उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड
उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी जिले की रवांई घाटी से एक ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण खबर सामने आई है। नौगांव क्षेत्र के निवासी दिनेश रावत ने रवांल्टी भाषा का पहला व्यवस्थित शब्दकोश तैयार कर न सिर्फ अपनी मातृभाषा को नया जीवन दिया है, बल्कि लुप्त होती लोकभाषाओं के संरक्षण की दिशा में एक मिसाल भी कायम की है।
इस महत्वपूर्ण कृति का पूरा नाम “रवांल्टी शब्दकोश” है, जो हिंदी–रवांल्टी–अंग्रेजी का एक त्रिभाषी शब्दकोश है। यह शब्दकोश हिन्दी वर्णमाला के अनुसार अ से ह तक शब्दों को उनके रवांल्टी व अंग्रेजी अर्थों सहित संकलन है।

यह पुस्तक रवांई क्षेत्र की स्थानीय बोली रवांल्टी को केंद्र में रखते हुए उसके शब्दों, अर्थों और सांस्कृतिक संदर्भों को हिंदी और अंग्रेजी के साथ प्रस्तुत करती है।
शब्दों में सहेजी गई रवांई की आत्मा
दिनेश रावत की यह पुस्तक केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि रवांई घाटी के लोकजीवन, परम्पराओं, देवगाथाओं और सांस्कृतिक स्मृतियों का जीवंत दस्तावेज है। पुस्तक की अनुक्रमणिका से ही स्पष्ट हो जाता है कि पाठक को इसमें क्या-क्या अनमोल सामग्री मिलने वाली है।
इस शब्दकोश में—
• लोकजीवन और सामाजिक परम्पराएं
• स्थानीय देवालय, देवगाथाएं और लोकोत्सव
• खान-पान, रहन-सहन और कृषि से जुड़े शब्द
• प्रकृति, जंगल, पहाड़ और दैनिक जीवन की शब्दावली
को बेहद व्यवस्थित और प्रामाणिक रूप में संजोया गया है। लेखक ने हर शब्द के पीछे छिपे सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भ भी साझा किए हैं, जो इसे एक साधारण शब्दकोश से कहीं अधिक मूल्यवान बनाते हैं।
प्रस्तावना में छलकता मातृभूमि का प्रेम
पुस्तक की प्रस्तावना में दिनेश रावत का अपनी मातृभूमि रवांई के प्रति गहन प्रेम झलकता है। वे बताते हैं कि कैसे हिमालय की गोद में पली-बढ़ी यह बोली आधुनिकता की दौड़ में पीछे छूटने के खतरे से जूझ रही है। इसी चिंता और जिम्मेदारी ने उन्हें यह अभिनव पहल करने के लिए प्रेरित किया।
क्यों विशेष है यह शब्दकोश?
संरक्षण का प्रयास: विलुप्त होती क्षेत्रीय बोली को सुरक्षित करने का ठोस कदम
त्रिभाषी दृष्टिकोण: स्थानीय लोगों के साथ-साथ भाषाविदों, शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए उपयोगी
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा: अपनी लोकभाषा को वैज्ञानिक और व्यवस्थित ढंग से समझने का अवसर
केवल शब्दकोश नहीं, एक सांस्कृतिक आंदोलन
रवांल्टी शब्दकोश वास्तव में रवांई की जीवंत सांस्कृतिक आत्मा का दर्पण है। उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं और लोकसंस्कृति में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए यह पुस्तक अनिवार्य है। यह प्रयास भावी पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य विरासत साबित होगा।
लेखक दिनेश रावत का परिचय
दिनेश रावत उत्तराखण्ड की रवांई घाटी के सजग सांस्कृतिक संवाहक, संवेदनशील कवि, लेखक और समर्पित शिक्षक हैं। उनका जन्म 7 जून 1981 को उत्तरकाशी जिले के कोटी, बनाल गांव में हुआ। विज्ञान स्नातक के बाद उन्होंने इतिहास, समाजशास्त्र, शिक्षा शास्त्र में स्नातकोत्तर और बी.एड. की उपाधि प्राप्त की।

उनकी प्रमुख कृतियों में—
• रवांई के देवालय एवं देवगाथाएं
• रवांई क्षेत्र के लोकदेवता एवं लोकोत्सव
• माटी, तेरे जाने के बाद
• पहाड़ बनते पहाड़ (कविता संग्रह)
• का न हंदू (रवांल्टी कविता संग्रह)
• रवांल्टी शब्दकोश
शामिल हैं। जो निश्चित रूप से बताती हैं कि उनका रवांल्टी भाषा को लेकर कितना गहरा जुड़ाव है और वे इसे संरक्षित करने के लिए समर्पण भाव से जुटे हैं।
उन्हें राष्ट्रीय युवा पुरस्कार (2009), टीचर्स ऑफ द ईयर (2021), विज्ञान शिक्षा एवं प्रसार सम्मान (2022), देवभूमि उत्कृष्ट शिक्षा सम्मान (2023) सहित अनेक सम्मान प्राप्त हैं। वर्तमान में वे हरिद्वार के राजकीय प्राथमिक विद्यालय नंबर-4, ज्वालापुर में अध्यापन कर रहे हैं।
दिनेश रावत की यह कृति साबित करती है कि जब संकल्प, संवेदना और संस्कृति साथ चलते हैं, तो लोकभाषाएं सिर्फ बचती नहीं—बल्कि इतिहास रचती हैं।
रवांल्टी शब्दकोश रवांई घाटी की आवाज है, जो अब शब्दों के जरिए सदियों तक गूंजेगी।



