उच्च शिक्षण संस्थानों की निगरानी बेहद जरुरी
10 नबंवर को दिल्ली के लाल किले के पास धमाके के बाद से आतंकी लैब के रुप में सामने आयी फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी संदेह के घेरे में है। गौरतलब है कि दिल्ली बम धमाके का मुख्य आरोपी डा0 उमर नवी इसी यूनिवर्सिटी में चिकित्सक के रुप में कार्यरत था। वर्तमान में इस यूनिवर्सिटी में कार्यरत 200 से भी अधिक डाक्टर व अन्य स्टाफ जांच एजेन्सियों के राडार पर हैं। केन्द्र के साथ-साथ राज्यों की जांच एजेन्सियां भी यह जानने का प्रयास कर रहीं हैं कि अल फलाह यूनिवर्सिटी व्हाइट कॉलर टेरर मॉडयूल कैसे बन गयी। इस यूनिवर्सिटी में चल रही आर्थिक अनियमितता से लेकर अन्य संचालित गतिविधियों की गहन जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को यहां 415 करोड़ रुपयों की वित्तीय अनियमितता भी मिली हैं। कोर्ट में ईडी ने आरोप लगाया है कि अल फलाह यूनिवर्सिटी ने अपनी राष्ट्रीय मूल्याकंन प्रत्यायन परिषद (नैक) एवं यूजीसी की धारा 12(बी) के तहत मान्यता एवं सरकारी अनुदान मिलने की बात को गलत तरीके से प्रस्तुत किया। जांच बताती है कि अल फलाह स्कूल ऑफ इंजिनियरिंग एण्ड टैक्नोलॉजी की नैक मान्यता 2013 से 2018 तक ही थी तथा शिक्षा विभाग की मान्यता 2011 से 2015 तक ‘ए’ ग्रेड रही थी। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने नवीनीकरण कराये बिना ही अपने प्रपत्रों में ‘ए’ ग्रेड होने का दावा करते हुए झूठ के सहारे छात्रों से करोड़ों की फीस वसूली। जांच में यह भी सामने आया है कि इस यूनिवर्सिटी ने वित्तीय वर्ष 2018 से 2025 तक 415.10 करोड़ रुपयों का शैक्षिक राजस्व भी अर्जित किया। जांच-पड़ताल बताती है कि 2018 के बाद तो हर साल इस यूनिवर्सिटी के राजस्व में तेजी से बृद्धि दर्ज की गयी। कहना न होगा कि 2018-19 में जहां इसका बार्षिक राजस्व केवल 24.1 करोड़ था वह 2024-25 में बढ़कर 81.10 करोड़ तक पहुंच गया। इसके अलावा इस यूनिवर्सिटी के हॉस्टल और मैस फीस को लेकर भी तमाम अनियमिततायें सामने आयी हैं।
दरअसल हरियाणा के फरीदाबाद में स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी की स्थापना 2014 में हरियाणा विधानसभा के अधिनियम 21 के तहत की गयी थी। इसको यूजीसी द्वारा एक्ट 1956 की धारा 2 (एफ) के तहत मान्यता मिली थी। यह यूनिवर्सिटी एसोसियेशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (एआईयू) की सदस्य भी रही है। इस यूनिवर्सिटी में यूजी व पीजी के साथ-साथ पीएच-डी स्तर के पाठ्यक्रम भी संचालित हो रहे हैं। यहां उल्लेखनीय है कि जिन उच्च शिक्षण संस्थानों पर देश के उज्जवल भविष्य के लिए श्रेष्ठ मानव संसाधन तैयार करने का उत्तरदायित्व होना चाहिए था, उन संस्थानों में सफेदपोश आतंक का साया पड़ने से देशभर में फैले ऐसी प्रकृति के विश्वविद्यालय गहन जांच के दायरे में आ गये हैं। केवल इतना ही नहीं ऐसे विश्वविद्यालयों का ढ़ांचा और उनकी संचालित गतिविधियों पर भी गंभीर सवाल खडे़ हो रहे हैं। इसी के साथ-साथ ऐसी संस्थाओं को मान्यता देने वाली नियामक संस्थाओं पर भी सवाल उठने स्वभाविक ही हैं। 2025 की अधिकृत सूचना से जुड़े आंकड़ों के अनुसार देश में इस समय 1191 विश्वविद्यालय संचालित हैं। इनमें निजी विश्वविद्यालयों की संख्या 502, राज्य विश्वविद्यालय 494, केन्द्रीय विश्वविद्यालय 57 तथा डीम्ड विश्वविद्यालयों की संख्या 138 है। ये आंकड़े बताते हैं कि इस समय देश में निजी विश्वविद्यालयों की संख्या सबसे अधिक है। यूजीसी एक्ट 1956 में यह स्पष्ट अंकित है कि विश्वविद्यालय केवल तभी डिग्री प्रदान कर सकते हैं जब वे केन्द्रीय, प्रान्तीय अथवा राज्य अधिनियम के तहत स्थापित हुए हों। यूजीसी अधिनियम की धारा 73 के तहत स्थापित डीम्ड संस्थान डिग्री प्रदान करने के पात्र हैं। इनके अतिरिक्त जो संस्थान संसद के एक अधिनियम के द्वारा विशेष रुप से स्वीकृत हैं वे भी डिग्री प्रदान करने के पात्र माने गये हैं।
देश में यूजीसी, एआईसीटीई व एनसीटीई जैसी नियामक संस्थाओं के द्वारा मान्यता प्रदान करने के बावजूद भी अक्सर यहां फर्जी विश्वविद्यालयों के द्वारा डिग्री दिये जाने की चर्चा खूब जोरों पर रहती है। यूजीसी हर साल ऐसे फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची जारी भी करता है। उनमें से कुछ बंद भी किये जाते हैं। इसके बाद भी देश में आज 22 फर्जी विश्वविद्यालय संचालित हैं। इनमें 10 तो अकेले दिल्ली में ही संचालित हैं। इसके साथ अलावा यूपी में 4, आन्ध्र प्रदेश व केरल में 2-2, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पुडुचेरी व पश्चिम बंगाल में 1-1 विश्वविद्यालय फर्जी तरीके से संचाालित हैं। इनमें से अधिकांश विश्वविद्यालय छात्रों के भविष्य की चिंता किये बिना धड़ल्ले से डिग्री बांटने से नहीं हिचक रहे हैं। कुछ विश्वविद्यालय तो अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों से संबद्धता का हवाला देकर देश में लोगों से लाखों रुपये बसूलकर पीएच-डी व डी-लिट् की उपाधि तक बांट रहे हैं। ध्यातव्य हैे कि उत्तर प्रदेश सहित कई प्रदेशों के निजी विश्वविद्यालय इस धोखाधड़ी से जुड़ी जांच के घेरे में हैं। देश में फर्जी डिग्री प्रदान करना एक गंभीर संज्ञेय और गैर जमानती अपराध हैं। इस धोखाधड़ी और जालसाजी के लिए आईपीसी की धारा 468 के तहत सात साल की सजा और जुर्माना निर्धारित है। पिछले दिनों कई निजी विश्वविद्यालयों के संचालक इस एक्ट के तहत जेल तक भेजे गये हैं और कई विश्वविद्यालयों में निर्धारित पाठ्यक्रमों से इतर जाकर अन्य देश विरोधी गतिविधियों को लेकर नियामक संस्थाओं की कर्तव्यविमुखता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
अभी पिछले दिनों इंटरपोल और रैंड कारपोरेशन की नवीनतम टेरर विहेवियर इंटेलिजेंस रिपोर्ट से संज्ञान में आया है कि विश्व आतंकवाद अब एक नये मोड़ पर पहुंच चुका है। वहां अब हथियारों और विस्फोटकों के साथ-साथ मोबाईल फोन, लैपटॉप, एन्क्रिप्टेड चैट व डिजिटल नेटवर्क इत्यादि पर आधारित कट्टरपंथ प्रशिक्षण सबसे बड़े हथियार बन रहे हैं। अभी हाल ही में फरीदाबाद-दिल्ली की अल फलाह यूनिवर्सिटी के डाक्टरों से जुड़ा सफेदपोश आतंकी मॉडयूल इस वैश्विक पैटर्न की साफतौर पर पुष्टि करता है। इसमें सबसे हैरत कर देने वाली बात यह है कि इस मॉडयूल में एमबीबीएस डाक्टर, मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर और उच्च शिक्षा प्राप्त टेक सेवी युवा शामिल हो रहे हैं। यह बात इस ओर ईशारा करती है कि संगठित अपराध अब सामान्य अपराधियों की तुलना में उच्च शिक्षित पेशेवर वर्ग में प्रवेश कर चुका है। फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी में सफेदपोश मॉडयूल के पकड़ में आने के बाद भारतीय खुफिया ऐजन्सियों की पैनी नजर होने से आतंक के विदेशों में छिपे मॉडयूल ने अब भारतीय विदेशी छात्रों को निशाना बनाने के प्रयास तेज कर दिये हैं। उनकी साजिश है कि ये छात्र भारत लौटने के बाद आतंक के ऐसे ही मॉडयूल बनकर आतंकी गतिविधियों को अंजाम दें। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली दंगों से जुड़ी सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व कर रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने भी पीठ के सामने लाल किले पर हुए विस्फोट से जुड़ी घटना की चर्चा करते हुए दलील दी कि जब बुद्धिजीवी आतंकवादी बन जाते हैं तो वे जमीनी आतंकवादियों से ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं। कड़वा सच यह है कि भारतीय छात्रों को कट्टरपंथी बनाने से जुड़े इस इको-सिस्टम से अब देश के लिए भविष्य में एक नया खतरा उत्पन्न होने के संकेत मिल रहे हैं।
देश में शायद यह पहला मौका है जब यूजीसी से मान्यता प्राप्त अल फलाह यूनिवर्सिटी के साथ-साथ कश्मीर के मेडिकल कॉलेज के डाक्टरों से जुड़ा यह जटिल सफेदपोश आतंकी मॉडयूल सामने आया है। जांच ऐजन्सियों को यह भी संदेह है कि जैश मॉडयूल भविष्य में गुप्त रुप से कश्मीर के अस्पतालों को जहरीले हथियार छिपाने के ठिकाने के रुप में प्रयोग कर सकता है। हाल फिलहाल अभी यह सारा मुददा् यूजीसी मान्यता प्राप्त केवल एक यूनिवर्सिटी से जुड़ा है। शेष फर्जी विश्वविद्यालयों में डिग्री बांटने के साथ-साथ अन्य क्या-क्या गतिविधियां संचालित होती होगीं इसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।
अन्त में इस सच को कहने में कोई हिचक नहीं कि अगर मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय में इस प्रकार के बुद्धिजीवी आतंकी मॉडयूल पनप रहे हैं तो कहीं न कहीं यह यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई जैसी नियामक संस्थाओं की उदासीनता भी जिम्मेदार है। आज अल फलाह यूनिवर्सिटी के साथ देश में फैले निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में संचालित गतिविधियों एवं उनकी कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं तो वह इसलिए क्योंकि इन नियामक संस्थाओं के पास आज भी कोई ठोस व प्रभावी निगरानी तन्त्र नहीं है। हालांकि अल फलाह यूनिवर्सिटी का मामला सामने आने पर यूजीसी और नैक संस्थाओं ने प्रशासन को नोटिस जारी कियें हैं। मगर समय रहते ये नोटिस कितने प्रभावी होगें यह आने वाला समय ही बतायेगा। फर्जी विश्वविद्यालयों के लगातार संचालन के साथ और भी कई विश्वविद्यालयों में भष्टाचार की खबरें लगातार आती हीं रहती हैं। मगर प्रभावी कार्यवाही न होने से ऐसे विश्वविद्यालयों के हौसले बुलंद ही रहते हैं। यही वजह है कि अल फलाह जैसी यूनिवर्सिटी का ढुलमुल आन्तरिक तन्त्र बाहर आकर सफेदपोश आतंक का ताडंव करने में नहीं हिचकता।
आज यूजीसी व अन्य नियामक संस्थाओं की भूमिका अब केवल शैक्षणिक गुणवत्ता और छात्र हितों की रक्षा करना ही नहीं रह गयी है। बल्कि हालिया प्रकाश में आये ज्वलंत मुद्दों के साथ में उच्च शिक्षा से जुड़े सेवानिवृत कुलपति, निदेशक, प्रोफेसर के साथ में विशेषज्ञीय आचार्याे को साथ लेकर एक प्रभावी व बहुपक्षीय सघन संवाद से परिपूर्ण निगरानी तन्त्र भी विकसित हो ताकि उच्च शिक्षा से जुड़ी इन संस्थाओं के कामकाज की लगातार जांच-पड़ताल होकर भावी छात्रों का भविष्य पूर्ण सुरक्षित किया जा सके।




