कौशांबी, उत्तर प्रदेश
जेल नाम सुनते ही मस्तिष्क में आता है - कैदी, सजा और सन्नाटा लेकिन उत्तर प्रदेश के कौशांबी की ये जेल इस सोच को पूरी तरह बदल रही है। यहां कैदी अब केवल सजा नहीं काट रहे बल्कि “राष्ट्र का गौरव” गढ़ रहे हैं, वो भी बेकार पड़ी लकड़ियों से। ये है कौशांबी जिला कारागार, जहां वेस्ट वुड यानी बेकार पड़ी लकड़ियों से गढ़ी जा रही है भारत की पहचान यानि अशोक स्तंभ। लगभग एक फीट ऊंचे इन मॉडल्स पर इतनी बारीक नक्काशी देखते ही बनती हैं। इस जेल का इनोवेशन पहले भी चर्चा में रहा है। फटे-पुराने कंबलों से बेसहारा मवेशियों के लिए बनाए गए ‘काऊ कोट’ की प्रशंसा स्वयं देश के प्रधानमंत्री तक कर चुके हैं। इतना ही नहीं श्यामा तुलसी के सूखे डंठलों से बनी मालाओं ने महाकुंभ में संत समाज को भी चौंका दिया था। अब एक कदम आगे बढ़ते हुए। कैदी काष्ठकला और माटी कला में ट्रेनिंग लेकर फर्नीचर, डेकोर आइटम्स और अशोक स्तंभ जैसी चीजें तैयार कर रहे हैं। लगभग 523 कैदियों वाली इस जेल में 8 कैदी कुशल काष्ठ कलाकार बन चुके हैं, जबकि कुछ कैदी मिट्टी के कुल्हड़ और फ्लावर पॉट भी तैयार कर रहे हैं। जेल प्रशासन का कहना है कि इन प्रोडक्ट्स को बेचा नहीं जाएगा, बल्कि सरकारी दफ्तरों और कोर्ट्स में रखा जाएगा। ताकि हर जगह इनकी मेहनत और बदलाव की कहानी पहुंचे। कौशांबी जेल अब केवल एक जेल नहीं बल्कि एक ‘रिफॉर्म लैब’ यानि हुनर और आत्मपरिवर्तन का केन्द्र बन चुकी है। जहां गलतियों से सीखकर युवा नई पहचान बना रहे हैं। यहां हर तराशी गई लकड़ी एक नई उम्मीद, एक नई शुरुआत और राष्ट्र के प्रति समर्पण की कहानी बयां कर रही है। वाकई, अगर मौका मिले और मार्गदर्शन सही हो तो वही हाथ जो कभी गलती कर बैठे थे, आज देश का गौरव भी गढ़ सकते हैं।



