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बिन पानी सब सून

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बिन पानी सब सून

पेयजल की कमी अब सिर्फ किताबी बातें और अखबारी खबर भर नहीं है। आप और हम, हर रोज एक गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रहे हैं। ये भी कहा जाता है कि दुनिया में तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा। केपटाउन में जब जल संकट से स्थिति बदतर हुई तो जल-संसाधनों की सुरक्षा के लिए सेना बुलानी पड़ी। लेकिन ऐसा नहीं कि ये जल संकट सिर्फ विदेशों का मामला है। हमारे देश में भी जल संकट से हालात गंभीर हो चुके हैं। देश के कई इलाकों में लोगों को अब पानी नहीं मिल पा रहा है। 

जल समस्या पर नीति आयोग की रिपोर्ट: आबादी लगातार बढ़ रही है, जबकि जल संसाधन सीमित हैं। अगर अभी भी हमने जल संरक्षण और उसके समान वितरण के लिए उपाय न किए, तो हालात बदतर हो जाएंगे। जल समस्या पर नीति आयोग के आंकड़े इस गंभीर होती समस्या की ओर इशारा कर रहे हैं - 

ऽ नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में विश्व की 17 प्रतिशत जनसंख्या रहती है, जबकि इसके पास विश्व के शुद्ध जल संसाधन का मात्र 4 प्रतिशत ही है।

ऽ किसी भी देश में अगर प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1,700 क्यूबिक मीटर से नीचे जाने लगे तो उसे जल संकट की चेतावनी और अगर 1,000 क्यूबिक मीटर से नीचे चला जाए, तो उसे जल संकटग्रस्त माना जाता है। भारत में यह फिलहाल 1,544 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति आ गया है, जिसे जल की कमी की चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

ऽ नीति आयोग ने यह भी बताया है कि उपलब्ध जल का 84 प्रतिशत खेती में, 12 प्रतिशत उद्योगों में और 4 प्रतिशत घरेलू कामों में उपयोग होता है।

ऽ हम चीन और अमेरिका की तुलना में एक इकाई फसल पर दो से चार गुना जल अधिक उपयोग करते हैं।

ऽ भूजल का लगभग 60 प्रतिशत सिंचाई के लिए उपयोग में लाया जाता है। 80 प्रतिशत घरेलू जल आपूर्ति भूजल से ही होती है। इससे भूजल का स्तर लगातार घटता जा रहा है।

दिल्ली का दर्द: देश की राजधानी दिल्ली का घटता जल स्तर लगातार चिंता उत्पन्न कर रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली की करीब 74 प्रतिशत भूमि से भूजल दोहन काफी हो रहा है। सिर्फ 14 प्रतिशत के आसपास जमीन में भूजल की स्थिति ठीक है। इसमें 62 फीसदी इलाकों में हालात खतरनाक स्थिति में पहुंच चुके हैं। अब वो समय नहीं रहा जब गर्मियों में पानी की समस्या की बात होती थी। दिल्ली में अब पूरे साल ये दर्द सताता है। यमुना दिल्ली में नदी नहीं, किसी गंदे नाले की तरह दिखती है। दिल्ली के जलाशय कहां लुप्त होते चले गए, किसी को याद नहीं। बड़े पैमाने पर जमीन से पानी निकालने की वजह से भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। दिल्ली एनसीआर के इलाके जैसे गुरुग्राम, फरीदाबाद और सोनीपत में भूजल स्तर काफी नीचे चला गया है। यहां डार्क जोन क्षेत्र बढ़ रहा है। राजधानी में भूजल दोहन अधिक होने के कारण दिल्ली के दो तिहाई से ज्यादा इलाके का भूजल खारा हो चुका है। 

दिल्ली में पानी की मांग बढ़कर 1380 एमजीडी (मिलियन गैलन प्रतिदिन) हो गई है। दिल्ली जल बोर्ड औसतन 953 एमजीडी पानी की आपूर्ति ही कर पाता है। 427 एमजीडी पानी की कमी बनी हुई है। 

गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर में भी भूजल स्रोत पर दबाव बढ़ा है। गाजियाबाद में प्रतिदिन करीब 850 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) पानी की जरूरत है। लेकिन फिलहाल करीब 400 एमएलडी पेयजल की ही आपूर्ति हो पा रही है। इसमें 95 एमएलडी गंगाजल शामिल है और बाकी भूजल है। खोड़ा व लोनी के कुछ इलाकों में पेयजल लाइन भी नहीं है।

नोएडा में 406 एमएलडी और ग्रेटर नोएडा में 210 एमएलडी पानी की मांग है। जलापूर्ति बहुत कम हो पाती है। शेष पानी की कमी भूजल से पूरी की जाती है। यहां भी कई इलाकों में भूजल स्तर नीचे गिर रहा है।

क्या है इलेक्ट्रिकल कंडेक्टिविटी (ईसी)? दिल्ली में 39.3 प्रतिशत इलाके में भूजल में इलेक्ट्रिकल कंडक्टेंस का स्तर तीन हजार (ईसी) माइक्रोसिमेंस प्रति सेंटीमीटर से अधिक है। 11 प्रतिशत इलाके के भूजल में इलेक्ट्रिकल कंडक्टेंस का स्तर 5000 माइक्रोसिमेंस प्रति सेंटीमीटर से भी अधिक है। इस वजह से इन इलाकों के पानी में नमक की मात्रा अधिक है। पानी में ईसी का स्तर पानी में नमक की मौजूदगी, गंध और स्वाद को व्यक्त करता है। पानी में ईसी का स्तर 1500 माइक्रोसिमेंस  प्रति सेंटीमीटर से कम हो तो उसे साफ माना जाता है। यदि इलेक्ट्रिकल कंडक्टेंस का स्तर 1500 से अधिक हो तो उसे खारा माना जाता है। इस मानक के अनुसार 68 प्रतिशत इलाके का भूजल खारा हो चुका है। सिर्फ 32 प्रतिशत इलाके में भूजल साफ है।

धंस रही है दिल्ली की जमीन: दिल्ली में तेजी से गिरता भूजल स्तर एक दूसरी गंभीर समस्या को जन्म दे रहा है। दिल्ली में जमीन धंसने की आहट आने लगी है। मकानों की दीवारों में दरार आना आम समस्या बनने लगी है। एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में जमीन धंसने के कारण इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को गंभीर खतरा हो सकता है। आईआईटी बॉम्बे, जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जिओ साइंसेज, यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज और सदर्न मेथोडिस्ट यूनिवर्सिटी, अमेरिका के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में ये बात सामने आयी थी कि दिल्ली-एनसीआर के 100 किलोमीटर के दायरे में भूजल के बढ़ते दोहन के कारण जमीन धंसने का बड़ा खतरा पैदा हो गया है। इसमें 12.5 वर्ग किमी का इलाका कापसहेड़ा का है जो आईजीआई हवाई अड्डे से महज 800 मीटर के फासले पर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस तेजी से जमीन धंसने का दायरा बढ़ रहा है, उससे जल्द ही एअरपोर्ट भी इसकी जद में आ जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2016 से लेकर 2018 के बीच जमीन धंसने की रफ्तार में 50 प्रतिशत का इजाफा हो गया। 2016 में जमीन धंसने की दर प्रति वर्ष 11 सेंटीमीटर थी जो 2018 में बढ़कर 17 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष हो गयी। सैटेलाइट से मिली तस्वीरें साफ दिखाती हैं कि दिल्ली के जिन इलाकों में जमीन धंसने की रफ्तार तेज है वहां भूजल का दोहन भी ज्यादा हो रहा है। 

जर्नल साइंस में प्रकाशित एक अन्य शोध से पता चला है कि भूजल के अनियंत्रित दोहन के कारण जिस तरह से जमीन धंस रही है, उसका खामियाजा दुनिया की 19 फीसदी आबादी को झेलना होगा। इसमें भारत, चीन, ईरान और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल होंगें। अनुमान है कि इससे 63.5 करोड़ लोग प्रभावित होंगें, इसका सबसे ज्यादा असर एशिया में देखने को मिलेगा। रिसर्च के मुताबिक दुनिया के 34 देशों में 200 से ज्यादा जगह पर भूजल के अनियंत्रित दोहन के कारण जमीन धंसने के सबूत मिले हैं। 

भूजल स्तर घटने के कारण: भारत में पानी की कमी के कई कारण हैं। तेजी से शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण जल निकायों में प्रदूषण बढ़ गया है, जिससे वे उपभोग के लिए अनुपयुक्त हो गए हैं। इसके अतिरिक्त, अकुशल कृषि पद्धतियों और अत्यधिक भूजल दोहन ने महत्वपूर्ण जल स्रोतों को खत्म कर दिया है। जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है, जिससे वर्षा पैटर्न अनियमित हो गया है और नदियों और जलभरों के पुनर्भरण पर असर पड़ा है। खराब जल प्रबंधन और उचित बुनियादी ढांचे की कमी भी संकट को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

  भारत में कृषि क्षेत्र जल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जो कुल जल उपयोग में लगभग 85 फीसदी हिस्सेदारी रखता है। अधिकांश सिंचाई विधियां पुरानी और बेकार हो गई हैं, जिसके परिणामस्वरूप निम्न जल उत्पादकता और उच्च जल हानि की स्थिति बनती है। इसके अलावा, गन्ना, कपास और धान जैसी ज्यादा पानी की खपत वाली फसलों की खेती गिरते जल स्तर वाले क्षेत्रों में अब भी लगातार जारी है।

भूजल का अत्यधिक दोहन - सिंचाई, औद्योगिक क्षेत्र और घरेलू उद्देश्यों के लिए भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण जलभरों का हा्रस हुआ है। ये धरातल की सतह के नीचे चट्टानों का एक ऐसा स्तर है जहां भूजल एकत्रित होता है। यहां से इसे नलकूपों से निकाला जा सकता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपने भूजल संसाधनों का खतरनाक दर से अत्यधिक दोहन कर रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड ने जून 2022 में बताया कि पंजाब का ऊपरी 100 मीटर का भूजल वर्ष 2029 तक समाप्त हो जाएगा।

भूजल संरक्षण के उपाय: सभी रिपोर्ट्स इस बात को चीख-चीखकर कह रही हैं कि यदि आज हम जल-संसाधन का उचित प्रबंधन नहीं कर पाते हैं तो भावी पीढ़ी जल के एक-एक बूंद के लिए तरस जाएगी। जल संकट को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाने की सख्त आवश्यकता है। इस संकट के निवारण हेतु हमें तीन स्तरों पर विचार करना होगा। पहला यह कि अब तक हम जल का उपयोग किस तरह से करते आ रहे थे? दूसरा यह कि भविष्य में इसका उपयोग कैसे करना है? और तीसरा एवं सबसे आखिरी यह कि जल संरक्षण हेतु क्या कदम उठाए जाने चाहिए? 

अति-उपभोग को कम करना: जल की कमी का एक मुख्य कारण कृषि, उद्योग और घरों जैसे विभिन्न क्षेत्रों में जल का अत्यधिक एवं अकुशल उपयोग है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रिमोट सेंसिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर जल की खपत का अधिक प्रभावी ढंग से मापन और इसका प्रबंधन किया जा सकता है। 

 जल दक्षता में सुधार लाना: जल की कमी को दूर करने का एक अन्य तरीका जल प्रणालियों और अवसंरचना (जैसे वितरण नेटवर्क, उपचार संयंत्र और भंडारण सुविधा) के प्रदर्शन में सुधार लाना हो सकता है। जल रिसाव की मरम्मत करने, हानि को कम करने और उपकरणों को अपग्रेड करने के माध्यम से जल की बर्बादी को कम किया जा सकता है तथा जल की गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकता है।

जल स्रोतों का विस्तार करना: जल के वैकल्पिक या अतिरिक्त स्रोतों का पता लगाया जाना चाहिये और इसके लिए वर्षा जल संचयन (तंपदूंजमत ींतअमेजपदह), जल का पुनः उपयोग जैसे उपायों की दिशा में प्रयास किया जाना चाहिये। उदाहरण के लिए, अलवणीकरण से तटीय क्षेत्रों में पेयजल और सिंचाई के लिए समुद्री जल को मीठे जल में परिवर्तित किया जा सकता है।

जल संसाधनों की रक्षा करना: नदी, झील, आर्द्रभूमि, वन एवं मृदा जैसे प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना और उन्हें पुनर्स्थापित करना, जो जल प्रदान करने और उनके विनियमन में योगदान करते हैं। 

जल नीतियों में सुधार लाना: जल प्रबंधन और आवंटन को नियंत्रित करने वाली नीतियों एवं संबद्ध संस्थानों में सुधार किया जाए। इसमें जल के उपयोग, मूल्य निर्धारण और संरक्षण के लिए स्पष्ट नियम एवं प्रोत्साहन तय करना; हितधारकों की भागीदारी एवं सहयोग को बढ़ावा देना; निगरानी एवं प्रवर्तन बढ़ाना; और जल संबंधी मुद्दों को व्यापक विकास योजनाओं में एकीकृत करना शामिल है।

सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का प्रयोग करना: ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसे अभ्यासों का उपयोग कर न केवल जल की खपत को कम किया जा सकता है बल्कि उत्पादकता भी बढ़ाई जा सकती है।

बिन पानी सब सून। जल का समानार्थी अर्थ अमृत है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसलिए इस समस्या पर सबको मिलकर पहल करने की जरूरत है। इस समस्या को सरकार के भरोसे छोड़कर गहरी नींद में सो जाने से इसका समाधान नहीं निकलने वाला है। इसके लिए सामूहिक पहल की जरूरत है। यानी सरकार के साथ-साथ सामाजिक पहल भी आवश्यक है। इसलिए हम जल संरक्षण पर किसी एक विशेष दिन बात करने की जगह अब प्रतिदिन जल संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझें और अपनी हिस्सेदारी निभाएं तभी इस समस्या का समाधान होगा।


लेखक जनसंचार विभाग टेक्निया इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज आईपी यूनिवर्सिटी, दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर है।