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विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक-2025 और भारतीय उच्च शिक्षा का भविष्य

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विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक-2025 और भारतीय उच्च शिक्षा का भविष्य

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था आज जिस निर्णायक दौर से गुजर रही है, वह केवल संस्थागत पुनर्संरचना या प्रशासनिक सुधार का क्षण नहीं है, बल्कि यह भारत की बौद्धिक आत्मा, शैक्षिक दर्शन और राष्ट्रनिर्माण की दीर्घकालिक दृष्टि से जुड़ा हुआ एक गहन वैचारिक संक्रमण है। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक -2025 को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए। यह विधेयक उस ऐतिहासिक प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करता है कि क्या भारत अपनी उच्च शिक्षा प्रणाली को औपनिवेशिक नियमन, बहु-नियामक जटिलताओं और निरीक्षण-प्रधान मानसिकता से मुक्त कर स्वायत्तता, गुणवत्ता और उत्तरदायित्व के संतुलन पर आधारित एक आधुनिक, भारतीय और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी तंत्र में रूपांतरित कर सकता है।

स्वतंत्रता के पश्चात भारत ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में तीव्र विस्तार किया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 के अंतर्गत स्थापित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने विश्वविद्यालयों को अनुदान, न्यूनतम शैक्षणिक मानक और अकादमिक विकास का ढांचा प्रदान किया। इसके पश्चात तकनीकी शिक्षा के लिए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद अधिनियम, 1987 तथा अध्यापक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद  अधिनियम, 1993 अस्तित्व में आए। समय के साथ-साथ फार्मेसी, नर्सिंग, चिकित्सा, दंत चिकित्सा, विधि, वास्तुकला और पुनर्वास जैसे क्षेत्रों के लिए फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया, नेशनल मेडिकल कमीशन, डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया, बार काउंसिल ऑफ इंडिया, भारतीय पुनर्वास परिषद, काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग जैसी पेशेवर नियामक परिषदें गठित हुईं। इन संस्थाओं ने अपने ऐतिहासिक संदर्भ में शिक्षा के विस्तार और पेशेवर मानकों की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, किंतु बदलते समय के साथ यह बहु-नियामक व्यवस्था जटिल, दोहरावपूर्ण और कई बार परस्पर विरोधाभासी होती चली गई।

वर्तमान में भारत में 1150 से अधिक विश्वविद्यालय और लगभग 45,000 महाविद्यालय संचालित हैं, जिनमें करोड़ों विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। एक ही उच्च शिक्षा संस्थान को कई नियामक निकायों से अनुमतियाँ लेनी पड़ती थीं, निरीक्षणों की पुनरावृत्ति होती थी और अनुपालन की प्रक्रियाएं शिक्षा के मूल उद्देश्य ज्ञान-सृजन, शोध और नवाचार पर भारी पड़ने लगी थीं। नियमन, अनुदान, प्रत्यायन और मानक निर्धारण जैसे कार्य एक ही संस्था द्वारा किए जाने से हितों का टकराव और व्यक्तिनिष्ठता की संभावना भी बनी रहती थी। परिणामस्वरूप, नियमन गुणवत्ता-संवर्धन का साधन बनने के बजाय कई बार भय और औपचारिकता का पर्याय बन गया।

भारतीय शिक्षा परंपरा इस दृष्टि से भिन्न रही है। उपनिषदों का उद्घोष ”सा विद्या या विमुक्तये,“ शिक्षा को मुक्ति और आत्मोन्नयन का साधन मानता है, न कि नियंत्रण और दंड का। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि अत्यधिक नियमन गुणवत्ता की गारंटी नहीं है। नीति ने ”न्यूनतम लेकिन प्रभावी नियमन“, ”अधिकतम स्वायत्तता“ और ”परिणाम- आधारित गुणवत्ता“ को उच्च शिक्षा सुधार के मूल सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ते हुए कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना है जो ज्ञान, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व से युक्त हों।

इसी नीति-दृष्टि के आलोक में विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक-2025 का प्रारूप तैयार किया गया और 15 दिसंबर, 2025 को इसे संसद में प्रस्तुत किया गया। यह विधेयक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग  अधिनियम,1956; अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद अधिनियम, 1987; तथा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993 को निरस्त कर एक नया, एकीकृत उच्च शिक्षा नियामक ढांचा स्थापित करने का प्रस्ताव करता है। इसका केंद्रीय तत्व एक ऐसा आयोग है, जो तीन पृथक परिषदों, नियामक परिषद, गुणवत्ता/प्रत्यायन परिषद और मानक परिषद के माध्यम से कार्य करेगा। इस संरचना का मूल उद्देश्य शक्तियों का पृथक्करण, पारदर्शिता और स्पष्ट उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना है।

नियामक परिषद का दायित्व संस्थानों की स्थापना, मान्यता, अनुपालन और निगरानी से संबंधित होगा। गुणवत्ता या प्रत्यायन परिषद संस्थानों के प्रदर्शन, अधिगम परिणामों, शोध प्रभाव और सामाजिक योगदान के आधार पर उनका मूल्यांकन करेगी। मानक परिषद अकादमिक ढांचे, पाठ्यक्रम रूपरेखा, अधिगम परिणाम और पेशेवर मानकों का निर्धारण करेगी। यह विभाजन उस सिद्धांत को मूर्त रूप देता है, जिसे कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में प्रतिपादित किया था कि सुशासन के लिए नियम-निर्माण, क्रियान्वयन और मूल्यांकन की भूमिकाएं स्पष्ट और पृथक होनी चाहिए।

विधेयक का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि नए नियामक ढांचे को वित्तीय अनुदान देने का अधिकार नहीं दिया गया है। अब तक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग  और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद जैसी संस्थाएं नियमन और वित्तपोषण दोनों का कार्य करती थीं, जिससे निर्णयों में असमानता और व्यक्तिनिष्ठता की आशंका बनी रहती थी। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक-2025, नियमन और वित्तपोषण के कार्यों को अलग करता है। अनुदान और वित्तीय संसाधनों का प्रबंधन शिक्षा मंत्रालय या अन्य निर्दिष्ट तंत्रों के माध्यम से किया जाएगा। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि संस्थाओं की निष्पक्षता उनके अधिकारों और दायित्वों की स्पष्टता पर निर्भर करती है। यह प्रावधान उसी संवैधानिक भावना का शैक्षिक अनुप्रयोग है।

स्वायत्तता इस विधेयक की आत्मा है। भारतीय दर्शन में स्वायत्तता का अर्थ मनमानी नहीं, बल्कि आत्मानुशासन है। श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय (आत्म-संयम योग) के पांचवें श्लोक, ”उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्,“ स्वयं के उत्थान की जिम्मेदारी स्वयं पर रखने की प्रेरणा देता है। विधेयक संस्थानों को पाठ्यक्रम निर्माण, शिक्षण विधियों, शोध प्राथमिकताओं और अकादमिक संरचना में अधिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, किंतु इसके साथ परिणाम-आधारित मूल्यांकन और पारदर्शी प्रत्यायन को अनिवार्य बनाता है। इस प्रकार स्वायत्तता और उत्तरदायित्व का संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है।

प्रत्यायन और मूल्यांकन की नई व्यवस्था निरीक्षण-प्रधान मानसिकता से आगे बढ़कर विश्वास आधारित शासन की ओर संकेत करती है। अब तक प्रत्यायन कई बार भय और अनिश्चितता से जुड़ा रहा, जहां अचानक निरीक्षण और दंड की आशंका संस्थानों के मनोबल को प्रभावित करती थी। नई प्रणाली में डेटा-आधारित, तकनीक-संचालित और सतत मूल्यांकन को प्राथमिकता दी गई है। संस्थानों को प्रारंभिक स्तर पर न्यूनतम सार्वजनिक विश्वास प्रदान किया जाएगा और उसके बाद उनके प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा। रवींद्रनाथ ठाकुर का कथन यहां स्मरणीय है, कि ”ज्ञान वहाँ पनपता है, जहां भय नहीं होता।“

विधेयक में यह भी प्रावधान है कि यदि कोई उच्च शिक्षा संस्थान बिना अनुमति के संचालन करता है या नियमों का गंभीर उल्लंघन करता है, तो उस पर दस लाख रूपये से लेकर दो करोड़ रूपये तक का दंड लगाया जा सकता है तथा आवश्यकतानुसार उसे बंद भी किया जा सकता है। यह कठोर प्रावधान स्वायत्तता को अनुशासन से जोड़ने का प्रयास है। साथ ही यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी दंडात्मक कार्रवाई का भार छात्रों पर नहीं डाला जाएगा, जो शिक्षा को केवल बाजार-तर्क से अलग रखने का संकेत देता है।

एक महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक प्रावधान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) और अन्य राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों को भी इस साझा नियामक ढांचे के अंतर्गत लाने का है। यह संदेश देता है कि उत्कृष्टता विशेषाधिकार नहीं, बल्कि अधिक उत्तरदायित्व की अपेक्षा करती है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ”जिसे समाज ने अधिक दिया है, उससे समाज अधिक अपेक्षा करता है।“ श्रेष्ठ संस्थानों से यह अपेक्षा है कि वे पूरे तंत्र के लिए मानक और प्रेरणा बनें।

भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में यह विधेयक विशेष महत्व रखता है। तैत्तिरीय उपनिषद् का ”सत्यं वद, धर्मं चर“ निर्देश, शिक्षा को नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ता है। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा, भारतीय दर्शन, गणित, खगोल, आयुर्वेद और कला परंपराओं पर शोध को संस्थागत समर्थन देने की संभावना खोलता है। इससे शिक्षा का उद्देश्य केवल वैश्विक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी बन सकता है।

वैश्विक परिदृश्य में भारत को ऐसी उच्च शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है, जो अनुसंधान, नवाचार और बहुविषयकता में अग्रणी हो। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का कथन ”यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनना है, तो शिक्षा और शोध को उसकी रीढ़ बनाना होगा,“ यहां प्रासंगिक है। यह विधेयक स्पष्ट करता है कि गुणवत्ता केवल डिग्रियों की संख्या से नहीं, बल्कि ज्ञान के सामाजिक प्रभाव और शोध की प्रासंगिकता से मापी जानी चाहिए।

फिर भी, यह स्वीकार करना आवश्यक है कि यह सुधार चुनौतियों से मुक्त नहीं है। शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन एक संवेदनशील प्रश्न बना रहेगा। राज्य विश्वविद्यालयों और संसाधन-संकटग्रस्त संस्थानों के लिए वित्तीय सहयोग, क्षमता निर्माण और संक्रमणकालीन व्यवस्था की स्पष्ट रूपरेखा आवश्यक होगी। महात्मा गांधी का यह विचार आज भी प्रासंगिक है कि, ”कोई भी सुधार तभी सार्थक है, जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।“

समग्रतः विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक-2025 भारतीय उच्च शिक्षा को नियंत्रण से समन्वय, निरीक्षण से विश्वास और अधिकार से उत्तरदायित्व की ओर ले जाने का एक साहसिक और दूरगामी प्रयास है। कठोपनिषद् का ”उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत,“ आह्वान आज केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए प्रासंगिक प्रतीत होता है। यह विधेयक केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक यात्रा का नया अध्याय है। इसका वास्तविक मूल्यांकन इसके क्रियान्वयन और परिणामों से होगा, किंतु इतना स्पष्ट है कि विखंडित, भय-आधारित और निरीक्षण- प्रधान व्यवस्था की ओर लौटना अब संभव नहीं है। यदि भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा और आधुनिक भारत की आवश्यकताओं के संतुलन के साथ इसे लागू किया गया, तो यह भारतीय उच्च शिक्षा के भविष्य को सशक्त, आत्मविश्वासी और राष्ट्रोन्मुख दिशा प्रदान कर सकता है।

लेखक ख्यातिप्राप्त शिक्षाविद, शैक्षिक प्रशासक, प्रोफेसर एवं राष्ट्रवादी चिन्तक और सरकार द्वारा ‘शिक्षक श्री’ पुरस्कार से विभूषित है।