वाद-विवाद में बुद्धि का उपयोग अवश्य होता है, किन्तु इस प्रकार किया तो वह उपकारी नहीं, प्रत्युत् अपकारी होता है। फिर सब लोग पास कैसे आयेंगे ? हम उन्हें संघ का कार्य समझा सकें, ऐसी स्थिति कैसे उत्पन्न होती है ? उसके लिए प्रथम हम दोनों, अर्थात् हम और जिसे हमें समझाना है उस के बीच अन्तः करण की एकात्मता स्थापित होनी चाहिये ।
वह और हम, दो शरीर किन्तु एक आत्मा, ऐसी अभिन्न- हृदय मित्रता की स्थिति उत्पन्न होनी चाहिये । यह स्थिति उत्पन्न होने पर हमारे हृदय की ध्येयनिष्ठा उसके हृदय में प्रविष्ट होगी और ऐसे विशुद्ध प्रेम के आधार पर ही एक-एक मनुष्य को हम अपना कर उसमें अपने ध्येय की उपासना, भक्ति करने की इच्छा जाग्रत कर उसे अपना सहयोगी बना सकते हैं।
|| मैं साधारण स्वयंसेवक, मा.स. गोलवलकर, सुरुचि प्रकाशन -जनवरी -2014, पृष्ठ - 10 ||