भारत-नेपाल सीमा के पास बसे पिथौरागढ़ के एक छोटे से गांव में लक्ष्मी मेहता स्व-रोजगार की नई कहानी लिख रही हैं। कुछ वर्षों पहले तक वे भी घर और बच्चों की जिम्मेदारियों में व्यस्त थीं। लेकिन उन्होंने ठान लिया कि कुछ अपना करना है।
कोरोना के बाद जब हालात मुश्किल हुए, तब लक्ष्मी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने गांव में मत्स्य पालन, पोल्ट्री फार्म और ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत की। धीरे-धीरे उनका काम बढ़ता गया। आज उनके पास जिनसे उन्हें अच्छी आमदनी होने लगी है।
सबसे खास बात यह है कि लक्ष्मी की पहल से गांव की दूसरी महिलाएं भी जुड़ने लगीं। अब वे मिलकर काम कर रही हैं और आत्मनिर्भर बनने की राह पर आगे बढ़ रही हैं।
लक्ष्मी मेहता की यह कहानी बताती है कि अगर इरादा मजबूत हो, तो सीमाओं के किनारे से भी सफलता की नई शुरुआत हो सकती है।



