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अयोध्या में वही त्रेता युग

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अयोध्या में वही त्रेता युग 

भगवान विष्णु ने त्रेतायुग में अयोध्या में जब राम के रूप में अवतार लिया था तब अयोध्या की धरती धन्य हो गई थी। इस धरती की पुण्यता, भव्यता और उल्लास तब भी कितना भव्य रहा होगा, जब चौदह वर्ष का बनवास बिता कर प्रभु राम, जानकी और लक्ष्मण ने अयोध्या की भूमि पर पुनः अपने चरणों से इस धरती को धन्य किया होगा। अयोध्या वासियों ने इस अवसर पर भव्य दीपावली मनाई थी। नर-नारी- बाल, पशु, पक्षी और यहां का कण-कण पुलकित, मुदित और हर्षित था। यह वर्णन हमें प्राचीन ग्रन्थों रामायण और रामचरितमानस में मिलता है। जनमानस, संत, संन्यासी पुलकित और प्रफुल्लित थे। दुंदभि के साथ मंगल ध्वनि के मध्य आकाश से पुष्प वर्षा भी हो रही थी। दिग्विजय का शंखनाद हो रहा था। दरवाजों पर बन्दनवार सजे थे और चौक पर चंदन से रंगोली उकेरी गई थी। अयोध्या में रामनाम की गूंज थी। यह जानकारी मनोहारी रूप में हमारे सनातन सद्ग्रन्थों में वर्णित है। हम त्रेतायुग के उस परमानन्द की अनुभूति कर अपने जीवन को धन्य मनाते हैं।

त्रेता युग का वही दृश्य कलिकाल में पुनः पौष शुक्ल द्वादसी, विक्रमी संवत् 2080, सोमवार, 22 जनवरी 2024 को उपस्थित हुआ श्री राम जन्म भूमि, अयोध्या में रामलला प्राण प्रतिष्ठा समारोह के आयोजन पर। नक्षत्र मृगशीर्ष, मुहूर्त अभिजीत की शुभ घड़ी 12.29.08 से 12.3.32 के मध्य प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर भी भौतिक भवनों से लेकर मानव मानस के द्वार भी ध्वजाओं और बन्दनवार से सज गये। रामोत्सव - लोकोत्सव एकाकार हो गये। प्राण प्रतिष्ठा प्रक्रिया वैश्विक पर्व का स्वरूप ले चुकी थी। जन आकाक्षाएं मंगल ध्वनि और भजन कीर्तन से अपने मुदित मन को अभिसिंचित कर रहा था। सरयू की लहरें नृत्य कर रहीं थीं। हनुमान गढ़ी, कनक भवन और पूरे विश्व में हिन्दू निवास जैसे स्वर्णिम आभा से प्रमुदित थे। इस बार अवध में ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में दीपावली मनाई गई। भारत सहित विश्व के अनेक स्थानों पर श्री रामचन्द्र कृपालु भजमन व मंगल भवन अमंगल हारी के भजन गूंजेे। अयोध्या में इन्द्र योग, मेष लग्न के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, काशी के आचार्य गणेश्वर शास्त्री उनकी टीम, जब वैदिक मंत्रोचार के मध्य कार्यक्रम सम्पन्न कर रहे थे, तब सम्पूर्ण भारत ही नहीं विश्व में जहां-जहां सनातनी व भारतवंशी थे, सभी राममय होकर रघुनन्दन का अभिनन्दन कर राम का जयघोष कर रहे थे। मंदिर के बाहर उपास्थित भक्तों पर हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा हो रही थी। कचन कलश, बन्दनवार, ध्वज और टनों फूल से सुसज्जित नयनाभिराम सजावट पूरा विश्व देख रहा था। भगवान राम, राजा राम नाम की वर्षा हो रही थी। भाव विह्वल अयोध्या भारत की शक्ति की अनुभूति कर रही थी। सम्पूर्ण देश और विदेश में राम नाम भाव की व्यापकता, अद्वितीय सभ्यतागत कार्यक्रमों से ओत प्रोत था। हर भारतीय की आंखें भावुक थीं, आस्था का समुद्र उमड़ा था। अयोध्या में सर्व पंथों के आचार्य, प्रमुख संत उपस्थित थे। क्या नयनाभिराम दृश्य था? विधाता से की गई शपथ पूर्ण हो रही थी। मनोरथ सफल हो रहा था। यह अवसर भगवान विष्णु के सूर्यावतार की पवित्र तिथि भी थी। कौशल्या के राघव का विग्रह जागृत हो रहा था। वर्तमान पीढ़ी अपनी इन्हीं आंखों से ध्येय का दर्शन कर रही थी। आरती के समय मृदगंम् स्वरगंम्, शहनाई, घन्टा, घड़ियाल और पवित्र मंत्रोच्चार हो रहे थे। इसी समय दूरदर्शन सहित सभी टीवी चैनल 22 देशी और 7 विदेशी भाषाओं में कार्यक्रम प्रसारित कर रहे थे। कहीं कोई व्यवधान नहीं, सर्वत्र राममय भाव था। जिस सरयू का वर्णन वेद में है, उसकी लहरें आनन्द की अनुभूति से हिलोरे ले रही थीं। सूर्य भगवान ने भी इस अवसर पर घने कोहरे को छांट कर अपनी आंखें खोली थी, अतः गुनगुनी धूप निकल आई थी। मंदिर के ईशान कोण व आग्नेय कोण में बैठे भारत भर से आये संत, महात्मा अपने-अपने क्षेत्र के प्रसिद्ध नागरिक, कलाकार, खिलाड़ी सहित अनेकों गणमान्य अतिथि व श्री राम जन्म भूमि आन्दोलन में संघर्षरत रहे परिवारजन अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की मर्यादा बढ़ा रहे थे। अनुष्ठान सिद्धि की भावना से ओतप्रोत साधना और तपस्या पूर्ण कर मनसा-वाचा-कर्मणा, तप द्वारा परिशुद्ध हो कर ‘तप-तप इति तपश्चर्य’ की भावना को व्यक्त कर रहे थे।

यह कार्यक्रम वस्तुतः त्रेतायुग की याद दिला गया। भारत को इसी दिव्य दिन की प्रतीक्षा थी। त्रेतायुग के वैभव की पूरी दुनिया दर्शन कर रही थी। बाल रूप रामलला की प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति की भव्यता व सुदर्शन रूप से पूरी दुनिया दर्शन कर परम संतोष का अनुभव कर रही थी। अपने संबोधन में डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि रामलला के साथ भारत का स्व लौट आया है। नया भारत खड़ा हो रहा है। अयोध्या उस नगरी का नाम है, जहां द्वन्द नहीं है। आगे हमें रामराज्य का संकल्प पूरा करना है। बिना अहंकार के धर्म के चार मूल सत्य, करुणा, अहिंसा व तपस्या के बल पर मंदिर पूरा होते-होते विश्व गुरु बनाने का ध्येय पूरा करना है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा कि हमारे सभी के राम आ गये हैं। गर्भगृह में ईश्वरीय चेतना का साक्षी बन कर मैं अनुभव कर रहा हूं कि आज का दिन नये कालचक्र का उद्गम सिद्ध होगा। मन्दिर न्यायबद्ध हो कर बना है, यही कारण है कि सागर से सरयू तक की यात्रा में हमें भारत के एकत्व की अनुभूति हुई। राम आग नहीं ऊर्जा हैं। विवाद नहीं समाधान हैं। वर्तमान नहीं अनन्त काल हैं। आज का रामोत्सव सर्वव्यापकता और परम्पराओं का उत्सव है। हमें अगले एक हजार वर्षों की नींव रखनी है। हमें राम से राष्ट्र तक, देव से देश तक चेतना का विस्तार करना है। इस अवसर पर उन्होंने शबरी, निषादराज, जटायु और गिलहरी का स्मरण करते हुये कहा कि आने वाला समय भारत के अभ्युदय का है। इस दौरान श्रमबीरों का सम्मान भी किया। यह दिन विजय नहीं विनय का दिन है- यही नहीं, उन्होंने नव प्रतिष्ठित राम विग्रह के समक्ष साष्टांग दण्डवत भी किया।

अवधपुरी सोहइ एहि भांती ।

प्रभुहि मिलन आई जनु राती ।।