हम बदलेंगे तो समाज बदलेगा
आज के बदलते भौतिकतावादी परिवेश में हमारा समाज तेजी से बदल रहा है-डिजिटल प्रगति, आर्थिक अवसर और युवा ऊर्जा के साथ एक नया भारत लगातार आकार ले रहा है। लेकिन इसी विकास के शोर में एक खतरनाक अदृश्य जहर भी हमारे संवाद और संस्कृति में फैल रहा वह है। गाली गलौज की बढ़ती प्रवृत्ति। आज के युवाओं में इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करना ‘कूल’ ‘रियलिस्टिक’ या इंटरटेनमेंट का हिस्सा मान लिया गया है। लेकिन सत्य तो यह है कि यह आदत सिर्फ भाषायी मर्यादा की नहीं बल्कि मानसिक अस्थिरता और भावनात्मक कमजोरी का संकेत है।
मनौवैज्ञानिकों की मानें तो लगातार गाली देना या अपने संवाद में इसे प्रमुखता से शामिल करना इमपल्सिव कंट्रोल की कमी, गुस्से की असंतुलित प्रतिक्रिया और गहरे तनाव का प्रतिबिंब है। बीबीसी के एक अध्ययन के अनुसार हर तीसरा युवा प्रतिदिन 10-15 एब्युसिव शब्द का प्रयोग करता है। भारत के आंकड़े भी चिंताजनक हैं जहां एक सर्वे के अनुसार 55 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया है कि वे ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। वहीं राजधानी दिल्ली में 80 प्रतिशत लोग हैं। एनसीआरबी के अनुसार 31 प्रतिशत घरेलू हिंसा मामलों में गाली मुख्य कारण है। स्कूलों में 62 प्रतिशत बुलिंग से संबंधित समस्यायें आती हैं। इससे यह तो स्पष्ट है कि हमारे शब्द सिर्फ बोलचाल का हिस्सा नहीं बल्कि समाज के स्वास्थ्य मनोवृत्ति और संस्कृति को प्रभावित कर रहे हैं।
कई बार हम देखते हैं कि थोड़ी सी कहा सुनी देखते ही देखते गालियों की बौछार से शुरू हो जाती है। यह केवल दो व्यक्तियों का झगड़ा नहीं बल्कि हमारे समाज की भाषा, मानसिक स्थिति व भावनात्मक अस्थिरता का जीवंत चित्रण होता है। यह दिखाता है कि हमारे शब्दों की कठोरता दूसरे के मन में कितनी चोट पहुंचाती है। NIMHANS की एक रिपोर्ट के अनुसार इस प्रकार के वातावरण में पलने वाले बच्चों में व्यावहारिक विचार या मानसिक स्थिति से संबंधित खतरा 40 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। जिससे बच्चों में अस्थिरता व्याप्त होती है। जो उनके भावनात्मक नियंत्रण व सामाजिक संबंधों में बाधा डालते हैं।
इस पूरे संदर्भ में एक बिन्दु पर विशेष रूप से आकर्षित करना चाहूंगी जो गहरी चिंता का विषय है। वह है OTT प्लेटफॉर्म की अपनी जिम्मेदारी से विमुख होना। आज ‘realism’ के नाम पर हिंसक भाषा, असहिष्णुता को ‘मॉर्डन’ व ‘कूल’ लिखावट का मानक बना दिया गया है। जो सिर्फ और सिर्फ समाज के मन मस्तिष्क को दूषित करने का कार्य कर रहा है। जब कोई समाज भाषाई मर्यादा का पालन नहीं करता तो यह न केवल नैतिक और चारित्रिक क्षरण का संकेत है अपितु मानसिक दिवालियापन की भी स्पष्ट अभिव्यक्ति बन जाता है। दुर्भाग्यवश समकालीन सिनेमा और OTT प्लेटफॉर्म इस प्रवृत्ति को वास्तविकता और मनोरंजन के नाम पर वैधता प्रदान कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप सांस्कृतिक अवनति सामान्यीकृत होती जा रही है। क्रिएटिव फ्रीडम समाज को चोट पहंचाने की स्वतंत्रता तो बिल्कुल भी नहीं है। कला समाज का दर्पण है तो यह दर्पण सच्चाई दिखाये न कि गंदगी बढ़ाए। भले ही भारत भौतिक प्रगति के अनेक सोपान तेजी से पार कर रहा हो किन्तु जब तक सांस्कृतिक और मानसिक परिष्कार समानांतर रूप से विकसित नहीं होंगे, तब तक ‘विश्वगुरु’ बनने की राह अधूरी रहेगी।
सांस्कृतिक उन्नति का आधार हमारी जड़ों से जुड़ाव में निहित है। वे परंपराएं, मूल्य और सामाजिक रूढ़ियां जो शताब्दियों से हमारे सामूहिक अस्तित्व को स्थिरता और दिशा देती आई हैं। इन जड़ों से विच्छेद केवल सांस्कृतिक रिक्तता ही उत्पन्न नहीं करता, बल्कि विकास की संपूर्ण संरचना को भी खोखला कर देता है। इसलिए आर्थिक ताने-बाने की दृढ़ता व स्थिरता के साथ सामाजिक ताना-बाना भी मजबूत होना चाहिए जो अपनी नींव को संचित करता रहे। सामाजिक परिवर्तन तभी संभव है जब वह सांस्कृतिक चेतना और मानसिक अनुशासन से संचालित हो। इसके लिए समाधान तब निकलेगा जब हम स्वयं व्यक्तिगत स्तर पर परिवार के स्तर पर अपनी भाषायी मर्यादा का निर्वहन करें। हम अपने शब्दों को संयम, सम्मान और विवेक के साथ प्रयोग करें क्योंकि भाषा सिर्फ दूसरों को नहीं स्वयं (स्व) को भी आकार देती है। परिवार में शालीन भाषा का वातावरण तैयार कर सामाजिक समरसता की सबसे पहली प्रभावी शुरूआत करें। क्योंकि बच्चे अपने माता-पिता की भाषा से संस्कार ग्रहण करते हैं। हर व्यक्ति को यह समझना होगा कि उसकी भाषा सिर्फ एक आवाज नहीं - एक संस्कृति है, एक संदेश है, एक ऊर्जा है जो आगे बढ़कर समाज की दिशा तय करती है। अंततः, समाज में सकारात्मक परिवर्तन का बीजारोपण व्यक्ति के भीतर ही होता है और वही इसे पुनर्स्थापित करता है कि - यदि हम स्वयं बदलेंगे तभी समाज बदलेगा।
लेखिका शम्भु दयाल पी जी कॉलेज, गाजियाबाद में एसोसिएट प्रोफेसर (अर्थशास्त्र) है।




