मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और भारत निर्वाचन आयोग को मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर राजनीतिक आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन नारों, अफवाहों और सोशल मीडिया पर चल रही बातों को मानने से पहले हमें SIR की प्रक्रिया और उसके संवैधानिक आधार को समझना चाहिए।
SIR क्यों जरूरी है?
भारत की चुनाव व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत वयस्क
मताधिकार पर आधारित है।
मतदाता बनने के लिए व्यक्ति का:
-भारतीय नागरिक होना,
-कम से कम 18 वर्ष का होना,
-संबंधित निर्वाचन क्षेत्र में सामान्य रूप से रहना,
-और कानून के तहत अयोग्य घोषित न होना जरूरी है।
इसलिए सटीक और स्वच्छ मतदाता सूची तैयार करना किसी राजनीतिक दल पर
एहसान नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है।
मतदाता सूची में हर पात्र नागरिक का नाम होना चाहिए और ऐसे नाम नहीं
रहने चाहिए जो:
मृत्यु के कारण अब पात्र नहीं हैं,
स्थायी रूप से कहीं और चले गए हैं,
एक से अधिक स्थानों पर दर्ज हैं,
या चुनाव कानून के अनुसार अपात्र हैं।
SIR क्या है?
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूचियों के बड़े स्तर पर
सत्यापन और उन्हें अपडेट करने की प्रक्रिया है।
इसका उद्देश्य किसी वास्तविक नागरिक का वोट छीनना नहीं, बल्कि
मतदाता सूची को सटीक, अद्यतन और विश्वसनीय लोकतंत्र बनाना है।
इस प्रक्रिया में:
बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) द्वारा
क्षेत्रीय सत्यापन,
निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) द्वारा जांच,
मसौदा मतदाता सूची का प्रकाशन,
दावे और आपत्तियां,
तथा ERO के निर्णय के खिलाफ अपील की व्यवस्था शामिल है।
ASDD - Absent, Shifted, Dead or Duplicate श्रेणी में किसी नाम का आना अपने आप में अंतिम रूप से नाम हट जाना नहीं है। अंतिम निर्णय से पहले सत्यापन, नोटिस और उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक है।
13 करोड़ मतदाताओं को लेकर क्या कहा गया?
सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर यह बात व्यापक रूप से फैलाई गई कि
“13 करोड़ मतदाता हटा दिए गए।”
निर्वाचन आयोग के स्पष्टीकरण के अनुसार यह दावा भ्रामक है।
मसौदा मतदाता सूचियों की तैयारी के दौरान लगभग 13 करोड़ मतदाताओं को
प्रारंभिक रूप से ASDD श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया था। इनमें लगभग:
2.8 करोड़ मृत मतदाता,
3 करोड़ अनुपस्थित या जिनका पता नहीं लगाया जा सका,
6.3 करोड़ स्थायी रूप से स्थान बदल चुके व्यक्ति,
और लगभग 1 करोड़ दोहरी पंजीकरण वाली प्रविष्टियां शामिल थीं। इसलिए किसी व्यक्ति का ASDD श्रेणी में वर्गीकृत होना अंतिम मतदाता सूची से उसका नाम स्थायी रूप से हट जाना नहीं है।
अगर किसी पात्र मतदाता का नाम छूट जाए तो?
SIR के बाद भी मतदाता पंजीकरण एक सतत प्रक्रिया बनी रहती है।
यदि किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में नहीं है, तो
वह फॉर्म 6 के माध्यम से अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकता है।
निर्वाचन आयोग ने छूटे हुए मतदाताओं, युवाओं और पहली
बार मतदान करने वाले मतदाताओं के लिए विशेष नामांकन प्रयासों के भी निर्देश दिए
हैं। इसमें BLOs के माध्यम से संपर्क और कमजोर वर्गों के लिए विशेष शिविर शामिल हैं।
SIR का समर्थन क्यों करें?
अगर मतदाता सूची में ऐसे नाम बने रहें जिनकी मृत्यु हो चुकी है, जो स्थायी रूप से कहीं और चले गए हैं या जिनका नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज है, तो मतदाता सूची की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। दोहरी और पुरानी प्रविष्टियां चुनावी आंकड़ों को प्रभावित कर सकती हैं और चुनाव व्यवस्था पर जनता के विश्वास को कमजोर कर सकती हैं। लेकिन दूसरी तरफ यह भी जरूरी है कि किसी वास्तविक और पात्र मतदाता का नाम गलती से न छूटे। इसीलिए दावे, आपत्तियां, सत्यापन और अपील की व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
SIR का मूल सिद्धांत बिल्कुल स्पष्ट है-
-किसी भी पात्र भारतीय नागरिक को उसके मतदान के अधिकार से वंचित नहीं
किया जाना चाहिए।
-और किसी भी अपात्र, दोहरी या पुरानी प्रविष्टि को बिना
जांच के मतदाता सूची में नहीं रहने दिया जाना चाहिए।
-यही एक स्वच्छ, निष्पक्ष और विश्वसनीय मतदाता सूची की पहचान है।
लोकतंत्र में नागरिकों और राजनीतिक दलों को किसी भी प्रक्रिया पर सवाल उठाने, पारदर्शिता की मांग करने, आपत्तियां दर्ज करने और अदालत का रुख करने का पूरा अधिकार है। लेकिन आलोचना तथ्यों, कानून और प्रमाण पर आधारित होनी चाहिए। गलत सूचना, व्यक्तिगत दुर्व्यवहार, धमकी या संवैधानिक पदाधिकारियों के परिवारों पर हमला लोकतांत्रिक असहमति का रास्ता नहीं हो सकता।
आगरा से आई रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के पैतृक निवास के पास प्रदर्शन हुए। पुलिस ने तोड़फोड़, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और जबरन प्रवेश के प्रयास के आरोप लगाए तथा इस मामले में गिरफ्तारियां भी हुईं। यदि ऐसे आरोप साबित होते हैं, तो संवैधानिक लोकतंत्र में इस प्रकार का आचरण स्वीकार्य नहीं है। नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाइए, लेकिन परिवार और निजी घरों को राजनीतिक आक्रोश का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। मजबूत लोकतंत्र के लिए
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसकी ताकत इन बातों में है:
-सटीक मतदाता सूचियां,
-शांतिपूर्ण और पारदर्शी चुनाव,
-सभी पात्र नागरिकों के लिए समान मतदान अधिकार,
-स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएं,
-शिकायतों के समाधान के लिए कानूनी उपाय,
-और सभ्य राजनीतिक असहमति।



