियां। इन सबका आभार दर्शाने का दूसरा नाम ही सूर्य पर्व मकर संक्रांति है।

हमारी उत्सवधर्मी संस्कृति में पर्व या त्यौहार का विशेष स्थान है। वर्ष के हर महीने में कोई न कोई उत्सव आमजन को लोक कथाओं से संबद्ध कर उन्हें देश की सभ्यताओं और संस्कृति से परिचय कराता है। इसी क्रम में कुछ उत्सव किसी अंचल में मनाए जाते हैं, वहीं कुछ देश भर में।  भले ही नाम अलग-अलग हों, लेकिन देवी देवताओं की पूजा करना, परिवार के साथ सामाजिक समारोहों में जाना, मेलों में खरीदारी करना और दान देना, भण्डारे करना, भ्रमण, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना और पर्यटन उसी के हिस्से हैं।

दीपावली और छठ के बाद सबसे महत्वपूर्ण पर्व के रूप में मकर संक्रांति का स्थान सर्वाेपरि है। हर साल हम सभी 14 या 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाते हैं। देशभर के हर हिस्से में अलग-अगल नाम और रूप में मनाया जाने वाला यह त्यौहार भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि का सनातन काल से साक्षी रहा है। यह पर्व उत्तर भारत में मकर संक्रांति, तमिलनाडु में पोंगल, कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश में केवल संक्रांति, असम में माघ बिहू और भोगल बिहू और पंजाब व हरियाणा में लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। यह एकमात्र भारतीय त्यौहार है जो सौर कैलेंडर के एक निश्चित तिथि पर मनाया जाता है। जबकि अन्य सभी भारतीय पर्व चंद्र कैलेंडर के अनुसार मनाए जाते हैं। इस दिन गंगा सागर में स्नान का विषेश महत्व है तभी तो कहा जाता है - ‘‘सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार।’’ मकर संक्राति को गंगा सागर (बंगाल की खाड़ी) में विलीन होने से पहले, गंगा जी में पवित्र डुबकी लगाने के लिए तीर्थयात्री देश विदेश से गंगासागर पहुंचते हैं। यहां 8 जनवरी से 16 जनवरी को लगने वाले मेले को गंगा सागर मेला कहते हैं। लेकिन डुबकी मकर संक्रांति को ही लगाई जाती है। उत्तरी भारत में इस दिन खिचड़ी खाना भी पर्व का अनन्य हिसा है। इस दिन गंगा, यमुना, सरयू और नर्मदा व अन्य पावन नदियों में स्नान करने से कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। कई शहरो में पतंगबाजी इस पर्व का एक अन्य पहलू है। जैसे अमृतसर में छोटी पतंग को गुड्डी कहते हैं और बड़ी पतंग को गुड्डा कहते हैं। यहां लोहड़ी को पतंगबाजी देखने लायक होती है। आसमान गुड्डे, गुड़ियों से भर जाता है। लोहड़ी में शाम को (13 जनवरी, पंजाब और उत्तर भारत का फसल उत्सव) आग जलाई जाती है। लोहड़ी की रात को सरसों का साग और गन्ने के रस की खीर घर में जरूर बनती है, जिसे अगले दिन मकर सक्रांति को खाया जाता है। इसके लिए कहते हैं ‘पोह रिद्दी, माघ खादी’ (पोष के महीने में बनाई और माघ के महीने में खाई) बाकि जो कुछ मरजी़ बनाओ,  खाओ। आग जला कर अग्नि देवता को तिल, चौली (चावल) गुड़ अर्पित करते हैं। परात में मूंगफली, रेवड़ी और भुने मक्का के दाने, चिड़वा लेकर परिवार सहित अग्नि के चक्कर लगा कर थोड़ा अग्नि को अर्पित कर, प्रसाद खाते और बांटतें हैं। कड़ाके की सर्दी में आग के पास ढोलक पर उत्सव के अवसरों पर गाये जाने वाले अलिखित और अज्ञात रचनाकारों द्वारा रचित अनेकानेक लोकगीत सुनने को मिलते हैं। ये गीत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक परांपरा से सुरक्षित हैं। अगले दिन मकर संक्राति को आस पास के नदी सरोवर में स्नान करके, खिचड़ी और तिल का दान करते हैं और खिचड़ी और तिल के लड्डू खाये जाते हैं। स्वाद से खाते हुए बुर्जुग कवित्त बोलते हैं ‘खिचड़ी तेरे चार यार  घी, पापड़, दही, अचार।’

त्यौहार मनाने का तरीका पूरे देश में अलग-अलग रूप में होते हुए भी भाव एक ही रहता है। इसी क्रम में पूर्वाेत्तर भारत में भोगाली बिहू मनाते हैं। यह मकर संक्रांति का उत्सव, माघ बिहू एक सप्ताह तक मनाया जाता है। मकर संक्रांति की पूर्व संध्या को लकड़ी बांस, फूस आदि से मेजी बनाई जाती है। वहां पारंपरिक भोज बनाये और खाए जाते हैं। मकर संक्रांति को सुबह मेजी की प्रदक्षिणा करके उसमें आग लगा दी जाती है। एक दूसरे को गमुछा (गमछा) भेंट करके प्रणाम करते हैं। चिड़वा, दहीं, गुड़ खाया जाता है। हुरुम (परमल), नारियल, तिल के लड्डू बनाते हैं। इस दौरान तिल नारियल का पीठा जरूर बनता है। भोगाली बिहू यानी माघ बिहू में अलाव जलाने और भोज खाने और खिलाने की परंपरा है। 

नवान्न और संपन्नता लाने का त्यौहार पोंगल का इतिहास कम से कम 1000 वर्ष पुराना है। दक्षिण भारतीय, देश-विदेश में जहां भी रहते हैं, पोंगल उत्साह से मनाते हैं। इस त्यौहार का नाम पोंगल इसलिए है क्योंकि सूर्यदेव को जो प्रसाद अर्पित करते हैं वह पगल कहलाता है। तमिल भाषा में पोंगल का एक अर्थ है, अच्छी तरह उबालना। चार दिनों तक चलने वाले पोंगल में वर्षा, धूप, खेतिहर मवेशियों की आराधना की जाती है। जनवरी में चलने वाले पहला पोंगल (15 जनवरी) को भोगी पोंगल कहते हैं, जो देवराज इन्द्र को समर्पित है। शाम को अपने घरों का पुराना कूड़ा, कपड़े लाकर आग लगा कर, उसके इर्द गिर्द युवा भोगी कोट्टम (एक प्रकार का ढोल) जिसे भैंस के सींग से बजाते हैं।

दूसरा पोंगल सूर्य देवता को निवेदित सूर्य पोंगल है। मिट्टी के बर्तन में नये धान, मूंग की दाल और गुड़ से बनी खीर और गन्ने के साथ, सूर्य देव की पूजा की जाती है। तीसरा मट्टू पोंगल तमिल मान्यताओं के अनुसार माट्टु भगवान शंकर का बैल हैं जिसे उन्होंने पृथ्वी पर हमारे लिए अन्न पैदा करने को भेजा है। इस दिन बैल, गाय और बछड़ों को सजा कर उनकी पूजा की जाती है। कहीं-कहीं इसे कनु पोंगल भी कहते हैं। बहने भाइयों की खुशहाली के लिए पूजा करतीं हैं। भाई उन्हें उपहार देते हैं। 

चौथे दिन कानुम पोंगल मनाया जाता है। इस दिन दरवाजे पर तोरण बनाए जाते हैं। महिलाएं मुख्यद्वार पर रंगोली बनाती हैं। नये कपड़े पहनते हैं। रात को सामुदायिक भोज होता है। तमिल साहित्य के अनुसार श्री राम ने मकर संक्राति को पतंग उड़ाई थी और उनकी पतंग इन्द्रलोक में चली गई। अब सागर तट पर लोग पतंग उड़ाते हैं। तमिलनाडु से जुड़े होने से यही दिन आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक और केरल में संक्रांति के नाम से मनाया जाता है। 

केरल में राजा राजशेखर ने अयप्पा को देव अवतार मान कर सबरीमलई में देवताओं के वास्तुकार विश्वकर्मा से डिजाइन करवा कर अयप्पा का मंदिर बनवाया। ऋषि परशुराम ने उनकी मूर्ति की रचना की और मकर संक्रांति को स्थापित की। आज भी यह प्रथा है कि हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर पंडालम राजमहल से अयप्पा के आभूषणों को संदूक में रख कर, एक भव्य शोभा यात्रा निकाली जाती है। जो 90 किलोमीटर तीन दिन में सबरीमाला पहुंचती है। इस प्रकार मकर संक्रांति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक हमें अलग अलग रूपों में दिखाई देती है। जिसमें प्रकृति के साथ अन्य जीवों और सौर परिवर्तन की भी संबद्धता है।