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इतिहास

सोमनाथ से लेकर मथुरा तक विध्वंस, लुटेरे महमूद गजनवी की वह सच्चाई जो किताबों में दबा दी गई

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997 ईस्वी में सबुक्तिगिन की मृत्यु के बाद महमूद ने सत्ता पाने के लिए अपने ही भाई इस्माइल को युद्ध में हराकर गजनी की गद्दी पर कब्जा कर लिया, सत्ता में आते ही उसने अपने विस्तार और लूट की नीति अपनाई। उसने भारत को केवल लूट और विनाश का क्षेत्र माना और 1030 ईस्वी तक बार-बार भारत पर हमले किए। वहीं इतिहासकारों के अनुसार उसने 17 बार भारतीय राजाओं से युद्ध किया।

भारत पर उसके हमलों से विशेष रूप से पंजाब क्षेत्र में भारी तबाही हुई और वहां जबरन बाहरी शासन का प्रभाव बढ़ा। उसका पहला बड़ा आक्रमण जयपाल के विरुद्ध था। पेशावर के पास हुए युद्ध में भारी नरसंहार हुआ। जयपाल को बन्दी बनाया गया और अपमानजनक शर्तों पर रिहा किया गया, जिससे आहत होकर जयपाल ने आत्मदाह कर लिया।

महमूद ने इसके बाद भी हमले जारी रखे और आनंदपाल और उसके उत्तराधिकारियों ने उसका विरोध किया महमूद ने नगरकोट, भटिंडा और थानेश्वर जैसे नगरों में भारी लूटपाट और नरसंहार किया। जो इस्लाम स्वीकार नहीं करता था, उसे मार दिया जाता था। मंदिरों को तोड़ा गया और संपत्ति लूटी गई। थानेश्वर, मथुरा और कन्नौज जैसे समृद्ध नगरों को उसने बुरी तरह नष्ट कर दिया। उसका सबसे क्रूर और विध्वंसक आक्रमण सोमनाथ मंदिर पर हुआ। 1026 ईस्वी में उसने मन्दिर पर हमला कर हजारों रक्षकों की हत्या करवाई, मंदिर को जला दिया और मंदिर को तोड़कर अपमानित कर नष्ट किया

महमूद का पूरा अभियान लूट, हिंसा और जबरन मंतातरण पर आधारित था। भारत पर उसके हमलों से अपार जनहानि हुई और अनेक प्राचीन नगर और धार्मिक स्थल नष्ट हो गए। अंत में महमूद को एक हिन्दू राजा परम देव का खतरा था। महमूद काठियावाड में फंस गया था। एक तरफ राजा परम देव थे तो दूसरी तरफ समुद्र। हालाँकि, जैसे-तैसे महमूद 2 अप्रैल 1926 को गजनी पहुँच गया और उसके बाद उसने भारत के खिलाफ अपने लूटपाट के अभियान रोक दिए।