साहित्य में होने वाला पठन-पाठन एवं लेखन से भारतीय समाज का नवोत्थान
साहित्य के विषय में प्रचलित उक्ति है- ‘सहितस्य भावः साहित्यम्’। साहित्य में सभी के लिए हितैषिता की भावना होती है। साहित्य सबको अपने भीतर समाहित कर लेना चाहता है; क्योंकि वह सबको जोड़नेवाला होता है। आचार्य निशांतकेतु कहते हैं - ‘साहित्यकार एक प्रजापति होता है, वह स्रष्टा की तरह रोज नई-नई सृष्टि करता है और करना चाहता है। उसमें ऐसी बृंहणशीलता होती है, जो और अधिक, और अधिक आकाश को घेरना चाहती है। इसलिए वह अधिकतर से अधिकतम की यात्रा है।’
इसलिए साहित्यकार जब अपनी कृतियों की रचना करता है, तब समाज का नव उत्थान होता है। उसके लेखन से संपूर्ण समाज प्रभावित भी होता है और प्रकाशित भी। जब साहित्यिक रचनाएँ पठन-पाठन की प्रक्रिया से होकर गुजरती हैं, तब मनुष्य की प्रज्ञा, संवेदना एवं समझ का विकास होता है। ध्यातव्य है कि पठन-पाठन का अर्थ मात्र अक्षरबोध से परिचय प्राप्त करना नहीं होता है, अपितु इसका विस्तृत अर्थ जीवन के विविध पक्षों की समझ एवं अनुभूति से जुड़ा है। यही व्यक्तिगत अनुभूति ‘जगत् हिताय’ के पथ को आलोकित करती है। प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय लिखते हैं - ‘वेदना में एक शक्ति है, जो दृष्टि देती है। जो यातना में है, वह दृष्टा हो सकता है।’
साहित्यिक लेखन एवं पठन-पाठन समाज को न सिर्फ समतामूलक बनाना चाहता है, अपितु वह समावेशिता के नए-नए मापदंडों को निर्धारित करते हुए सबको साथ लेकर चलने की प्रेरणा देता है।
साहित्यिक कृतियों का पाठक बालक भी हो सकता है, एक युवा भी और एक वृद्धजन भी। ‘मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है’ जैसी कविता बालकों में सहानुभूति की भावना का संचार करती है तो ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ धरती हिन्दुस्तान की’ जैसी कविताएँ उन्हें इस देश की धरती के लिए किए गए बलिदानों का स्मरण कराकर देशप्रेम के कर्त्तव्यबोध को रेखांकित करती हैं। युवाओं के लिए जयशंकर प्रसाद अपने राष्ट्र-कर्त्तव्यों के प्रति समर्पण हेतु आह्वान करते हैं-
‘हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।’
साहित्यिक पठन-पाठन भाषिक संस्कारों को समृद्ध करता है। कहा गया है -‘तस्मात् सतामत्र न दूषितानि, मतानि तान्येव तु शोधितानि।’ - साहित्यकार एवं लेखक तो पूर्ववर्ती विचारों का शोधन करते हुए परंपरा को आगे बढ़ाता है।
ध्यातव्य है कि भाषा पठन-पाठन का मूल आधार है। साहित्यिक लेखन भाषा को परिष्कृत करते हुए उसे समृद्ध भी बनाता है। इतना ही नहीं, भाषा की मधुरता से यह समाज का साक्षात्कार करानेवाला भी होता है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त एवं हरिवंश राय बच्चन इसके सुंदर उदाहरण हैं। स्मरणीय है कि साहित्य न सिर्फ भाषा की मधुरता से परिचय कराता है, अपितु वह शोषण के विरुद्ध प्रतिकार करते हुए जयघोष करना भी सिखाता है। माखनलाल चतुर्वेदी की भाषा इसका उदाहरण है। सामाजिक नवोत्थान में भाषा विशिष्ट भूमिका अदा करती है। यह अकारण नहीं है कि संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त निकाय के रूप में साहित्य अकादेमी, जो 24 भाषाओं में भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य करती है, वह न केवल मान्यता प्राप्त भाषाओं अपितु भारत की गैर-मान्यता प्राप्त और जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के प्रोत्साहन का भी उचित प्रयास कर रही है।
इसके अलावा हाल ही में 2 दिसंबर, 2025 को प्रारंभ किए गए ‘काशी तमिल संगमम् 4.0’ में तमिल भाषा सीखने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इसके अंतर्गत प्रमुख आयोजनों में तमिल करकलाम (आओ, तमिल सीखें), तमिल करपोम (काशी क्षेत्र के 300 छात्रों के लिए तमिल सीखने की अध्ययन-यात्रा) एवं ऋषि अगस्त्य वाहन अभियान (तेनकासी से काशी तक सभ्यतागत मार्ग की जानकारी) शामिल हैं।
साहित्य भाषा को जीवन से और जीवन को भाषा से जोड़ देता है। इसके कारण पठन-पाठन न सिर्फ स्वाभाविक और सरल बनता है, अपितु वह अनुभूति का विषय भी बन जाता है।
साहित्यिक लेखन मनोरंजन भी करता है, लेकिन विस्तृत रूप में यह जीवन-मूल्यों की शिक्षा देता है। निष्ठा, ईमानदारी, कृतज्ञता जैसे सद्गुणों को आत्मसात् करने की बात सिखाता है तो एक मेहनतकश की तरह जीवन जीने की कला का विकास भी करता है। यह त्याग, समर्पण एवं मर्यादा को रेखांकित करता है।
साहित्य अपने अक्षय भंडारों में संचित रत्नों को कभी विस्मृत नहीं करता। वह लेखन के माध्यम से उसपर प्रकाश डालते रहता है। उदाहरण के लिए श्रीराम का चरित्र। ‘हिंदुस्तान’ समाचार-पत्र के अनुसार, गत वर्ष जनवरी में गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘श्रीरामचरितमानस’ की डेढ़ लाख प्रतियों की मांँग हुई; जबकि अक्टूबर से दिसंबर के दौरान ‘श्रीरामचरितमानस’ की 3.27 लाख प्रतियांँ प्रकाशित होते ही बिक गई थीं।
भिवानी के कवि-लेखक डॉ. रमाकांत शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘रामचरितमानस में संबंध-संस्कृति और भारतीय समाज’ में श्रीराम के चरित्र को संबंधों के आलोक में पुनः पाठन की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया है। यह कृति भारतीय समाज के लिए इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वर्तमान समय में हम संयुक्त परिवार की मर्यादा और उसकी व्यक्ति हितकारी परिव्याप्ति को विस्मृत करते जा रहे हैं। इसलिए भारतीय परिवार-संस्था को जीवंत रखने की आवश्यकता है। अयोध्या में श्रीराम मंदिर की पुनःस्थापना के साथ विभिन्न भारतीय भाषाओं में राम के चरित्र से संबधित कई आलेख पत्र-पत्रिकाओं द्वारा विशेषांक निकालकर अपने महानायक एवं परम आराध्य का अथक स्मरण कराया गया।
हमारे जीवन के लिए पर्यावरण भी एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक उपांग है। विदित है कि साहित्यिक लेखन पर्यावरण के प्रति मनुष्य को कर्त्तव्यों की तरफ ध्यान दिलाता है। वैदिक परंपरा ने प्रकृति के प्रति कृतज्ञता एवं पूजन-भाव का संचार किया। भारतीय साहित्य में पर्यावरण के प्रति आत्मीयता के रंग सर्वत्र दिखाई देते हैं। जब-जब इन रंगों की चमक कम होने लगती है, तब-तब साहित्यकार इसे अपने काव्य में स्थान देता है। उदाहरण के लिए, भारतीय पुलिस सेवा के एक अधिकारी और कवि श्री कांतेश मिश्र ‘सेंसस’ कविता में लिखते हैं-
‘हर बार सेंसस/ की व्याख्या/ मनुष्यों की संख्या/ है बताती/ नहीं पता/या बताते नहीं/ आम के हैं वृक्ष कितने?’
विगत दिनों साहित्य ने पठन-पाठन की प्रक्रिया में भारतीय ज्ञान-परंपरा का समावेश भी किया है, जिससे नैतिकता, आत्मानुशासन एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदि भारतीय चिंतन का स्वर प्रतिध्वनित हो रहा है। अभी प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों में योगाभ्यास की शिक्षा दी जा रही है, जिससे मनुष्य की काया एवं विचार दोनों में नवीन स्फूर्ति देखी जा रही है। इस भारतीय योग-साधना से पूरा विश्व लाभान्वित हो रहा है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के भारत अध्ययन केंद्र द्वारा वास्तुशास्त्र एवं ‘पंचतंत्र के माध्यम से नेतृत्व सीखने’ जैसे पाठ्यक्रमों का प्रारंभ इसका सुंदर उदाहरण है। यहाँ भारतीय शास्त्र में निहित धार्मिक और नैतिक विषयों का भी अध्यापन हो रहा है। भारत अध्ययन केंद्र में भारत सरकार के सहयोग से अभी फीजी और ट्रिनिडाड एवं टोबैगो देशों से भारतीय हिंदू पूजा-पद्धति का ज्ञान और प्रशिक्षण लेने 20 लोग आए हुए हैं, जिन्हें काशी के विद्वान् पंडितों का सान्निध्य मिल रहा है।
इन सबके साथ ही, भारत की समृद्ध पाठ्य परंपराओं को बनाए रखने और उनका लाभ उठाने के उद्देश्य से सरकार डिजिटलीकरण के द्वारा सार्वजनिक पहुंँच में वृद्धि के लिए प्रयासरत है। पांडुलिपियों को संरक्षित, प्रलेखित और प्रसारित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस मिशन को 2024-31 तक के समय के लिए केंद्रीय क्षेत्रक योजना के रूप में ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के नाम से पुनर्गठन किया गया है, जिसके लिए 482.85 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। इसके तहत पांडुलिपियों का सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण तो हो ही रहा है, साथ ही इन पांडुलिपियों के वैज्ञानिक संरक्षण का कार्य भी किया जा रहा है। गुणवत्तायुक्त अनुसंधान में वृद्धि के लिए अप्रकाशित पांडुलिपियों का संपादन, अनुवाद एवं प्रकाशन किया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी पांडुलिपि अनुसंधान, दस्तावेजीकरण और संरक्षण में मुख्य भागीदारी सुनिश्चित कर रहा है। प्रसन्नता है कि अब तक भारत में 5.2 मिलियन से अधिक पांडुलिपियों के दस्तावेजीकरण का कार्य संपन्न हो गया है।
समग्रतः साहित्यिक पठन-पाठन एवं लेखन के क्षेत्र में हो रहे इन व्यक्तिगत एवं सरकारी प्रयासों में भारतीय समाज के नवोत्थान की संकल्प-शक्ति प्रतिबिंबित होती है, तथापि इस दिशा में ‘चरैवेति-चरैवेति’ के मूलमंत्र को आत्मसात् कर लक्ष्य की तरफ सतत बढ़ना होगा।
लेखक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में हिन्दी विभाग में है।




