भोपाल
संत शिरोमणि रविदास जी की 650वीं
जयंती के अवसर पर रवीन्द्र भवन में विराट श्रम साधक संगम का आयोजन हुआ। समाज के
विभिन्न क्षेत्रों में श्रम के माध्यम से अपनी आजीविका चलाने वाले एक हजार से अधिक
श्रम साधकों और समाजजनों की उपस्थिति में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने श्रम की प्रतिष्ठा, सामाजिक समरसता, परस्पर
सहयोग और समाज के प्रति दायित्व को लेकर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने कहा कि
समाज की वास्तविक शक्ति तभी सामने आती है, जब उसके
प्रत्येक वर्ग को सम्मान, सहभागिता
और आगे बढ़ने का अवसर मिले।
कार्यक्रम में मध्यभारत प्रांत
के संघचालक अशोक पांडेय जी, भोपाल
विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर जी मंचासीन रहे।
52 प्रकार
के श्रम कार्यों तक पहुंचने से शुरू हुआ मिलन का उपक्रम
कार्यक्रम में श्रम साधक कार्य
का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए विक्रम सिंह ने बताया कि समाज का कोई भी वर्ग
वंचित न रहे, इसी उद्देश्य से श्रम साधकों के बीच
संपर्क और संवाद का कार्य प्रारंभ किया गया। इसके लिए समाज में विभिन्न प्रकार के
श्रम से जुड़े लोगों की सूची तैयार की गई, जिसमें
कुल 52 प्रकार के कार्य सामने आए।
उन्होंने बताया कि इन सभी श्रम साधकों तक निरंतर पहुंच बनाने के लिए मिलन की व्यवस्था विकसित की गई। वर्तमान में भोपाल में लगभग 40 श्रम साधक मिलन संचालित हो रहे हैं। इन मिलनों का उद्देश्य केवल लोगों को एक स्थान पर एकत्र करना नहीं, बल्कि उनके बीच आत्मीय संबंध विकसित करना, एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनना और समाज के प्रति अपने दायित्व की भावना को मजबूत करना है। संत शिरोमणि रविदास जी की 650वीं जयंती का अवसर श्रम और सामाजिक समरसता के प्रयास को व्यापक रूप से सामने रखने का विशेष अवसर बना है। उनके जीवन में श्रम, साधना, समानता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का जो संदेश दिखाई देता है, वही इस पूरे उपक्रम की प्रेरणा का आधार है।
मिलन
केवल मिलने या मनोरंजन का माध्यम नहीं
श्रम साधक मिलन से जुड़े अवतार
सिंह और रामस्वरूप ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि इन मिलनों का
उद्देश्य केवल एक-दूसरे से मिलना अथवा मनोरंजन करना नहीं है। मिलन के माध्यम से
श्रम साधक एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते हैं और अपने कार्य के प्रति निष्ठा
को मजबूत करते हैं। मिलन के दौरान समाज के सामने मौजूद अनेक व्यावहारिक चुनौतियों
पर भी चर्चा होती है। श्रम साधकों को व्यसन से दूर रहने के लिए प्रेरित करना, परिवार और बच्चों के भविष्य की चिंता करना तथा एक-दूसरे के
साथ आवश्यकता के समय खड़े होना भी संपर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनके अनुसार, जब लोगों के बीच केवल औपचारिक संपर्क न रहकर आत्मीयता का
संबंध बनता है, तब समाज में सहयोग की वास्तविक भावना
विकसित होती है। यही संबंध आगे चलकर व्यापक सामाजिक परिवर्तन की भूमिका तैयार कर
सकता है।
हमारे
संतों ने कर्म को पूजा माना – सरकार्यवाह
सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले
जी ने कहा कि हमारे संतों ने कर्म को पूजा माना है। शरीर से किया जाने वाला श्रम
भी आराधना का ही एक रूप है। पूजा केवल मंदिर में जाकर किसी देवता के सामने पुष्प
अर्पित करने तक सीमित नहीं है। यदि व्यक्ति अपने कर्म को पूरी निष्ठा, शुद्ध मन और आराधना के भाव से करता है तो वही कर्म पूजा का
रूप ले लेता है।
धर्म का संबंध केवल किसी विशेष
कार्य अथवा सामाजिक पहचान से नहीं है। व्यक्ति जो कर्म कर रहा है, उसे पूरे मन, निष्ठा
और कर्तव्यबोध के साथ करना ही धर्म का महत्वपूर्ण स्वरूप है। उन्होंने कहा कि कर्म
की महानता उसके बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि
उसे करने वाले व्यक्ति की दृष्टि और निष्ठा से निर्धारित होती है। समाज में कोई
कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। कार्य के प्रति निष्ठा, मन की शुद्धता और व्यवहार की श्रेष्ठता ही व्यक्ति को महान
बनाती है।
उन्होंने महर्षि वेदव्यास का
उदाहरण देते हुए कहा कि महानता जन्म या पेशे से निर्धारित नहीं होती। मछुआरे
परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्ति भी अपने कर्म और ज्ञान से महर्षि वेदव्यास बन
सकते हैं। इसलिए समाज में किसी व्यक्ति को उसके कार्य के आधार पर छोटा समझना
दृष्टि का दोष है।
उन्होंने कहा कि समाज में
ऊंच-नीच का जो दोष आया है, उसे सही
दृष्टि और सही समन्वय के माध्यम से दूर करना होगा। इसके लिए समाज के विभिन्न
वर्गों के बीच आत्मीयता बढ़ाना आवश्यक है। श्रम साधक मिलन इसी दिशा में एक छोटा
लेकिन महत्वपूर्ण उपक्रम है।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति
दूसरे व्यक्ति के जीवन,
उसके श्रम और उसकी परिस्थितियों
को समझता है, तो दूरी कम होती है और आत्मीयता बढ़ती
है। सामाजिक समरसता केवल भाषणों से नहीं बनती। इसके लिए लोगों को एक-दूसरे के जीवन
से जुड़ना पड़ता है। उन्होंने सृष्टि और समाज की संरचना का उदाहरण देते हुए कहा कि
सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने की, लेकिन
जीवन जीने के लिए आवश्यक संसाधनों की पूर्ति और निर्माण का कार्य विश्वकर्मा जी से
जुड़ा हुआ है। इससे यह स्पष्ट होता है कि निर्माण और श्रम भारतीय चिंतन में सदैव
सम्मानित रहे हैं।
सरकार्यवाह जी ने कहा कि हम सभी
राष्ट्रांगभूत हैं, अर्थात राष्ट्र के अंग हैं। राष्ट्र
केवल किसी भू-भाग का नाम नहीं है। यह करोड़ों लोगों के जीवन, श्रम, संस्कार, संबंध और दायित्व से मिलकर बनता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति
की राष्ट्र के प्रति भूमिका और जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि संघ की शाखा और
मिलन जैसे उपक्रम इसी राष्ट्रांगभूता के भाव को मजबूत करने का काम करते हैं। जब
व्यक्ति स्वयं को समाज और राष्ट्र से अलग नहीं, बल्कि
उसका अभिन्न अंग मानता है, तब उसके
भीतर अपने से आगे बढ़कर समाज के लिए कुछ करने की भावना पैदा होती है।
उन्होंने कहा कि इस दृष्टि से
शरीर को स्वस्थ रखना,
परस्पर सहयोग करना, अपने परिवार को संस्कारित बनाना और समाज के कमजोर वर्गों के
साथ खड़ा होना सभी नागरिकों का दायित्व है।
सरकार्यवाह जी ने कहा कि मिलन
अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है। यह मिलने की शुरुआत है। जब लोग नियमित रूप से
मिलते हैं तो परिचय संबंध में और संबंध आत्मीयता में बदलता है। यही आत्मीयता आगे
चलकर समाज में सकारात्मक बदलाव का माध्यम बन सकती है।
उन्होंने कहा कि समाज के जिन
लोगों के पास संसाधन हैं और जिनके पास उनकी कमी है, उनके बीच
समन्वय आवश्यक है। समाज के समर्थ वर्ग अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करें और जिन
लोगों को आवश्यकता है,
वे भी अपने आत्मविश्वास और
परिश्रम को बनाए रखें। दोनों के बीच सहयोग की यह प्रक्रिया समाज को मजबूत बनाती
है।
उन्होंने इस संदर्भ में गुजरात
में पड़े अकाल के समय संघ स्वयंसेवकों द्वारा किए गए सेवा कार्य का उदाहरण सुनाया।
उन्होंने बताया कि अकाल प्रभावित क्षेत्रों में सेवा प्रकल्प चलाए गए और लंबे समय
तक सुरक्षित रहने वाली सुखड़ी बनाकर वहां पहुंचाने की व्यवस्था की गई। इसके लिए
समाज से सामग्री एकत्र की जा रही थी। इसी दौरान एक वृद्ध महिला सेवा केंद्र पर आई
और अपने पास से सुखड़ी देकर चली गई। उसके पास देने के लिए बहुत अधिक संसाधन नहीं
थे, लेकिन उसने समाज और राष्ट्र के प्रति
अपने दायित्व को समझते हुए अपनी क्षमता के अनुसार योगदान किया। यह घटना बताती है
कि समाज के प्रति दायित्व केवल उन लोगों का नहीं है, जिनके
पास अधिक संसाधन हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार समाज के लिए कुछ कर
सकता है।
उन्होंने कहा कि समाज में किसी
व्यक्ति की वर्तमान स्थिति को देखकर उसके भविष्य की सीमा निर्धारित नहीं की जा
सकती। एक श्रमिक का बच्चा वैज्ञानिक बन सकता है और चमड़े का काम करने वाले परिवार
में जन्म लेने वाला बच्चा संत बन सकता है। इसलिए व्यक्ति के कर्म, मन, वाणी और
व्यवहार में ऐसी दृष्टि होनी चाहिए, जिसमें
सामने वाले व्यक्ति की संभावनाओं को स्वीकार किया जाए।
उन्होंने कहा कि परिवार और समाज
का वातावरण ऐसा होना चाहिए, जिसमें
प्रत्येक बच्चे को आगे बढ़ने का अवसर मिले। आर्थिक परिस्थितियां किसी बच्चे की
अंतिम पहचान नहीं होनी चाहिए। यदि समाज मिलकर सहयोग करे तो श्रम साधकों के
परिवारों के बच्चे शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं, प्रोफेसर, वैज्ञानिक
और अन्य क्षेत्रों में विशेषज्ञ बन सकते हैं।
निर्बल
के बल राम
सरकार्यवाह जी ने कहा कि श्रम
साधना करने वाले लोग कई बार सामाजिक दृष्टि से निर्बल हो जाते हैं। ऐसे में प्रश्न
उठता है कि निर्बल का बल कौन बनेगा। उन्होंने कहा, “निर्बल
के बल राम”। यहां राम का अर्थ समाज की सामूहिक शक्ति से है। समाज के जो लोग किसी
रूप में सक्षम हैं, उन्हें आगे आकर निर्बल व्यक्ति का
सहारा बनना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी समाज की
वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने कमजोर हिस्से के साथ कैसा व्यवहार
करता है। समाज के कमजोर हिस्से पर ही अनेक प्रकार की समस्याओं का प्रभाव सबसे पहले
और सबसे अधिक पड़ता है। इसलिए समाज के कमजोर वर्ग को भी मजबूत बनाना आवश्यक है।
श्रम साधकों को केवल सहायता
प्राप्त करने वाले वर्ग के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है। वे स्वयं भी समाज
की शक्ति हैं। आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें अवसर, सम्मान, सहयोग और
आगे बढ़ने का वातावरण मिले।
श्रम की
प्रतिष्ठा हर स्तर पर आवश्यक
दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा
कि समाज में श्रम की प्रतिष्ठा बढ़नी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में
किसी न किसी रूप में शारीरिक श्रम करना चाहिए। शरीर से श्रम करना केवल आर्थिक
आवश्यकता नहीं, बल्कि जीवन और समाज के संतुलन के लिए
भी आवश्यक है। किसी सभ्यता के लिए यह उचित नहीं है कि उसका एक बड़ा वर्ग श्रम से
दूर होता चला जाए और श्रम को केवल कुछ लोगों का काम मान लिया जाए। शरीर से काम
करने वाले और मस्तिष्क से काम करने वाले दोनों राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के समान
रूप से महत्वपूर्ण अंग हैं।
उन्होंने भारतीय राष्ट्र की
अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह देश एक जीवंत राष्ट्रपुरुष के समान है, जिसके हजारों नेत्र और लाखों हाथ हैं। कोई अपने मस्तिष्क से
काम करता है तो कोई अपने हाथों से। दोनों मिलकर राष्ट्र की जीवन-व्यवस्था को चलाते
हैं। इसलिए किसी के कार्य को कमतर समझने का कोई आधार नहीं है।
उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की
मूल दृष्टि में श्रम करने वाले व्यक्ति को हीन मानने की भावना नहीं रही है। समाज
में बाद में जो ऊंच-नीच की प्रवृत्तियां आईं, उन्हें
दूर करने के लिए सामाजिक दृष्टि को बदलने की आवश्यकता है।
उन्होंने यूरोप के सामाजिक
इतिहास में दिखाई देने वाले ‘नौबल्स’ और ‘कॉमन्स’ जैसे विभाजनों का उल्लेख करते
हुए कहा कि भारत में समाज को इस प्रकार के स्थायी वर्ग विभाजन के आधार पर देखने की
परंपरा नहीं रही। भारतीय दृष्टि में व्यक्ति के कर्म, गुण और आचरण का महत्व रहा है।
उन्होंने कहा कि इसलिए आज
आवश्यकता इस बात की है कि समाज में श्रम की प्रतिष्ठा पुनः मजबूत हो और प्रत्येक
व्यक्ति दूसरे के काम को सम्मान की दृष्टि से देखे।
शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार में सहयोग की जरूरत
सरकार्यवाह जी ने कहा कि
सामाजिक समरसता का अर्थ केवल सामाजिक संपर्क नहीं है। समाज के जिन वर्गों को
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों की
आवश्यकता है, उनके लिए व्यावहारिक सहयोग की व्यवस्था
भी विकसित करनी होगी।
उन्होंने कहा कि ऐसे क्षेत्रों
में चिकित्सा की कुछ व्यवस्था, बच्चों
के लिए ट्यूशन और शिक्षा की सुविधा तथा रोजगार के साधन उपलब्ध कराने की दिशा में
काम किया जा सकता है। जिनके पास संसाधन और क्षमता है तथा जिनके पास इनकी कमी है, उनके बीच समन्वय स्थापित करने से समाज की सामूहिक शक्ति
बढ़ेगी।
समाज के
प्रति दायित्व आर्थिक स्थिति से निर्धारित नहीं होता
उन्होंने कहा कि समाज के प्रति
दायित्व केवल आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति का नहीं है। आर्थिक स्थिति चाहे जैसी हो, प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर समाज के लिए योगदान कर सकता
है।
स्वतंत्रता आंदोलन के उदाहरणों
का उल्लेख करते हुए कहा कि अनेक ऐसे लोग थे, जिनके
पास स्वयं बहुत साधन नहीं थे, लेकिन
देश के लिए उनके मन में गहरी प्रतिबद्धता थी। उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल का
उदाहरण देते हुए कहा कि वे आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहे थे और अपनी मां के इलाज
के लिए भी उनके पास पर्याप्त धन नहीं था, फिर भी
उनके भीतर राष्ट्र के लिए कुछ करने का संकल्प था।
उन्होंने कहा कि समाज को मजबूत
बनाने के लिए आर्थिक सामर्थ्य के साथ-साथ कर्तव्यबोध भी आवश्यक है। समाज के प्रति
जिम्मेदारी की भावना ही व्यक्ति को अपनी सीमित क्षमता में भी योगदान करने के लिए
प्रेरित करती है।
नशामुक्ति
और महिला सुरक्षा भी सामाजिक दायित्व
उन्होंने कहा कि समाज को मजबूत
बनाने के प्रयासों में केवल आर्थिक सहयोग पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि
श्रम साधक और उनके परिवार नशे जैसी समस्याओं के शिकार न हों। समाज के कमजोर वर्गों
को ऐसी प्रवृत्तियों से बचाना भी सामूहिक दायित्व है।
महिला सुरक्षा को भी समाज की
मजबूती से जोड़ते हुए कहा कि समाज का प्रत्येक वर्ग सुरक्षित और सम्मानपूर्ण
वातावरण में जीवन जी सके, यह
आवश्यक है। यदि समाज के किसी कमजोर हिस्से पर संकट आता है तो उसका प्रभाव पूरे
समाज पर पड़ता है। इसलिए समाज के कमजोर हिस्से को मजबूत करना पूरे समाज को मजबूत
करने के समान है।
उन्होंने कहा कि सामाजिक
परिवर्तन की शुरुआत परिवार से होती है। परिवारों को संस्कारित बनाना और बच्चों के
भविष्य के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना आवश्यक है। श्रम साधकों के परिवारों के बच्चे
भी शिक्षा और प्रतिभा के बल पर जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। किसी बच्चे की प्रतिभा
उसकी पारिवारिक या आर्थिक पृष्ठभूमि से तय नहीं होती। उचित अवसर और प्रोत्साहन
मिलने पर वह प्रोफेसर,
वैज्ञानिक या किसी भी क्षेत्र
में अपनी पहचान बना सकता है। इसलिए समाज को ऐसे अवसरों के निर्माण में अपनी भूमिका
निभानी चाहिए।
संत
रविदास जी का जीवन ही उनका संदेश
संत शिरोमणि रविदास जी की 650वीं जयंती के संदर्भ में दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि यह
अवसर विशेष है। भारतीय परंपरा में संत रविदास जी का स्मरण केवल एक ऐतिहासिक
व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि
सामाजिक समरसता और कर्मनिष्ठ जीवन के प्रेरक के रूप में किया जाता है। संघ में
एकात्मता स्तोत्र में भी प्रतिदिन संत रविदास जी का स्मरण किया जाता है।
उन्होंने कहा कि संत रविदास जी
ने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि
अपने जीवन में कथनी और करनी की एकरूपता का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनका संदेश उनके
जीवन में दिखाई देता है और उनका जीवन ही उनके संदेश का प्रमाण है। उनके जीवन में
अनेक गुणों का समुच्चय दिखाई देता है, जिसके
कारण वे समाज के लिए वंदनीय और प्रेरणास्रोत बने। संत रविदास जी की जयंती पर श्रम
साधकों का यह संगम इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि उनके जीवन में श्रम और साधना
का जो संबंध दिखाई देता है, वह आज भी
समाज के लिए प्रासंगिक है।
शरीर से
श्रम करना भी पूजा है
उन्होंने पुनः स्पष्ट किया कि
पूजा का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। जब व्यक्ति अपने शरीर से
श्रम करता है और उस श्रम को आराधना के भाव से करता है तो वह भी पूजा का स्वरूप बन
जाता है।
उन्होंने कहा कि कर्म करते समय
हमारी दृष्टि क्या है,
यही तय करती है कि वह कर्म
हमारे लिए केवल आजीविका है या साधना भी। यदि व्यक्ति अपने काम को पूरी निष्ठा, ईमानदारी और आराधना के भाव से करता है तो उसके श्रम का
सामाजिक मूल्य भी बढ़ता है और स्वयं उसके जीवन में भी गरिमा आती है। इसीलिए समाज
में यह भाव विकसित होना चाहिए कि कोई काम छोटा नहीं है। काम को छोटा-बड़ा मानना
दृष्टि का दोष है। श्रम करने वाले व्यक्ति का सम्मान और श्रम की प्रतिष्ठा किसी भी
स्वस्थ समाज की आवश्यक शर्त है।
सरकार्यवाह जी ने कहा कि
राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाने का कार्य किसी एक व्यक्ति या किसी एक वर्ग का
नहीं हो सकता। इसमें समाज के प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका है। जो व्यक्ति जिस
क्षेत्र में है, वह वहीं से राष्ट्र के लिए योगदान दे
सकता है।
श्रम साधक मिलन के पीछे भी यही
भावना है कि लोगों में अपने कार्य के प्रति निष्ठा हो, समाज के प्रति आत्मीयता हो और व्यक्ति अपने कर्म को ईमानदारी
से करे। कौन क्या काम करता है, यह अकेला
महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वह अपने कर्म के प्रति कितना निष्ठावान
है और अपने जीवन में धर्म तथा कर्तव्य के मूल्यों को कितना स्थान देता है। समाज के
विभिन्न वर्गों को साथ लेकर चलने, एक-दूसरे
के प्रति सम्मान बढ़ाने और कमजोर वर्गों को मजबूत बनाने के प्रयास निरंतर चलते
रहने चाहिए। इसी प्रक्रिया से समाज में स्थायी परिवर्तन की जमीन तैयार होती है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित श्रम साधकों और समाजजनों ने सामाजिक समरसता, श्रम की प्रतिष्ठा तथा राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को लेकर सामूहिक भावना के साथ सहभागिता की। कार्यक्रम का समापन कल्याण मंत्र के साथ हुआ।



