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हमारी संस्कृति हृदय पर विजय प्राप्त करने की शिक्षा देती है -भय्याजी जोशी

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सीहोर

संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य भय्याजी जोशी ने कहा कि भारत का इतिहास किसी राज्य को पराजित करने का नहीं रहा है, इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत ने किसी पर आक्रमण नहीं किया, जबकि भारत की सभ्यता, संस्कृति और धर्म को समाप्त करने के लिए सैकड़ों बार आक्रमण हुए। हमारे देश की सभ्यता पराजित करने की नहीं, बल्कि हृदय पर विजय प्राप्त करने की शिक्षा देती है। यही कारण है कि हमारे महापुरूषों ने धर्म और सद्भाव का विचार लेकर विश्व भर में भ्रमण किया और धर्म का प्रचार किया।

उन्होंने कहा कि जब तक भारत में धर्म है, तब तक विश्व में धर्म है। जिस दिन भारत में धर्म समाप्त हो जाएगा, उस दिन विश्व में भी धर्म नाम की कोई चीज नहीं बचेगी। धर्म की पहली सीढ़ी उपासना है। हर व्यक्ति अलग-अलग उपासना करता है, उपासना धर्म तक सीमित नहीं है। धर्म की दूसरी सीढ़ी आचार धर्म है, हमारा आचरण शुद्ध होना चाहिए। जब तक आंतरिक शुद्धता नहीं रहेगी, हम सिद्धांतों पर चलने वाले नहीं रहेंगे, और बाह्य आचरण नाटक के समान रहेगा। इसके लिए हमें अंतर्बाह्य आचरण एक समान रखना होगा।

उन्होंने कहा कि हमें आत्म केन्द्रता से बाहर आना, उपभोगवाद से बचना, पतन की ओर जा रही अपनी व्यवस्था को संरक्षित करना है। भारत की एक विशेष व्यवस्था है जो समाज निर्माण का केन्द्र है। हमारी संस्कृति में मातृ देवो भव:, पितृ देवो भव: कहा गया है। यही संस्कार की पहली सीढ़ी है। उन्होंने पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि जहां वयस्क होने पर माँ-बाप अपने बच्चों को पृथक कर देते हैं। इसके लिए वहां कानून भी बना है, लेकिन कानून के माध्यम से संस्कार नहीं दिए जा सकते। हमें बच्चों को देशभक्ति के संस्कार देने चाहिए। देशभक्ति हमेशा हमारे हृदय में होनी चाहिए।

भय्याजी जोशी ने कहा कि हमारे अकेले का कोई अस्तित्व नहीं है, हम समाज के साथ जुड़े हुए हैं। वही हमारी पहचान है। सामूहिक एकता का संस्कार हमारी पहचान है। हम समाज को देने वाले बनेंगे, यही हमारे संस्कार हैं। व्यक्ति में राष्ट्र धर्म होना चाहिए, समाज धर्म एक सामूहिकता का जीवन जीता है।

श्री रामचन्द्र से प्रेरित जो समाज होगा, वह देश का गौरव होगा व सम्पूर्ण विश्व को भी प्रेरणा प्रदान करेगा। आज इस कार्य को करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामाजिक जीवन में है। यह कार्य संघ विगत 100 वर्षों से लगातार करता चला आ रहा है और आगे भी इसी संकल्प को लेकर अनवरत् यात्रा जारी रहेगी।

उन्होंने समाज में जाति, भेदभाव को समाप्त कर समानता और बंधुत्व स्थापित करने के लिए सामाजिक समरसता को अपनाने पर बल दिया। भारतीय पारंपरिक परिवार प्रणाली को बचाने, परिवारों में संस्कार बढ़ाने और संयुक्त परिवार को बढ़ावा देने की सीख दी। पर्यावरण की सुरक्षा और प्रकृति की रक्षा का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि स्वदेशी अपनाकर भारतीय वस्तुओं को अपनी जीवनशैली में उपयोग करना चाहिए, ताकि हमारा दे आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो।