असंगठित होने से पराधीन हुए हम
हमें गत 1,000 वर्ष के इतिहास से पता चलता है कि हिंदू-समाज ने अपनी
असंगठित अवस्था के कारण सुख खोया, व्यक्ति खोए और दुर्बलता के
कारण पराधीन जीवन व्यतीत किया। उस समय हमारे महान श्रेष्ठ तत्त्वज्ञान को किसी ने
नहीं सुना। लोगों ने तब कहा कि पराभूत लोगों का तत्त्वज्ञान कौन सुने? यह विचार कर हमने
एक व्यावहारिक बात रखी कि हमारा हिंदू-समाज है, वह असंगठित है, छिन्न-विच्छिन्न
है। उसमें प्रांत के झगड़े भाषा के झगड़े, झगड़े ही झगड़े होते हैं और
उसपर स्वार्थ और भर गया है। भयंकर स्वार्थ फैल गया है। इन स्वार्थ और भेदों के
कारण उसमें दुर्बलता उत्पन्न हो गई है। अतः भेदों से ऊपर उठते हुए छिन्न-विच्छिन्न
हिंदू-समाज को राष्ट्रजीवन प्राप्त कराने के लिए एक सूत्र में सुसंगठित करना
चाहिए।
- श्री गुरूजी समग्र, खंड-2, प्रथम संस्करण, सुरुचि प्रकाशन, पृष्ठ 68




