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इतिहास

राष्ट्रीय चारित्र्य – श्री गुरुजी

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संघ संस्मरण 

राष्ट्रीय चारित्र्य श्री गुरुजी

 वही आत्मविस्मरण, वही भेद, वही दुर्बलता, वही परानुकरण करने की चेष्टा - सब कुछ वही दिखाई देता है। उससे भी आगे यदि विचार करें तो गत एक हजार वर्ष के लंबे काल-खंड में जिस दुर्गुण का प्रभाव, कुछ अपवाद छोड़कर, सभी में दिखाई दिया- वह चरित्र का अभाव आज भी है। वास्तविकता यह है कि जिसे स्वतंत्रता' कहते हैं, उसके बाद भी जनता सुखी नहीं है तो उसका मूल कारण चरित्र का न होना ही है । इसीलिए सब ओर दुःख है ।

 जनता के अंतःकरण में यह भाव उत्पन्न नहीं हुआ कि सत्ता-परिवर्तन होकर अपनी सत्ता आई है। उसके हृदय में यह भाव नहीं है कि यह स्वाधीनता है, स्वराज्य है, स्वातंत्र्य है । यदि यह भाव होते तो जिम्मेदारी के भाव आते और चारित्र्यहीनता को मिटाने के प्रयत्न होते। परंतु मूल में कुछ परिवर्तन न होने के कारण यह चित्र दिखाई देता है । यह एक जटिल प्रश्न है ।

 प्रत्येक व्यक्ति इस पर विचार करता है और बड़े-बड़े व्यक्ति प्रतिदिन चरित्र-निर्माण का उपदेश देते हैं। वे यह ध्यान में नहीं रखते कि उपदेश मात्र से चरित्र का निर्माण नहीं होता।

 - श्री गुरूजी समग्र, खंड-2, प्रथम संस्करण, सुरुचि प्रकाशन, पृष्ठ 75