अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड
अल्मोड़ा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी समारोह के अवसर पर प्रमुख जन संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें संघ की 100 वर्षों की यात्रा और विचारों पर मंथन हुआ। अल्मोड़ा में आयोजित कार्यक्रम में सह क्षेत्र प्रचार प्रमुख तपन जी ने कहा कि जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा, तो यह केवल राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि एक बड़ी ऐतिहासिक घटना थी। यह समय केवल सत्ता बदलने का नहीं, बल्कि सोच और संस्कृति के बदलाव का भी था। उन्होंने कहा कि भारत की आजादी के साथ “colonization of mind” यानी मानसिक गुलामी खत्म होने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके साथ ही अपनी संस्कृति और परंपराओं की ओर लौटने का काम भी शुरू हुआ।
तपन जी ने बताया कि यह विचार नया नहीं था। इससे बहुत पहले डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने एक स्वाभिमानी भारत का सपना देखा था। उन्होंने कहा कि संघ के शुरुआती कार्यकर्ताओं के पास संसाधन नहीं थे, लेकिन कठिन मेहनत और समर्पण से काम किया। बाद में माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) ने देशभर में भ्रमण कर लोगों को देश के विभाजन के खतरे के बारे में बताया।
1947 में जब विभाजन हुआ, तो बहुत लोग प्रभावित हुए। उस समय संघ के स्वयंसेवकों को लोगों की मदद के लिए आगे आने को कहा गया और उन्होंने अंतिम व्यक्ति तक सहायता पहुंचाने का प्रयास किया। आगे तपन जी ने कहा कि संघ की बढ़ती लोकप्रियता से कुछ राजनीतिक दल असहज हुए और गांधी जी की हत्या का आरोप संघ पर लगाया गया।
उन्होंने बताया कि संघ ने केवल संगठन ही नहीं बनाया, बल्कि समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने के लिए कई संगठनों की स्थापना की, जैसे- अधिवक्ता परिषद, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय मजदूर संघ और भारतीय किसान संघ। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय भारतीय मजदूर संघ ने “देश के हित में करेंगे काम, काम का लेंगे पूरा दाम” का नारा दिया।
उन्होंने कहा कि संघ केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि कर्तव्यों की भी बात करता है। राम जन्मभूमि आंदोलन को उन्होंने समाज के जागरण से जोड़ा। तपन जी ने कहा कि भारत में क्षमता है कि वह विश्व को दिशा दिखा सकता है, इसके लिए जरूरी है कि समाज अपनी पहचान, संस्कार और स्वाभिमान को समझे। कार्यक्रम में कई प्रमुख लोग और संघ के कार्यकर्ता मौजूद रहे। अंत में तपन जी ने लोगों के सवालों के जवाब दिए और कार्यक्रम का समापन वंदे मातरम् के साथ हुआ।



