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ग्रामीण महिलाओं ने चिप्स से लिखी आत्मनिर्भरता की कहानी

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हरिद्वार, उत्तराखण्ड

आत्मनिर्भर भारत का सपना अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांवों की महिलाएं भी अपने हुनर और मेहनत से इस सपने को साकार कर रही हैं। उत्तराखण्ड के हरिद्वार के एक छोटे से गांव की महिलाएं इसका बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं, जहां उन्होंने खेती से लेकर उत्पाद बनाने और बेचने तक की जिम्मेदारी खुद संभाली है।

जानकारी के अनुसार हरिद्वार के नौकराग्रांट गांव में प्रकाशमय बहुद्देश्यीय स्वायत्त सहकारिता से जुड़ी 25 ग्रामीण महिलाएं आलू की खेती और उससे बने उत्पादों के जरिए आत्मनिर्भर बन रही हैं। ये महिलाएं चिप्सोनाकिस्म के आलू का उत्पादन कर रही हैं और उनसे चिप्स, नमकीन और पापड़ तैयार कर बाजार में बेच रही हैं।

बता दें इस पहल की शुरुआत वर्ष 2023 में हुई, जब ग्रामोत्थान परियोजना के माध्यम से गांव में प्रकाशमय क्लस्टर लेवल फेडरेशन का गठन किया गया और महिलाओं को सहकारिता से जोड़ा गया। शुरुआत में प्रयोग के तौर पर महिलाओं को आलू का बीज दिया गया। फसल अच्छी हुई तो महिलाओं को इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का आत्मविश्वास मिला और स्वरोजगार की नींव पड़ी।

वही वर्ष 2024-25 में महिलाओं ने मिलकर 65 क्विंटल चिप्सोनाआलू का बीज खरीदा, जिससे करीब 35 टन से अधिक आलू का उत्पादन हुआ। इस आलू को ज्वालापुर और देहरादून मंडी में 25 से 30 रुपये प्रति किलो के भाव से बेचा गया। इसके बाद महिलाओं ने तय किया कि केवल आलू बेचने के बजाय उसका प्रसंस्करण कर ज्यादा आमदनी की जाए।

इसके लिए आलू चिप्स बनाने की मशीनें खरीदी गईं और ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान की ओर से 17 दिन का प्रशिक्षण भी दिया गया, ताकि महिलाएं उत्पादन, गुणवत्ता और बिक्री को बेहतर तरीके से समझ सकें। शुरुआत में बाजार और मजदूरी को लेकर कुछ शंकाएं थीं, लेकिन सामूहिक निर्णय लेकर महिलाएं पहले चरण में श्रमदान के रूप में काम करने लगीं।

पहले ही महीने में 5,000 रुपये की बिक्री हुई और धीरे-धीरे जिला व ब्लाक कार्यालयों से भी ऑर्डर मिलने लगे। चिप्स की गुणवत्ता की सराहना होने लगी और बिक्री बढ़ती चली गई। वर्तमान में महिलाएं हर सप्ताह करीब 75 किलो चिप्स और नमकीन तैयार कर रही हैं। केवल पांच महीनों में ही यह उद्यम अच्छी गति पकड़ चुका है।

ग्रामीण बाइटबना पहचान

महिलाओं ने अपने उत्पादों के लिए जीएसटी पंजीकरण, उद्योग पंजीकरण और फूड लाइसेंस जैसी सभी जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं। चिप्स, नमकीन और पापड़ को उन्होंने ग्रामीण बाइटनाम का ब्रांड दिया है। अब ये उत्पाद न केवल ऑफलाइन बाजार में, बल्कि अमेजन जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध हैं। अगर सही मार्गदर्शन और सामूहिक प्रयास हों, तो ग्रामीण महिलाएं भी आत्मनिर्भर बनकर समाज के लिए प्रेरणा बन सकती हैं।