• अनुवाद करें: |
मुख्य समाचार

श्रीनगर के प्राचीन श्री रघुनाथ मंदिर में 36 साल बाद हुई रामनवमी पूजा

  • Share:

  • facebook
  • twitter
  • whatsapp

जम्मू कश्मीर

श्रीनगर में वितस्ता (झेलम) नदी के पवित्र तट पर स्थित ऐतिहासिक श्री रघुनाथ मंदिर बुधवार को रामनवमी से ठीक पहले दीपों की रोशनी से जगमगा उठा, घंटियों की गूंज सुनाई दी और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हवन की सुगंध ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कश्मीर की सांस्कृतिक स्मृति और आस्था के पुनर्जागरण का प्रतीक रहा।

Raghunath Mandir in Srinagar hosts first Ram Navami pooja in 36 years - The  Tribune

चैत्र नवरात्रि और राम नवमी पर्व के अवसर पर करीब 37 वर्षों बाद मंदिर में श्रद्धालुओं का जनसमूह उमड़ा है, जो यह संकेत देता है कि कश्मीर घाटी में बदलती परिस्थितियों के बीच आस्था फिर से अपने स्वर में लौट रही है। जिस मंदिर में कभी दिन के उजाले में भी जाने से लोग कतराते थे, वहां अब शाम ढलते ही श्रद्धा का मेला सजा हुआ है। भजन, आरती और मंत्रों की ध्वनि ने भय और सन्नाटे को तोड़ दिया है।

1990 के दशक की शुरुआत में जब आतंकवाद चरम पर था, तो उस दौर में ऐतिहासिक मंदिर को इस्लामिक जिहादियों ने निशाना बनाया। मंदिर परिसर में स्थित स्कूल और धर्मशाला को जला दिया, पूजा-अर्चना बाधित की गई और अंततः पूरे मंदिर को आग के हवाले कर दिया गया।

आतंकियों ने मंदिर की बहुमूल्य धरोहर कीमती मूर्तियां, सोने-चांदी के आभूषण और अन्य ऐतिहासिक वस्तुएं लूट ली गईं। मूर्तियों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया, जबकि कुछ को वितस्ता में बहा दिया गया। एक समय ऐसा भी था, जब यह ऐतिहासिक स्थल पूरी तरह उपेक्षित था।

19वीं सदी का भव्य निर्माण

श्रीनगर का यह भव्य मंदिर कभी कश्मीर में धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। इसका निर्माण महाराजा गुलाब सिंह ने वर्ष 1835 में आरंभ कराया था, जिसे उनके उत्तराधिकारी महाराजा रणबीर सिंह ने 1860 में पूर्ण कराया। मंदिर परिसर में एक विद्यालय और विशाल पुस्तकालय भी था, जो इसे केवल पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि ज्ञान और संस्कृति का केंद्र बनाता था।

दशहरा और रामनवमी जैसे पर्वों पर यहां भव्य आयोजन हुआ करते थे। लेकिन देखते ही देखते यह ऐतिहासिक मंदिर इस्लामिक कट्टरपंथियों की हिंसा की भेंट चढ़ गया। मंदिर को पूरी तरह से खंडित और अपवित्र कर दिया गया। हालाँकि, 1990 के दशक के बाद भी पूर्ववर्ती सरकारों ने मंदिर की सुध नहीं ली।

वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद इस मंदिर के संरक्षण और पुनर्निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाए गए। इसे स्मार्ट सिटी परियोजना में शामिल किया गया और इसके जीर्णोद्धार के लिए लगभग 60 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई। हालाँकि, अब तक करोड़ों रु लगाये जा चुके हैं।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन और पर्यटन विभाग की देखरेख में मंदिर की मरम्मत का कार्य जारी है, जिसमें इसके मूल वास्तुशिल्प को सुरक्षित रखते हुए पुनर्निर्माण किया जा रहा है। मंदिर के नीचे झेलम तट पर एक नया घाट भी तैयार किया गया है, जो इसकी भव्यता में चार चांद लगाता है।

लगभग 37 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद मंदिर में रामनवमी का आयोजन हो रहा है। बुधवार की संध्या से शुरू हुआ हवन गुरुवार सुबह पूर्णाहुति के साथ संपन्न हुआ। इसके बाद मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया।

आस्था की अडिग शक्ति

वर्ष 2008 में जब इस मंदिर की सफाई और पुनर्स्थापना का कार्य शुरू हुआ था, तब यह एक कठिन और चुनौतीपूर्ण प्रयास माना जा रहा था। लेकिन समय के साथ यह प्रयास एक संकल्प में बदल गया। एक ऐसा संकल्प, जिसने आज इस ऐतिहासिक मंदिर को फिर से जीवंत कर दिया। आज मंदिर में गूंजती घंटियां और मंत्र यह प्रमाणित करते हैं कि आस्था को दबाया जा सकता है, लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता।