स्वाधीनता के बाद भारत केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानसिक रूप से भी स्वयं को पुनः खोज रहा था। सदियों की गुलामी के बाद देश के भीतर एक स्वाभाविक आकांक्षा जन्म ले रही थी अपनी सभ्यता, अपने प्रतीकों और अपने गौरव को फिर से स्थापित करने की। सोमनाथ मन्दिर का पुनरुत्थान इसी सांस्कृतिक जागरण का सबसे सशक्त और भावनात्मक प्रतीक बनकर उभरा। किंतु जिस घटना ने जनमानस में गर्व और आत्मविश्वास का संचार किया, वही घटना भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के भीतर गहरी बेचैनी का कारण बन गई।
सोमनाथ केवल एक
मन्दिर नहीं। वह उस ऐतिहासिक स्मृति का नाम, जिसे मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा बार-बार आघात
पहुँचाया गया, लेकिन जिसे मिटाया नहीं जा सका। स्वाधीन भारत में जब उसके
पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई, तो इसे व्यापक रूप से राष्ट्रीय
पुनरुत्थान के रूप में देखा गया। के.एम. मुंशी जैसे नेताओं के लिए यह कार्य
राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक था—एक ऐसा प्रयास, जो टूटी हुई ऐतिहासिक चेतना को जोड़ने
वाला था। जनसामान्य के लिए सोमनाथ का उठ खड़ा होना यह संकेत था कि भारत अब अपने
अतीत को संकोच नहीं, सम्मान के साथ देख रहा है।
सांस्कृतिक जागरण से
असहजता?
यही सांस्कृतिक जागरण
नेहरू को असहज कर रहा था। उनके लिए प्रश्न यह नहीं था कि मन्दिर बने या नहीं, बल्कि
यह था कि इस पुनरुत्थान की दिशा और स्वर क्या होगा। नेहरू को दूसरे मतों और देशों
के प्रतिनिधियों की प्रतिक्रियाओं की अधिक चिंता सता रही थी। उन्हें आशंका थी कि
सोमनाथ का भव्य पुनःपूजन एक धार्मिक आयोजन से आगे बढ़कर राजनीतिक और वैचारिक
प्रतीक न बन जाए, जिससे उन्हें नुकसान की चिंता सता रही थी। उनकी चिंता जनता की
आस्था से नहीं, बल्कि राज्य की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय संदेश से जुड़ी थी।
नेहरू की बैचेनी तब
खुलकर सामने आई जब उन्हें बीजिंग स्थित भारतीय राजदूत से सूचना मिली कि सोमनाथ
मंदिर के ट्रस्टियों ने दूतावास को पत्र लिखकर चीन की प्रमुख नदियों—ह्वांग हो, यांग्त्से
और पर्ल—का जल तथा तियान शान पर्वत की कुछ टहनियाँ भेजने का अनुरोध किया है, ताकि
उन्हें पूजन में प्रयोग किया जा सके।
नेहरू के लिए यह अत्यंत चिंताजनक था। उन्हें लगा कि इससे विदेशों में यह संदेश जाएगा कि भारतीय राज्य धार्मिक अनुष्ठानों में सक्रिय रूप से सम्मिलित है। जो उनके मुस्लिम और अंग्रेजी साथियों को बुरी लग सकती थी। उनकी इन चिंताओं का उल्लेख उस समय उनके द्वारा लिखे गए पत्रों में भी मिलती है।
केएम मुँशी जी को लिखे पत्र में नेहरू जी अपना भय और संकोच स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं। उन्होंने 17 अप्रैल 1951 में लिखे पत्र में उल्लेख किया कि यदि यह किसी निजी व्यक्ति की पहल होती, तो भी बात अलग होती, लेकिन जब सरकारी पदों से जुड़े लोग और राष्ट्रपति का नाम जुड़ जाए, तो स्थिति गंभीर हो जाती है।
जन आस्था के उत्सव से कैसे परेशानी?
जब
उन्हें यह पता चला कि सौराष्ट्र सरकार ने सोमनाथ स्थापना समारोह के लिए पाँच लाख
रुपये स्वीकृत किए हैं, तो उन्होंने इसे अनुचित
बताया। लेकिन जमीनी सच्चाई यह थी कि सोमनाथ का पुनरुत्थान जनता के भीतर गहरे स्तर
पर गूँज रहा था। यह पुनरुत्थान केवल मन्दिर निर्माण नहीं था, बल्कि एक मानसिक मुक्ति का उत्सव था। लंबे समय तक दबे
हुए सांस्कृतिक आत्मविश्वास को यह नया स्वर दे रहा था। यही कारण था कि यह आयोजन स्वतः ही राजनीतिक रूप
में जाना गया—चाहे नेहरू इसे स्वीकार करें या नहीं। संसद में सवाल उठे, विदेशी मीडिया ने ध्यान दिया और पड़ोसी देशों में भी
इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हुई।
संसद से लेकर विदेशों
तक नेहरू की सफाई!
राष्ट्रपति डॉ.
राजेंद्र प्रसाद का समारोह में सम्मिलित होना इस सांस्कृतिक जागरण को और वैधता
देता प्रतीत हुआ। नेहरू को आशंका थी कि इससे सरकार की आधिकारिक भागीदारी का संदेश
जाएगा, लेकिन
वे राष्ट्रपति की व्यक्तिगत आस्था में हस्तक्षेप भी नहीं करना चाहते थे। यही नेहरू
की सबसे बड़ी दुविधा थी—जनभावनाओं के विरुद्ध जाए बिना, राज्य को धार्मिक प्रतीकों से कैसे अलग
रखा जाए।
नेहरू ने बार-बार स्पष्ट किया कि भारत सरकार का सोमनाथ समारोह से कोई लेना-देना नहीं है और जो लोग इसमें शामिल हैं, वे निजी तौर पर कार्य कर रहे हैं। किंतु व्यवहार में यह विभाजन अस्पष्ट हो गया था। जाम साहेब अर्थात् दिग्विजय सिंह जी एक ओर सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष थे और दूसरी ओर सौराष्ट्र के राज प्रमुख। इन दोनों भूमिकाओं का मेल विदेशी जगत में भ्रम पैदा कर रहा था।
एक मन्दिर, एक
राष्ट्र
नेहरू के बार-बार
नाराजगी भरे पत्रों के बावजूद सोमनाथ मन्दिर का भव्य पुनःपूजन हुआ और वह भारतीय
सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का ऐतिहासिक क्षण बन गया। नेहरू की बेचैनी भी
इतिहास का हिस्सा बन गई—एक ऐसे नेता की बेचैनी, जो भारत को अतीत के गौरव से नहीं, बल्कि
भविष्य की आधुनिकता से पहचान दिलाना चाहते थे।
सोमनाथ का पुनरुत्थान
यह दिखाता है कि स्वाधीन भारत की आत्मा केवल संविधान की धाराओं में नहीं, बल्कि
उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों में भी बसती है। और नेहरू की बेचैनी यह याद दिलाती है
कि इस सांस्कृतिक उभार के साथ चलने वाली वैचारिक बहसें भी उतनी ही वास्तविक और
महत्वपूर्ण थीं।




