जयपुर,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर में श्री गुरु गोविंदसिंह चेयर
फॉर नेशनल इंटीग्रेशन एंड सिक्ख स्टडीज तथा भारतीय अभ्युत्थान समिति संयुक्त
तत्वाधान में गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी वर्ष
के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में कहा कि औरंगजेब की सोच थी कि भारतीयों को
कष्ट देकर और उन्हें सताने से वे अपना धैर्य खो देंगे तथा धर्म छोड़ देंगे, लेकिन
धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर के बलिदान ने उसके सभी मंसूबों को विफल कर
दिया। गुरुजी के सामने उनके शिष्यों को एक-एक कर यातनाएं देकर शहीद किया गया, लेकिन
वे अपने धर्म और संकल्प से विचलित नहीं हुए।
उन्होंने गुरु तेग बहादुर की शहादत का प्रसंग बताते हुए कहा कि दिल्ली में जहां आज शीशगंज गुरुद्वारा है, वहीं गुरुजी की शहादत हुई। उनके सामने भाई मतीदास, भाई सतीदास और भाई दयाला को एक-एक कर शहीद किया गया। औरंगजेब को उम्मीद थी कि अपने साथियों को इस तरह कष्ट में मरते देखकर गुरुजी विचलित हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गुरुजी का शीश भाई जैता आनंदपुर साहिब लेकर पहुंचे, जबकि लखी शाह बंजारा ने गुरुजी के शरीर का संस्कार अपने घर को ही अग्नि देकर किया। यह केवल शहादत की घटना नहीं, बल्कि धर्म और सिद्धांत के लिए अडिग रहने की असाधारण इच्छाशक्ति का उदाहरण है।
डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि गुरु तेग बहादुर के बलिदान को समझने के
लिए गुरु नानक देव से शुरू हुई उस परंपरा को समझना होगा, जिसने
समाज को आध्यात्मिक आधार पर एकजुट करने का प्रयास किया। गुरु नानक देव ने देश के
विभिन्न हिस्सों की यात्राएं कीं और लोगों को भक्ति, प्रेम, करुणा, सहिष्णुता
तथा मिल-जुलकर रहने का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि गुरु नानक देव जहां भी गए, वहां लोगों को यह संदेश दिया कि परिश्रम से काम करो, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा से जीवन जियो, भगवान के प्रति भक्ति रखो और सभी के भीतर एक ही ईश्वर को देखो।
जाति, भाषा और क्षेत्र की विविधताओं के ऊपर एकता का संदेश
उन्होंने कहा कि भारत में अनेक भाषाएं, जातियां, परंपराएं
और सामाजिक विविधताएं हैं, लेकिन इनके भीतर एक गहरी आध्यात्मिक
एकता है। गुरु नानक देव ने इसी एकत्व को सामने लाने का प्रयास किया। विविधता बाहर
की है, जबकि भीतर की एकता स्थायी है। जब एकत्व और प्रेम का भाव आता है तो
संघर्ष अपने आप समाप्त होने लगता है। गुरु नानक देव ने जाति, वर्ण, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित
और अलग-अलग क्षेत्रों के भेद से ऊपर उठकर सभी के भीतर एक ही ईश्वर की ज्योति देखने
का संदेश दिया। उन्होंने सामाजिक बुराइयों और भेदभाव को दूर करने का भी आह्वान
किया।
उन्होंने कहा कि गुरु नानक देव ने अनावश्यक कर्मकांडों से अधिक उसके
पीछे छिपे आध्यात्मिक उद्देश्य पर जोर दिया। माला जपना, भजन-कीर्तन, तीर्थ
यात्रा या पूजा – इन सभी का अंतिम उद्देश्य मन को निर्मल करना है। मन से घृणा, लोभ, असत्य
और क्रूरता दूर हो तथा सभी के प्रति प्रेम का भाव पैदा हो, यही
आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य है।
उन्होंने कहा कि इसी आध्यात्मिक जागरण की परंपरा में गुरु हरगोविंद
ने धर्म की रक्षा का संकल्प लिया और आगे गुरु तेग बहादुर ने धर्म की रक्षा के लिए
आत्मबलिदान दिया। इसी कारण गुरु तेग बहादुर को ‘हिंद की चादर’ कहा जाता है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रूपिंदर सिंह ने
गुरुओं की शिक्षाओं को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया। उन्होंने गुरु तेग
बहादुर के करुणा और प्रेम के सिद्धांतों के माध्यम से सामाजिक समरसता और एकता को
मजबूत करने पर बल दिया।
विशिष्ट अतिथि राजस्थान विश्वविद्यालय की कुलगुरु डॉ. अल्पना कटेजा
ने गुरु परंपरा को भारत की महान विरासत बताते हुए विश्व एकता के लिए गुरुओं की
शिक्षाओं के महत्व को रेखांकित किया।
कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ से हुई। इस अवसर पर गुरु तेग बहादुर के जीवन पर आधारित संक्षिप्त एनिमेटेड डॉक्युमेंट्री का प्रदर्शन भी किया गया। भारतीय अभ्युत्थान समिति के अध्यक्ष डॉ. रमेश चंद्र अग्रवाल ने सभी अतिथियों और उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया।



